लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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गौतम चौधरी

अन्ना के अभियान में पूरा देश लगा है। जगह-जगह धरना और प्रदर्शन हो रहा है। हर चौक-चौराहों-गली-मुहल्लों-ग्राम पंचायतों-दलान-चौपालों पर अन्ना का ही हल्ला है। गोया अन्ना इस देश में ऐसा कानून लाना चाहते हैं जिससे प्रधानमंत्री के उपर भी अंकुश रखा जा सके। निहायत शरीफ अन्ना निर्विवाद गांधीवादी नेता हैं। मैं कभी उनसे मिला नहीं। सचमुच का देखा भी नहीं हूं लेकिन लोकशाही के प्रथम स्तभ विधायिका के कुछ सदस्यों के खिलाफ मोर्चा खोलने के कारण अन्ना हजारे लगातार समाचार माध्यमों की सुर्खियां बटोरते रहे हैं। पहले सेना में गाड़ी चलाया करते थे, फिर समाजसेवा करने लगे। समय के साथ अन्ना ने भी अपना पैंतरा बदला। समाज सेवा करते करते भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में उतर आये। प्रथम चरण में महाराष्ट्र की शिव सेना-भाजपा गठबंधन सरकार के कुछ मंत्रियों पर आरोप लगाकर आन्दोलन चलाया फिर शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हालांकि उक्त मंत्री के खिलाफ न्यायालय में अन्ना और अन्ना कुनबा भ्रष्टाचार का कोई सबूत पेश नहीं कर पाया। इसपर न्यायालय ने अन्ना को तीन महीने के लिए जेल की सजा सुना चुकी है। अन्ना को एक दिन के लिए जेल भी जाना पडा। वही अन्ना आजकल लोकपाल पर अडिग हैं।

विश्‍लेषकों की मानें तो प्रथम और दूसरे चरण के आन्दोलनों में कांग्रेस पार्टी, जिसके नेतृत्व में आजकल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन केन्द्र की सरकार चला रही है, खुशफहमी में थी कि अन्ना हमारे ही तो हैं। अन्ना के प्रथम और दूसरे चरण के अभियान से निःसंदेह कांग्रेस को फायदा हुआ। अब अन्ना राजनीतिक दृष्टि से और परिपक्व हो चुके हैं। अन्ना जब दिल्ली कूच कर रहे थे तब भी कांग्रेसी खेमा में खुशी थी। कांग्रेसी और केन्द्र सरकार यह मान कर बैठी थी कि अन्ना अंततोगत्वा कांग्रसी चाल में फस ही जाएंगे लेकिन अब अन्ना ग्लोवल हो चुके हैं। जो कांग्रेस कल तक अन्ना को गांधी का अवतार बता रही थी वही कांग्रेस आजकल अन्ना को संयुक्त राज्य अमेरिका का दलाल घोषित कर रही है। कांग्रेस के बडबोले नेता राष्ट्रीय महासचिव अन्ना पर लगातार फब्बियां कस रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता अन्ना को भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति बता रहे हैं। इन तमाम ऊहापोह, वितंडावात के बीच अन्ना को नायक बना दिया गया है। सच पूछिये तो अन्ना आज के लिए नायक से कम नहीं हैं। लेकिन अन्ना के आन्दोलन में नया क्या है इसकी मीमांसा होनी चाहिए। याद रहे अन्ना भ्रष्टाचार के खिलफ नहीं लड़ रहे हैं। वे इस देश में ताकतवर लोकपाल की संवैधानिक व्यवस्था खडी करना चाहते हैं। अन्ना और अन्ना के साथ देशभर में हो रहे आन्दोलनों का अलग अलग अध्ययन किया जाना चाहिए। सबसे पहले सवाल यह उठता है कि अन्ना के साथ कौन लोग हैं? दूसरा सवाल है अन्ना के इस आन्दोलन को कौन फंडिग कर रहा है? तीसरा सवाल यह है कि सचमुच लोकपाल बनते ही इस देश की सारी समस्या खत्म हो जाएगी और देश भ्रष्ट प्रशासन से निजात प्राप्त कर लेगा? इन तीन सवालों का जवाब सकारात्मक भी हो सकता है लेकिन मैं इस देश की व्यवस्था को संजीदगी देख रहा हूं। थोडा अध्यन भी किया है। हमारे देश में मात्र 100 परिवारों के बीच सत्ता का हस्तानांतरण होता रहा है। लोकशाही के सारे तंत्रों पर स्वतंत्रता प्रप्ति के बाद से लेकर अबतक मात्र 500 परिवारों का कब्जा रहा है। इस देश में नौकरशाह कानून बनाता है और वही नौकरशाल कानून को लागू भी कर रहा है। इस देश में न्यायपालिका के पास बडी ताकत है। इस देश में हत्यारा सारेआम बिना किसी डर के घुमता है और शरीफ लोग पुलिस से भय खाते हैं। पुलिस और प्रशासन व्यवस्था मानों अपराधियों के संरक्षण के लिए बनाया गया हो। आम सामान्य भारतीयों की पहुंच न्यायालय तक हो ही नहीं पाती है। सामान्य से सामान्य अधिवक्ता की फी कम से कम 1000 रूपये है। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता की फी 25 लाख रूपये है। ऐसी परिस्थिति में न्यायालय जाना आम भारतियों के वस में है क्या? छोडिये इन बातों को शायद हम भटकने लगे हैं। कुल मिलाकर विषय पर ही चर्चा होनी चाहिए। तो अन्ना के साथ जो लोग हैं उसके इतिहास को जरा खंगाला जाये। वे लोग आजतक कहां थे और क्या कर रहे थे? जिस गैर सरकारी संगठनों की छत्रछाया में अन्ना अभियान चलाया जा रहा है उस गैर सरकारी संगठनों की पृष्ठभूमि पर दृष्टि निक्षेप की जानी चाहिए। अन्ना के इस अभियान में बडे सुनियोजित तरीके से कुछ लोग पैसा लगा रहे होंगे। देशभर में रातोंरात सभी शहरों में अन्ना का पोस्टर वह भी एक ही तरह का चिपकाया जाता है। जो समाचार माध्यम भारतीय जनता पार्टी या अन्य प्रतिपक्षी पार्टियों की विशाल रैलियों को उवाउ और सडक जाम करने वाली बताती है वही मीडिया आज अन्ना को गांधी बाबा घोषित करने में लगी है। अन्ना पर पन्ना का पन्ना समर्पित ऐसे ही नहीं किया जा रहा है। इसके पीछे कोई बडी शक्ति अपना खेल खेल रही है। इस देश में लगभग 80 प्रतिशत गैर सरकारी संगठन नौकरशाहों के हैं। बचे 20 प्रतिशत में से 15 प्रतिशत संठन उद्योजकों का है। बचे पांच प्रतिशत संगठनों पर विभिन्ना धार्मिक संगठनों का कब्जा है। ये गैर सरकारी संगठन अब पैसा कमा चुके हैं। इन्हें अब सत्ता में भागीदारी चाहिए। अन्ना का लोकपाल ऐसे गैर सरकारी संगठनों को संवैधानिक हथियार उपलब्ध कराने में उपयोगी साबित होगा। इस प्रकार की संभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

अब सवाल यह खडा होता है कि लोकपाल बन जाने के बाद देश की सर्वोच्च न्यायालय के सत्ता को चुनौती दी जा सकती है क्या? भारत के संविधान की धारा 32 कहती है कि सर्वोच्च न्यायालय किसी भी निर्णय को बदलने की ताकत रखती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय को यह भी अधिकार है कि वह किसी भी मामले को बिना किसी माध्यम के संज्ञान ले सकती है। लोकपाल किसी को दोषी ठहरा भी दिया तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय उसे निर्दोष साबित कर सकती है। यही नहीं लोकपाल देश की सबसे ताकतबर पंचायत लोकसभा को चुनौती दे सकती है क्या? पूर्व से बने भारतीय संघ के तीन स्तभ विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के समानांतर या उपर एक नये संवैधानिक सत्ता को खडा करना देश को अस्थिरता की ओर ले जाना नहीं है क्या? ऐसे कुछ सवाल हैं जो लोकपाली पंचायतों के सदस्यों से पूछा जाना चाहिए। इस देश में कई कानून हैं। लगातार कानून पर कानून बनाये जा रहे हैं। महाराष्ट्र में जब से आतंकवादी विरोधी कानून बनाया गया तभी से वहां आतंकी घटनाओं में बढोतरी हो गयी है। इस कानून का शिकार आतंकवादी कितने हो रहे हैं पता नहीं लेकिन शरीफ और कमजोर राजनीतिक पहुंच वालों को पुलिस इसके माध्यम से लगातार सता रही है यह किसी से छुपी नहीं है। सूचना के अधिकार कानून का क्या हो रहा है, सबको पता है। सूचना के अधिकार से जुडे कार्यकर्ताओं की लगातार हत्या हो रही है। सूचना के अधिकार का मामला देश के न्यायालय जैसा हो गया है। सूचना देने वाले अधिकारी मामले को इस प्रकार उलझाते हैं कि सूचना मांगने वाला परेशान हो जाता है। आश्‍चर्य सभी जगह सूचना अधिकारी ऐसे खुर्राठ प्रशासनिक अधिकारी होते हैं जो अपने पूरे कार्यकाल में जनता और प्रशासन को बडगलाते रहे हैं। अब ऐसी परिस्थित में आप जन लोकपाल बना लो या फिर कोई और संस्था या कानून। जबतक लोगों के चरित्र में सुधार नहीं होगा देश का कायाकल्प नहीं हो सकता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र कहता है कि राजकोष को सदा राजपरिवार और चोरों से डर रहता है। इसलिए राजकोष की सुरक्षा के लिए मंत्री परिषद को उत्तरदायी होना चाहिए।

अन्ना आन्दोलन करें। लोकपाल बनवा भी लें लेकिन याद रहे यह भी सफेद हाथी साबित होगा। अन्ना के समूह की चली तो इस देश में लोकपाल एक और संवैधानिक इकाई होगी जो लगातार देश के स्थापित इकाइयों के खिलाफ मुठभेड करती रहेगी। सरकार की चली तो नख दंत विहीन लोकपाल होगा जो मात्र देश की अन्य व्यवस्थाओं के तरह एक अलंकार मात्र बन कर रह जाएगा। लोकपाल अन्ततोगत्वा भारत के लोकतंत्र की जड को कमजोड ही करेगा मजबूत नहीं कर सकता है। देश में भ्रष्टाचार को मिटाना है तो सबसे पहले सत्ता का विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। फिर पं0 दीनदयाल जी की बात मानते हुए देश के राज्यों का आकार छोटा किया जाना चाहिए। सरकार नीति बनावे और व्यवस्था देश की जनता के हाथों सौंपी जाये। जब सरकार व्यापार करने लगती है तो जनता परेशान हो जाती है। सरकार का काम सीमा की सुरक्षा करना है, नीति निर्धारण करना है न कि जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक करना है। यह काम देश के लोग कर लेंगे। सरकार अपना दायित्व निभाए अन्य काम देश की जनता पर छोड दिया जाये। ऐसा भी कहीं होता है क्या तेल सरकार बेच रही है, पानी सरकार बेच रही है, खाद सरकार बेच रही है, सडक सरकार बना रही है, बिजली सरकार बना रही है। इस सब की जरूरती नहीं है। और जो सरकार को करना चाहिए वह कर ही नहीं रही है। इस देश का प्रत्येक व्यक्ति अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है। सवाल है सरकार की सुरक्षा इकाई आखिर क्या कर रही है? सरकार देश की जनता को माहौल दे। देश की जनता के पास इतनी ताकत है कि वह विकास खुद कर लेगी। लोकपाल पर हुड़दंग मचाने वालों से एक निवेदन यह भी है कि अन्ना का मुखौटा पहल कर देश की जतना को गुमराह न करें। इस संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री सम्माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता, जिसे मैंने पटना के इतिहासिक गांधी मैदान में सुना था, दुहराना चाहूंगा: –

आचार नहीं बदलता हो, सरकार बदल कर क्या होगा,

जहां हर एक माझी पागल हो, पतवार बदल कर क्या होगा। 

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