आजादी की 63वीं वर्षगाठ पर विशेष

-अशोक बजाज

आज हम आजादी की 63वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। किसी भी देश के विकास के लिए 63 वर्ष कोई कम नहीं है। वर्षों की गुलामी के बाद 15 अगस्त 1947 को आजाद मातृभूमि पर जब सूरज की पहली किरण पड़ी होगी तो वह दृश्‍य कितना मनमोहक रहा होगा। चारों तरफ ढोल-नगाडे बज रहे होंगे, युवकों की टोलियां मस्तानी नृत्य कर रही होगी। महिलाएं गा-गा कर जश्‍न मना रही होगी। किसान खेत जाना भूलकर मस्ती में डूब गये होंगे। साहित्यकारों एवं कवियों की लेखनी बंद हो गई होगी। नई सूरज की लालिमा के साथ चिड़ियों का झुंड कलरव करते हुये आजादी के तराने गा रहे होंगे। गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, चंबल व महानदी जैसी असंख्य नदियों के जल की लहरों व सूरज की किरणों की तरंगों का समूह नृत्य-गान के साथ झूम उठा होगा। ताल-तलैयो व झरनों के जल में खुशियों का रंग देखते ही बनता होगा। विंध्य व हिमालय की पर्वतमालाएँ जिन्होंने आजादी के रक्तरंजित दृष्य को अपनी ऊचाइयों से देखा था पूरे देश को नाचते-झूमते देख कर न जाने कितने प्रसन्न हुये होंगे।

100 करोड़ की आबादी के देश में आज ऐसे कितने लोग बचे हैं जिन्होंने 15 अगस्त 1947 की उस सुनहरे पल को निहारा होगा। जिनका जन्म 1940 या उससे पहले हुआ है उन्हें ही यह सब याद होगा। लेकिन जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी निभाई, जिन्होंने सीना अड़ाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया या जिन्होंने अंगे्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया ऐसे अधिकांश लोग स्वर्ग सिधार चुके हैं। उस पीढ़ी के जो लोग आज मौजूद है वे आजादी की लड़ाई के जख्मों के दर्द तथा ढलती उम्र की पीडा को तो झेल रहे हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा उन्हें देश की वर्तमान दशा का दर्द हो रहा होगा। देश में बढ़ती अराजकता, आतंकवाद, अलगाववाद, क्षेत्रीयतावाद के साथ-साथ राष्ट्र की संस्कृति की विकृति देखकर उन्हें रोना आ रहा होगा। उनके मन की वेदना को समझने की आज फुर्सत किसे है? आजादी मिली हम बढ़ते चले गये आज भी बढ़ते जा रहा है।पूराने इतिहास को भूल कर रोज नया इतिहास गढ़ते चले जा रहे हैं। चलते-चलते 63 वर्षों में ऐसा कोई पड़ाव नहीं आया जब हम थोड़ा ठहर कर सोचते कि हम कहां जा रहे हैं? हमारी दिशा क्या है? हमारी मंजिल क्या है ? हमारी मान्यताएँ व प्राथमिकताएँ क्या है?

अंग्रेजी शासन काल में सबका लक्ष्य एक था ”स्वराज” लाना लेकिन स्वराज के बाद हमारा रूप क्या होगा? हम किस दिशा में आगे बढेंग़े? इस बात पर ज्यादा विचार ही नहीं हुआ। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में कहा था कि हमें ”स्व” का विचार करने की आवश्‍यकता है। बिना उसके ”स्वराज्य” का कोई अर्थ नहीं। स्वतन्त्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती। जब तक हमें अपनी असलियत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और न उनका विकास ही संभव है। परतंत्रता में समाज का ”स्व” दब जाता है। इसीलिए राष्ट्र स्वराज्य की कामना करता हैं जिससे वे अपनी प्रकृति और गुणधर्म के अनुसार प्रयत्न करते हुए सुख की अनुभूति कर सकें। प्रकृति बलवती होती है। उसके प्रतिकूल काम करने से अथवा उसकी ओर दुर्लक्ष्य करने से कष्ट होते हैं। प्रकृति का उन्नयन कर उसे संस्कृति बनाया जा सकता है, पर उसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि किस प्रकार मानव-प्रकृति एवं भावों की अवहेलना से व्यक्ति के जीवन में अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति प्राय: उदासीन एवं अनमना रहता है। उसकी कर्म-शक्ति क्षीण हो जाती है अथवा विकृत होकर वि-पथगामिनी बन जाती है। व्यक्ति के समान राष्ट्र भी प्रकृति के प्रतिकूल चलने पर अनेक व्यथाओं का षिकार बनता है। आज भारत की अनेक समस्याओं का यही कारण है।

राष्ट्र का मार्गदर्शन करने वाले तथा राजनीतिक के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश व्यक्ति इस प्रष्न की ओर उदासीन है। फलत: भारत की राजनीति, अवसरवादी एवं सिद्वांतहीन व्यक्तियों का अखाड़ा बन गई है। राजनीतिज्ञों तथा राजनीतिक दलों के न कोई सिद्वांत एवं आदर्श हैं और न कोई आचार-संहिता। एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाने में व्यक्ति को कोई संकोच नहीं होता। दलों के विघटन अथवा विभिन्न दलों की युक्ति भी होती है तो वह किसी तात्विक मतभेद अथवा समानता के आधार पर नहीं अपितु उसके मूल में चुनाव और पद ही प्रमुख रूप से रहते हैं।

राष्ट्रीय दृष्टि से तो हमें अपनी संस्कृति का विचार करना ही होगा, क्योंकि वह हमारी अपनी प्रकृति है। स्वराज्य का स्व-संस्कृति से घनिष्ठ सम्बंध रहता है। संस्कृति का विचार न रहा तो स्वराज्य की लड़ाई स्वार्थी, पदलोलुप लोगों की एक राजनीतिक लड़ाई मात्र रह जायेगी। स्वराज्य तभी साकार और सार्थक होगा जब वह अपनी संस्कृति के अभिव्यक्ति का साधन बन सकेगा। इस अभिव्यक्ति में हमारा विकास होगा और हमें आनंद की अनुभूति भी होगी। अत: राष्ट्रीय और मानवीय दृष्टियों से आवश्‍यक हो गया है कि हम भारतीय संस्कृति के तत्वों का विचार करें।

भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि वह सम्पूर्ण जीवन का, सम्पूर्ण सृष्टि का, संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़ों-टुकड़ों में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। अग्रेजी शासन की दासता से मुक्ति पाने के बाद हमारी प्राथमिकता आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए थी। संस्कृति देश की आत्मा है तथा वह सदैव गतिमान रहती है। इसकी सार्थकता तभी है जब देश की जनता को उसकी आत्मानुभूति हो। विकासशील एंव धर्मपरायण भारत की दिशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हो सकती है। हमारे सामने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नहीं। स्वतत्रंता की 63वीं वर्षगांठ पर आईये हम सब देश को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में ले जाने का संकल्प लें।

वन्दे मातरम जय हिन्द

आजादी की 63 वीं वर्षगांठ पर आप सबको बधाई एवं शुभकामनाएँ

11 thoughts on “आजादी की 63वीं वर्षगाठ पर विशेष

  1. आतंकवाद का आकार-प्रकार चाहे जो हो देश की संस्कृति अजर-अमर है ,थी और रहेगी ,लेकिन संस्कृति विकृत हो गई तो देश का क्या होगा ? हमें देश की संस्कृति की मौलिकता को कायम रखना है .

  2. “कोई सिख-कोई जाट मराठा-कोई गुरखा कोई मद्रासी …सरहद पर मरने वाला ……हर वीर था भारतवासी …जो खून बहा पर्वत पर वो खून था हिन्दुस्तानी ………..जो शहीद हुवें हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी” ….
    आज़ादी के ६४ वर्ष बहुत लम्बा अनुभव हो गया,हमने आज़ादी के बाद मौलिक अधिकार प्राप्त किये, अधिकारों का उपयोग किया -किन्तु ये भूल गए की अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी संविधान में प्रावधान है इनकी कोई बात नहीं करता ,केवल पाने ही पाने के लिए हम लालायित रहतें हैं,हम आज़ाद, हमारी संस्कृति आज़ाद,हम चाहे ये करें हम चाहे वो करें हमारी मर्ज़ी ….क्या ये ही मतलब है स्वतंत्रता के क्या इसी के लिए शहीदों ने अपना खून बहाया …क्या संयम या संतुलन का कोई स्थान है ….?जरा सोचिये हम क्या कर रहें हैं हम कहाँ और किस दिशा में जा रहें हैं …जय भारत -जय छत्तीसगढ़ ….विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग

    1. भाई विजय सोनी जी
      संस्कृति इस देश की आत्मा है ,वह हमें आजाद जीवन जीने की कला सिखाती है .आज़ादी का अर्थ स्वेच्छाचारिता समझ लिया गया है ,यह बहुत बड़ी भूल है, हम अपनी मूल संस्कृति से भटक रहे है . नई पीढ़ी को अधिकार और कर्तव्य का बोध करना होगा . हम उन कारणों को न उभरने दें जो परतंत्रता के लिए जिम्मेदार है .

  3. -बड़ा सही और सार्थक निष्कर्ष है की ‘ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ एक समाधान और लक्ष्य है. इसकी समकक्ष संकल्पना और संसार में और कोई नहीं और न ही इतनी परिपूर्ण कोई संरचना.
    – पश्चिम की दृष्टी वस्तुओं को टुकड़ों में बाँट कर देखती है, एकात्मक दृष्टी का वहां नितांत अभाव है.
    अमूल्य निष्कर्ष दिए हैं बजाज जी ने. साधुवाद ! इस संकल्पना व दर्शन को पूरा समझने के लिए दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘एकात्म मानव वाद’ पढ़ना चाहिए. मेरी दृष्टी में तो सार रूप भारतीय दर्शन को समझने के लिए यह पुस्तक सबसे संक्षिप्त और सबसे सरल, अमूल्य, अमर कृती है.

    1. आदरणीय कपूर साहब
      अपने सही मार्गदर्शन किया .पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा रचित एकात्म – मानववाद गीता की तरह पवित्र है तथा उनका एकात्म मानव दर्शन हम सबका पथ-प्रदर्शक है .—लेखक

  4. आजादी की चौसठवी वर्षगाँठ पर आपका लेख सोचने पर बाध्य करता है. संसकृति की बात तो अच्छी है पर उन विकृतियों पर भी चर्चा ज़रूरी है, जिनके कारण देश में लोकतंत्र कमज़ोर होता जा रहा है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अच्छा शब्द है, मगर यह डरता भी है. मैंने देखे है अनेक राष्ट्रवादी. कुर्सी मिलते ही सबसे पहले ये राष्ट्र के लोगो के सर फोड़ने की कोशिश करते है. फिर भी मई देश को नमन करता हूँ. करता रहूँगा. भले ही सत्ता मेरा सर ही क्यों न फोड़ दे..बधाई इस उत्सव की..

    1. भाई गिरीश जी
      स्वयं को राष्ट्रवादी कहने मात्र से कोई राष्ट्रवादी नहीं बन जाता .मन, वचन और कर्म से राष्ट्रवादी बनना पड़ेगा . “सच्चा राष्ट्रवादी कहलाने का हक़ किसे है” इस पर आप एक अच्छा लेख लिख सकतें है –लेखक

  5. जहाँ आपने ६३ वां लिखा है वहा ६४ वां कर लें .आज़ादी हासिल हुए ६३ वर्ष जरुर हुए किन्तु आज़ादी की पहली वर्षगाँठ भी जोड़ोगे तो २०१० के पन्द्रह अगस्त को ६४ वां स्वाधीनता दिवस होगा .

    1. आजादी की पहली वर्ष गांठ १९४८ में मनाई गई, इस लिहाज से २०१० को ६३ वी सालगिरह होनी चाहिए .स्वतंत्रता दिवस ६४ वां है पर वर्षगांठ ६३ वां होना चाहिए

  6. आदरणीय
    देश -दुनिया की व्यथा -कथा सभी बखान रहे हैं .लेकिन अपने हिस्स्ये की निष्ठां
    प्रस्तुत करने वाले कम हो गए है .आज़ादी के सन्दर्भ में अमर शहीदों का पुन्य स्मरण मन को भिगो गया .आपका आलेख कमोबेश ठीक ठाक है .सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या एकात्म-मानवतावाद बनाम मार्क्सवाद लेनिनवाद बनाम दुवान्दात्म्क एतिहासिक भौतिकवाद -बनाम सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद .इन पर पचास वर्षों से लिखा -पढ़ा -सूना जा रहा है .कोई भी विचार पूर्ण रूप से सर्वमान्य निरपेक्ष सत्य नहीं है .अभी तो मानव सभ्यता को आर्थिक आतंकवाद से जूझना है .

    1. भाई श्रीराम तिवारी जी ,
      आतंकवाद का आकार-प्रकार चाहे जो हो ,देश की संस्कृति “अजर-अमर है ,थी और रहेगी” . यदि यह विकृत हो गई तो देश का क्या होगा ? देश की संस्कृति की मौलिकता को कायम रखने के लिए ” एकात्म मानव दर्शन ” ही सक्षम है –लेखक

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