लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

नक्सलवाद मुद्दे पर गर्माहट कब तक बनी रहेगी कोई नहीं जानता? 21 अगस्त को बिहार पुलिस ने कोलकत्ता पुलिस की मदद से मध्य कोलकत्ता के एक होटल से नक्सलवादी नेता मुसाफिर साहनी को गिरफ्तार किया। उसके खिलाफ हत्या में शामिल होने के अलावा 15 अन्य मामले चल रहे हैं। आजकल रोज दिन नक्सलवादी किसी न किसी वजह से चर्चा में रहते हैं। प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने भी 15 अगस्त को दिए भाषण में नक्सलवाद को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है।

सरकार का मानना है कि विकास नहीं होने की वजह से ही नक्सलवाद पनप रहा है। अपनी इस विचारधारा के तहत केंद्र सरकार ने हाल ही में नक्सलवादी जिलों के विकास के लिए तेरह हजार करोड़ रुपए की समग्र कार्रवाई योजना तैयार की है। इसके बरक्स में कुछ जानकारों का मानना है कि इस दवा से मर्ज ठीक होने की बजाए नासूर बन जाएगा, क्योंकि नक्सली इलाकों में नक्सली विकास होने नहीं देंगे और विकास राषि का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ करेंगे।

यहाँ इस प्रश्‍न का उठना स्वाभाविक है कि हम नक्सली किसे मान रहे हैं, आदिवासियों को या फिर गैर आदिवासियों को या फिर दोनों को? विकास से क्या नक्सली सचमुच डरते हैं या फिर यह संकल्पना आधारहीन है? आज नक्सल समस्या के कारण और निदान के संबंध में लोगों की परस्पर विरोधी विचारधाराएं चर्चा में हैं। कोई यह नहीं बता पा रहा है कि नक्सली आखिर चाहते क्या हैं? लिहाजा इन तथ्यों की सघन पड़ताल करने की जरुरत है।

मोटे तौर पर आज भी लोग नक्सली आदिवासियों को मानते हैं। इस तरह की विचारधारा रखने वालों की बात सोलह आना तो नहीं, पर तेरह-चौदह आना जरुर सच है। नक्सल प्रभावित राज्यों के कुछ जिलों में, वह भी बहुत कम संख्या में निचले स्तर पर गैर आदिवासी नक्सली हैं। इनकी संख्या बमुष्किल 10 प्रतिशत है। हाँ, नक्सलियों के नेता जरुर गैर आदिवासी हैं। इनके अधिकांश नेता बिहार, पष्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश से आते हैं।

यह कहना कि नक्सली विकास नहीं चाहते हैं, समीचीन नहीं होगा। अगर किसी का विकास से पेट भरे, रहने के लिए छत मिले, समय पर दवा मिले, शिक्षा मिले, उनकी मान्यताओं को संरक्षण मिले तो ऐसे विकास से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? दरअसल नक्सलियों को आपत्ति है छद्म विकास से। उनका संघर्ष जारी है अपनी जमीन, विश्‍वास, मान्यता व रीति-रिवाज को बचाने के लिए।

हाल ही में वेदांता समहू को (लांजीगढ़ में अपनी एल्युमीनियम रिफाइनरी के लिए नियामगिरी पहाड़ी से बाक्साइट प्राप्त करने की योजना के मामले में) सक्सेना समिति ने करारा झटका दिया है। अपनी रिर्पोट में समिति ने स्पष्ट रुप से कहा है कि वेदांता समहू ने राज्य के अधिकारियों से मिलकर वन संरक्षण कानून, पर्यावरण संरक्षण कानून, पेसा एक्ट इत्यादि का उल्लघंन किया है। समिति का यह भी मानना है कि समूह ने एल्युमीनियम रिफाइनरी की छमता में छह गुना का विस्तार करके नियमों की अनदेखी की है।

हालांकि उड़ीसा प्रदूषण बोर्ड ने कई बार कंपनी को काम रोकने की नोटिस दी थी। बावजूद इसके उसके कान में जूं तक नहीं रेंगा। समिति ने अपनी पड़ताल में यह भी पाया है कि वेदांता समहू ने कम से कम 26.123 हेक्टेयर गाँव की वन भूमि को अपनी रिफाइनरी के लिए इस्तेमाल कर आदिवासियों और दलितों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। सबसे बड़ी बात रिर्पोट में यह कही गई है कि बाक्साइट के खनन से सात वर्ग किलोमीटर से अधिक की जमीन नष्ट हो जाएगी, जिसे कौंध आदिवासी पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं।

वेदांता समहू की लांजीगढ़ परियोजना की तरह ही उड़ीसा के पारादीप के समीप प्रस्तावित मेगा स्टील प्लांट के लिए पहचान की गई जमीन पर अगर पास्को परियोजना के तहत स्टील प्लांट का निर्माण होता है तो पर्यावरण, वन और आदिवासियों को भारी क्षति होने की आशंका है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि निजी निवेश का उद्देश्‍य सिर्फ लाभ अर्जित करना होता है। समाजवाद से उनका कोई सरोकार नहीं है। ऐसे में निजी कंपनियों को जंगलों में निवेश की इजाजत देना आदिवासियों की क्रब खोदने के समान है। वेदांता तथा पास्को परियोजना के अंतर्गत क्या हो रहा है, इससे हम अच्छी तरह से जानते हैं? आदिवासियों के लिए आज भी जंगल उनका घर है। पहाड़ों की वे पूजा करते हैं। जंगल के हर चीज से उनका गहरा रिश्‍ता है। नदी-नाले, पेड़-पौधों तथा पहाड़ों में उनकी जिंदगी बसी हुई है। मसलन, महुआ कितना महत्वपूर्ण आदिवासियों के जीवन के लिए है, इसे गैर आदिवासी कभी नहीं समझ सकेंगे। महुआ से बनाया हुआ शराब आदिवासियों की परम्परा का एक अभिन्न हिस्सा है। बच्चा जब जन्म लेता है तब उसे महुआ से बनाये हुए शराब की कुछ बुंद पिलाई जाती है और जब वह मरता है तब भी उसके मुहँ में महुआ से बनाये हुए शराब की कुछ बुंद डाली जाती है। इसके ठीक विपरीत नक्सल प्रभावित जिलों में सरकार ने महुआ से बने शराब पर या तो पाबंदी लगा दी है या उसे नियंत्रित कर दिया है।

कभी छोटानागपुर (झारखंड) में बिरसा मुंडा नामक एक जुझारु आदिवासी युवक ने अपने संप्रदाय के हक की लड़ाई के लिए ब्रितानी हुकूमत और ठेकेदारों के खिलाफ ‘उल्गुलान’ नामक आंदोलन चलाया था। आजादी के पहले आदिवासियों ने ब्रिटिश शासन के अत्याचार और शोषण के खिलाफ अनेकानेक आंदोलन या विद्रोह किया था। उनमें से प्रमुख थे-वेस्टर्न घाट में 1818 से 1848 तक चला भील आंदोलन, 1914-1915 तक छोटानागपुर में चतरा भगत के द्वारा चलाया गया उरांव विद्रोह, छोटानागपुर में ही 1831-1832 तक बुधिया भगत की अगुआई में चला कोल आंदोलन और 1921-22 तक आंध्रप्रदेश के नल्लामलाई में चला हनमन्तु की अगुआई में चैंचू आंदोलन। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान आदिवासियों का अत्याचार और शोषण के खिलाफ आंदोलन करने का एक लंबा इतिहास रहा है।

क्या अब आदिवासियों में आजादी के पहले वाला जुझारुपन नहीं रहा। नक्सलियों के बीच कोई भी बड़ा आदिवासी नेता आज नहीं होने के कारण ऐसा सोचना कुछ हद तक सही भी है। अलग राज्य के रुप में झारखंड की मांग में झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे आगे थी, पर आज यह पार्टी अपने मांगे हुए राज्य में कमजोर पड़ चुकी है। झारखंड में आदिवासी मुख्यमंत्री जरुर बना है, किंतु रिमोट हमेशा गैर आदिवासी नेता के हाथ में रहा। छत्तीसगढ़ में भी गैर आदिवासी नेता राज्य को चला रहे हैं। इन दोनों राज्यों में आदिवासियों का कितना भला हुआ है, यह जगजाहिर है?

अफसोस की बात है कि जंगलों में नेता नहीं पैदा नहीं हो पा रहे हैं और इस कमी का फायदा गैर आदिवासी नक्सली नेता उठा रहे हैं। आज आदिवासियों की गरीबी, उनकी विविध प्रकार की समस्याओं और उनकी भावनाओं को नगदी में तब्दील ऐसे नेता ही कर रहे हैं। यही नेता चाहते हैं कि विकास नहीं हो ताकि उनकी समानांतर सरकार नक्सल प्रभावित राज्यों में चलती रहे। एक आम आदिवासी का इस नक्सल आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

ज्ञातव्य है कि कभी-कभी दूसरी समस्या भी नक्सल समस्या को बदतर करने का काम करती है। जैसे उड़ीसा के खैरलांजी में हुए विवाद के मूल में जाति था। कंधमाल में भी हुआ विवाद संप्रदाय विशेष के बीच का था। बावजूद इसके इन दोनों विवादों को नक्सलवाद से जोड़कर देखा गया।

आज महँगाई अपने चरम पर है। खाने-पीने की चीजें धीरे-धीरे आम आदमी के हाथों से फिसलती जा रही है। मुद्रास्फीति से रुपए का अवमूल्यन हो रहा है। लोग अपनी जरुरत की वस्तुएँ नहीं खरीद पा रहे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है। मनरेगा में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, जिसके कारण लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। अगर किसी को मजदूरी का काम मिलता भी है तो काम करने के बाद उन्हें उनकी मजदूरी नहीं दी जाती है। इस तरह की प्रतिकूल परिस्थिति निष्चित रुप से नक्सलवाद के लिए बेहद ही मुफीद है।

प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह और जानकारों का मानना है कि विकास और सेना की सहायता से नक्सलवाद का खात्मा किया जा सकता है। मेरा भी ऐसा मानना है, लेकिन मेरी इस मामले में सोच थोड़ी सी अलग है। सेना का उपयोग नक्सलियों को काबू करने के लिए नहीं किया जाए, वरन् उसका उपयोग नक्सलियों के पुर्नवास के लिए होना चाहिए। अभी हाल ही में भारतीय सेना ने लेह वासियों के पुर्नवास में अपनी अद्भूत भूमिका निभाई है।

आदिवासियों के बीच जागरुकता लाने की जरुरत आज सबसे अहम् है, ताकि वे खुद से अपना भला-बुरा सोच सकें और नक्सल नेताओं के शोषण से बच सकें। ममता बनर्जी का नक्सलियों से संबंध अब स्पष्ट है। क्या ममता बनर्जी आदिवासियों का भला करना चाहती हैं? इसका फैसला आदिवासियों को खुद करना चाहिए।

सच कहा जाए तो नक्सल प्रभावित राज्यों में सुशासन का घोर अभाव है। अस्तु आर्थिक और सामाजिक विकास का नक्सल प्रभावित राज्यों में होना अति आवश्‍यक है।

लब्बो-लुबाव के रुप में कह सकते हैं कि इस मुद्दे पर सरकार के साथ-साथ आम भारतीयों को भी संवेदशील होना होगा। विकास सभी को अच्छा लगता है, पर विकास सिंगुर और टप्पल की तरह नहीं होना चाहिए। संवेदनहीनता एवं इस तरह के नकारात्मक विकास की ही परिणति है नक्सलवाद। आश्‍चर्य है नक्सलवाद के नासूर बन जाने के बाद भी हम अपराधबोध की भावना से ग्रसित नहीं है। यह किसी त्रासदी से कम नहीं है। खैर, चिकना घड़ा बनने के बाद ऐसा ही होता है।

9 Responses to “नक्सलवाद पर अपराधबोध क्यों नहीं?”

  1. om prakash shukla

    सतीश जी एक सारगर्भित और विचर०तेजक लेख के लिए बधाई.आपको पढ़ते हुए आदिवासियो की मूल समस्या की तरफ ध्यान जाता है जिसस्व काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है.परन्तु हो क्या रहा है मीडिया द्वारा सतही बहस चला केर नाक्स्सल्वाद की अपराधिक छवि को माध्यम बना बहस को मस्तरा हिंसा अहिंसा के बीच चलाया जा रहा है,जिसे माध्यम और निम्न मध्यम वेर्ग के द्रविंग रूम में आदिवासियो के वास्तविक समस्याओ को कभी देख समझ नहीं पते समाचार चास्नेल सुरचाबलो की विज्ञ्स्तिस छपने में लगे है.उन्हें कभी वस्त्वकता पैर कसा जाता है जो प्रशासन ने जो चाप दिता जब हम आदिवासियो की सम्स्यौओ से अवगत ही नही हो पते.आखिर क्यों आदिवासियो और हासिये के लोगो को अपमे सम्वाधानिक नुनतम मजदूरी के लिए हथियार उठाना पास्ता है.ल्योनाही कोई ऐसी व्यवस्था बने जाती की उनलोगों को उचित मजदूरी का भुगतान बगैर विरोध के मिल जाय .दूसरी बात यह भी विचार में लेनी होगी की क्यों विकास की कीमत आदिवासियो को ही चुकानी पड़ती है.भारत सरकार के ग्रामिद विकास विभाग के अनुसार ४०% आदिवासियो का एक या अधिक बार विस्थापन हुआ है और कही भी नाटो उन्हें सही तरीके से मुआवजा दिता गया और न ही पुनेर्वस्द किया गया,फिर हम किस मुह से उन्हें विस्वास का झूठा दिलासा देते रहेगे और उनके संसाधनों पैर जबर्दस्ती कब्ज़ा करते रहेगे.अज हो क्या रहा है सत्ता धरी दल और विपची दल मिल केर एक गिरोह की तरह व्यवहार केर रहे है.अब यह सब चलने वाला नहीं अब आदिवासियो को मजबूत सहयोगी मिल गए है और वे अपने अस्तित्य्व की लड़ाई लड़ रहे है वे जानते है की इसे हारने का मतलब शहरो में दिहाड़ी मजदूरी करना और उनके बहु बेतिओ का हवास काआआआआआआआआअ शिकार होना है.और यही वास्तविक कार्ड है की सर्कार के नर्संधर में कमी सई है.इस वास्तविकता को प्रशासन जीतनी ज्स्ल्दी समझ लेगा उसके लिए बेहतर है,नहीं टी अभी कश्मीर ,पूर्वोत्तर,असम में बोडोलैंड का उदाहरद सामने है जो आजादी के बाद से ही चल रहा है जुर इसे नियाब्न्त्रित नहीं केर पसद रहे है.

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    शिशिर चन्द्र और आर सिंह के विचारों में औसतन जो समानता का बोध होता है वह इस आलेख के प्रस्तुत करता की मूल भावना से भिन्न कहाँ हैं .सिर्फ अंदाजे वयां -जुदा -जुदा ही है वाकी आप तीनो की साझा समझ ही नक्सलवाद के सन्दर्भ में देश और आदिवाशियों के हितार्थ है .

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    • shishir chandra

      श्रीराम तिवारी जी तारीफ के लिए शुक्रिया!
      मैं छत्तीसगढ़ का रहने वाला हूँ और छत्तीसगढ़ के फैसले में दुर्भाग्य से गैर आदिवासियों की उपेक्षा अक्सर गैर छत्तीसगढ़िया कर जाते हैं. सिर्फ मुझे इसी बात की पीड़ा होती है. आप शायद गैर आदिवासियों के दर्द को नहीं जानते. आदिवासी एरिया की लगभग सभी सीट्स उनके लिए रिज़र्व है. गैर आदिवासी को प्रतिनिधित्व का मौका कहाँ? मेरे यहाँ की लोकसभा और विधानसभा दोनों सीट दलितों के लिए रिज़र्व रहीं हैं. इसके बावजूद यह इल्जाम की वो राजनीती के केंद्र में नहीं हैं. उनकी जनसँख्या के अनुपात में निश्चित रूप से उनकी प्रबल भागीदारी है. छत्तीसगढ़ में अजा/जजा को 36 % आरक्षण मिला हुआ है. बाकी के लिए मौका कहाँ है?
      उस पर भी समय समय पर गैर आदिवासियों पर शोषण का इल्जाम? इस शोषण के लिए जिम्मेदार भ्रष्ट तंत्र, नौकरशाह, राजनेता और कॉर्पोरेट जगत है. सामान्य गैर आदिवासी छत्तीसगढ़िया नहीं. गरीबी का आलम आप गैर आदिवासियों में भी देख सकते हैं. पुरे गाँव के गाँव गरीब हैं. चाहे किसी भी जाति का क्यों न हो. छत्तीसगढ़ खनिज संसाधनों से भरपूर राज्य है, लेकिन छातिस्गढ़िया नहीं. इस का फायदा शोषक तबका उठता है जिसका उल्लेख मैंने पहले किया है. चकाचौंध आप को छत्तीसगढ़ के शहरों में दिखेगी गाँव में नहीं.
      छत्तीसगढ़ के आदिवासी निस्संदेह दयनीय स्थिति में हैं और उनके लिए लॉन्ग टर्म्स में योजना बनाने की जरुरत है. वैसे तो सरकार ट्राइबल एरिया डेवेलोपमेंट के लिए अरबों रुपया खर्च करती है लेकिन नतीजा शिफर रहता है. ऐसा क्यों? क्या सरकार शासन चलाना नहीं जानती? मुझे संदेह है की सरकार के पास काबिलियत और ढांचा है. वह इस एरिया के विकास के लिए व्यर्थ ही कसरत कर रही है. सरकार साफ साफ क्यों नहीं बोलती की किसी एरिया का विकास उस के बस की बात नहीं.ऐसी समस्याओं का कोई हल नहीं. गरीब लोग गरीब ही रहेंगे. जिस दिन उनको परम ज्ञान मिलेगा उस दिन से उनका विकास शुरू होगा.
      छत्तीसगढ़ की भोली भली जनता का शोषण कोई भी कर सकता है. छत्तीसगढ़ की जनता के भोलेपन का फायदा पहले सफेदपोश नौकरशाहों ने उठाया और अब तेलुगु भाषी नक्सलाइट उठा rahe हैं. छत्तीसगढ़ की sanskriti ही ऐसी है की यह sabko aatmsaat कर leti है. आप देख sakten हैं की छत्तीसगढ़ में gunde भी गैर छातिस्गढ़िया हैं. har star पर शोषक spasht रूप से गैर छातिस्गढ़िया najar aayenge. छत्तीसगढ़ में kshetravaad का uday न hona भी छत्तीसगढ़ के शोषण का kaaran है..

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  3. shishir chandra

    आर सिंह जी मैं आपके विचारों से इत्तिफाक रखता हूँ. सिर्फ आदिवासी ही क्यों? समाज की बहुत सारी जाति हैं, जो विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं. इन सभी शोषित लोगों को समाज की मुख्या धरा में लाना एक चुनौती होगी, जिसे हमें स्वीकार करना होगा. आपने छत्तीसगढ़ का जिक्र किया है, लेकिन लोकतंत्र का मूल मकसद क्या होता है, इस भावना के साथ आगे बढ़ना होगा. राज्य में आदिवासी एक तिहाई है, उनके लिए संभव नहीं है कि अपने दम पर सरकार बना सकें?
    यहाँ पर अन्य बातों की भी अनदेखी हुई है. जैसे महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों के लिए भावना देशद्रोह माना गया, तो फिर छत्तीसगढ़ सिर्फ आदिवासियों के लिए क्या न्यायोचित होगा? इसी छत्तीसगढ़ में गैर आदिवासी भी भारी संख्या में रहते हैं. जिनमे से अधिकांश छत्तीसगढ़ी भाषी हैं. छत्तीसगढ़ी भाषी गैर आदिवासियों के बारे में क्या कहना है? इनमे भी भीषण गरीबी है. क्या गैर आदिवासी भूमिपुत्र नहीं हैं? क्या गैर आदिवासी सीधे आसमान से छत्तीसगढ़ में टपके?
    आप क्या सोचते हैं कि आदिवासी नेतृत्व सरकार चलने लगे तो आदिवासियों कि उन्नति हो जाएगी? मायावती, मुलायम और लालू के सत्ता में आने से दलित और पिछड़े खुशहाल हो गए? यह एक खयाली पुलाव है कि सत्ता में आ जाने भर से किसी समुदाय कि उन्नति होने लगती है. सामान्यतया आदिवासी नेत्रित्व अपने पैरों में नहीं खड़ा है, परदे के पीछे से कोई और शासन करता है. आदिवासी नेता भी भ्रष्ट होता है, वो भी पहले अपनी तिजोरियां भरता है. आप सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं मिलने से आदिवासियों के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर नहीं मान सकते. छत्तीसगढ़ के अधिकांश मंत्री और की पोर्टफोलियो आदिवासियों के पास है. आप इन बातों कि अनदेखी कर रहे हैं. आदिवासियों का नेत्रित्व यदि काम करने में अक्षम साबित हो रहे हैं, तो गैर आदिवासी जिम्मेदार नहीं. इस कमी के लिए लोकतंत्र और सिस्टम जिम्मेदार हो सकता है. क्योंकि गैर आदिवासी भी इसी कमी से जूझ रहे हैं.
    छत्तीसगढ़ी लोग को जाति के आधार पर लड़ाना ठीक नहीं. पहले ही छातिस्गढ़िया शोषण के शिकार रहे हैं. दुसरे राज्यों के लोग इस शोषण के केंद्र में रहे हैं.
    छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी आदिवासी माने जाते हैं. ( हालाँकि उनकी माँ आदिवासी और pita दलित the( protestant christian). क्या सिर्फ आदिवासी होने से ही आप khush हो गए? aisa asabhya मुख्यमंत्री maine aaj tak kahin नहीं dekha. अजीत जोगी कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के beech कोई भी vishvasneeyata नहीं है. छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री कि नहीं balki एक yogya मुख्यमंत्री कि jarurat है. chahe किसी भी जाति का क्यों na हो. क्या मैं sahi हूँ?

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  4. Anil Sehgal

    जंगलों में नेता नहीं हैं और इसका फायदा गैर आदिवासी नक्सली नेता उठा रहे हैं।
    आम आदिवासी का नक्सल आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।
    क्या ममता बनर्जी आदिवासियों का भला करना चाहती हैं? उत्तर: राजनीती रोटीयां.
    आर्थिक और सामाजिक विकास का होना अति आवश्‍यक है, परन्तु
    वेदांता समहू की लांजीगढ़ परियोजना, उड़ीसा के पारादीप के समीप मेगा स्टील प्लांट के लिए गई जमीन पर निर्माण होना – पर्यावरण, वन और आदिवासियों के लिया भारी क्षति;
    और दूसरी तरफ विकास नहीं होने की वजह से ही नक्सलवाद पनप रहा है।
    What is required is development with a human touch. Be considerate.

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  5. आर. सिंह

    R.Singh

    मैं आपके आलेख के उस अंश से शुरू करता हूँ ,जहाँ महुआ को आपने आदिवासियों के लिए अमृत समान माना है.गैर आदि वासी आदिवासियों के विकास की बातें करते हुए यही मार खा जाते हैं.कोई भी पढ़ा लिखा आदिवासी इस प्रथा को दिल से प्रश्रय नहीं देता,तो क्या कारण है की वे लोग जो ऊपर ऊपर से आदिवासियों का दुखड़ा सुनाने बैठते हैं,वे लोग इन चीजों में उलझ कर रह जाते हैं.आप लोगों ने आदिवासियों की शिक्षा और उनको उनकी कुरीतिओं से बाहर लाने के बारे में कभी सोचा.मैंने अपने रांची प्रवास के दौरान इन सभी baton पर विचार किया था.उस समय हालाकि नक्सल समस्या आदिवासियों के बीच नहीं आ पाई थी,पर पढ़े लिखे आदिवासियों का गैर आदिवासियों के प्रति क्रोध भावना जन्म ले चुकी थी इसका प्रमुख कारण था गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासिओं का शोषण,आदिवासिओं के विकास के नामपर अरबों रुपयों का भ्रस्त कर्मचारियों द्वारा अपने लिए उपयोग.एक तबका ऐसे लोगों का भी रहा है जो आदिबासियों के मूल प्रथा के संरक्षण के नाम पर अनंत कल तक उनको उसी पत्थर युग में रखना चाहते थे. कही na कही कभी na कभी इन sabke virudh ubaal तो aanaa hi था,पर aaj भी aadivasi samuh उसी shoshak samudaya के kabje में है.kewal shakl badal gayaa है.agar आदिवासी area का विकास karna है तो vah vikas van sampada ka samucht dohan और usnme wahan के niwasion को uchit labhansh  dekar hi किया ja sakta hai.

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  6. सुमित कर्ण

    सुमित कर्ण

    श्रीमान लेहवासियों और नक्सलियों में काफी अंतर होता. लेहवासी मुसीबत में थे परन्तु नक्सली मुसीबतों को पैदा करते है.

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  7. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    सतीश जी आपके प्रस्तुत आलेख की मूलभावना से सहमत हूँ .इस दिशा में सकारात्मक प्रयास भी किये जा रहे हैं .किन्तु आप की अपराधबोध की और ध्य्नाकरष्णकर रहें यह अस्पस्ट है .आपके आलेख में आदिवाशियों का नक्सलवाद के प्रति क्या नज़रिया है ;यह भी सुविचारित किया गया है .बधाई

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