लेखक परिचय

डॉ. अरुण कुमार दवे

डॉ. अरुण कुमार दवे

राजस्थान के एक कॉलेज में शिक्षक पद पर कार्यरत | कविता, ग़ज़ल, लघुकथा व व्यंग्य लेखन में रुचि. फक्कड़ाना अंदाज में फक्कड़वाणी लिखकर विषमताओं एवं विद्रूपताओं के कारक तत्वों को खरी-खरी सुनाने का शगल | लेखक के शब्‍दों में- मेरी वाणी अपना धर्म निभाती है, अत्याचारी को औकात दिखाती है, लोकविमुख बेजान शिलाओं में हरकत जोशीली वाणी से मेरी आती है, मैं युग का चारण हूँ अपना धर्म निभाता हूँ, जनमन के भावों को अपने स्वर में गाता हूँ.

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डॉ. अरुण कुमार दवे

हे जनमन के नायक , राष्ट्र के उन्नायक आपको शत शत नमन | आप देश और समाज की तरक्की के एकमात्र आधार है| आपकी महिमा अपरंपार है| हे गुरुवर ! हे आचार्य ! हे शिक्षक प्रवर! आप अपनी गरिमा को पुनर्प्रतिष्ठत करें ; माँ भारती की झोली सुख-समृद्धि से भरें| जन जन की तरफ से आपको ये पंक्तियाँ समर्पित है-

तेज-तप-शील-ज्ञान की ख़ान, द्रोण-भृगु-परशुराम संतान

सनातन मूल्यों के आधार, स्वयं का कर तू फिर संधान

 

विगत गौरव अपना कर याद, करें गुरुवर निज से संवाद

रखा जिनके मस्तक पर हाथ, बन गए वे भूपति-नरनाथ

त्रिलोकेश्वर का झुकता शीश, आपकी पाने को आशीष

सृष्टि का कणकण देता मान, स्‍वयं का कर तू फिर संधान

 

पर्णकुटियां कंटकमय सेज , भाल में भासित भास्कर-तेज

भृकुटि में दाहक अनल प्रचंड , चित्त में व्याप्त अनादि अखंड

चक्षुओं में भूगोल- खगोल , जाह्नवी की उर में हिल्लोर

ऋचाएं – मंत्र साम के गान, स्वयं का कर तू फिर संधान

 

लालसा – स्वार्थ – मोह से मुक्त , दया-करुणा-समता से युक्त

कर्म में लीन सदा निष्काम, साध्य था राम अकिंचन दाम

क्षुद्रतम अहंकार से दूर, ज्ञान की गरिमा से भरपूर

लोकहित का क्षण-प्रतिक्षण ध्यान, स्वयं का कर तू फिर संधान

 

धर्म के मूर्तिमान अवतार, दुर्दशा अपनी ज़रा विचार

तजा तप-त्याग शील-सम्मान, बना याचक तज गौरव-ज्ञान

स्वार्थ मदमोह कलह से ग्रस्त, सूर्य कर स्वाभिमान का अस्त

हाय क्यों झेल रहा अपमान, स्वयं का कर तू फिर संधान

 

दैन्य अब त्याग गुरुवर जाग, जगा अपने भीतर की आग

शिथिलता के सब बंधन तोड़, हृदय से तार हृदय के जोड़

साधना से समाज को साध, सत्य-शिव-सुंदर को आराध

दिवसमणि युग के छोड़ थकान, स्वयं का कर तू फिर संधान

 

स्वयं की क्षमताओं को तोल, बेबसी का बाना दे खोल

क्लैब्यता की कैंचुली उतार, अरे ओ शेषनाग अवतार

जाग तू चणक-पुत्र चाणक्य, ठान यह कुछ भी नहीं अशक्य

भूल मत शिक्षक की पहचान, स्वयं का कर तू फिर संधान

One Response to “शिक्षक दिवस पर विशेष कविता / स्वयं का कर फिर तू संधान”

  1. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    लाजवाब कविता के लिए लेखक को साधुवाद

    Reply

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