पालघर की धरती पर, संतो के शव बिखरें हैं।

निर्दोषों को चोर बताकर
चोरों ने मारामारी की
पुलिस मूक हो खड़ी रही
बनकर छवि हत्यारी की
संतो के करुण क्रंदन पे
वो अट्ठाहस कर बिफरें हैं
पालघर की धरती पर
संतो के शव बिखरें हैं।

मद मे इतराना बलखाना
सब ईश्वर ने ये देखा है
जो भी अत्याचार किये
उन सबका बही मे लेखा है
असतित्व मिटाने पापों का
यम तुम पर अब उतरे हैं
पालघर की धरती पर
संतो के शव बिखरें हैं।

संतो की पावन धरती ये
संतो का कर्ज उतारेगी
इक इक हत्या के बदले
रणचंडी रूप संवारेगी
उन सबका पाप कुंभ भरेगा
जिन जिनको संत अखरें हैं
पालघर की धरती पर
संतो के शव बिखरें हैं।
–सुधीर मौर्य

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