मीणा भाषा की उत्पत्ति और विकास

श्री पिंटू कुमार मीना

“निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को शूल ।” भारतेंदु हरिश्चन्द्र का उक्त प्रसंग आज भी प्रासंगिक बना हुआ है । हम अपनी भाषा के अभाव में न अपना विकास पर पाएंगे और न ही अपने हृदय को आत्मसंतुष्टि दे पाएंगे । ‘चीनी’ और ‘जापानी’ भाषा से ही इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था विकसित हुई है । इस अर्थ में इस शोध-आलेख की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है । इस आलेख़ का महत्त्वपूर्ण कारण मीणा आदिवासी समाज को उनके भाषिक स्वरूप से जोड़कर देखना रहा है । मानवशास्त्रियों ने आदिवासियत के होने के पैमानों में ‘प्रजाति’ और ‘धर्म’ के अतिरिक्त ‘भाषा’ को भी प्रमुख पैमाना माना है । अत: कहना न होगा कि प्रत्येक आदिवासी समाज की अपनी एक भाषा होती है । राजस्थान की जनजातियों में सर्वाधिक संख्या मीणा आदिवासियों की है । ऐसे में यह मान लेना कि इस समाज की कोई भाषा नहीं रही है, बेमानी होगी । इस शोध-आलेख में हम ‘मीणी भाषा’ की उत्पत्ति और विकास की चर्चा करेंगे । इस दिशा में यह पहला व्यवस्थित शोध-आलेख होगा । शोध विषय को और अधिक प्रासंगिक और अर्थपूर्ण बनाने के लिए इस भाषा के व्यवहृत क्षेत्र और इसकी शब्द संपदा को इस भाषा के इतिहास के साथ देखा गया है । विश्व में अनेक भाषा परिवार हैं । ‘भारोपीय भाषा परिवार’ विश्व का सबसे बड़ा भाषा परिवार है । इसमें यूरोप और एशिया की भाषाओं को सम्मिलित किया गया है । भारत में ‘द्रविड़ भाषा परिवार’ की भाषाएँ दक्षिण भारत में तथा ‘आर्य भाषा परिवार’ की भाषाएँ उत्तर भारत में व्यवहृत हैं । भारत की सर्वाधिक पुरानी भाषा द्रविड़ भाषा परिवार की ‘तमिल भाषा’ है तथा आर्य भाषा परिवार की सबसे पुरानी भाषा ‘संस्कृत’ है । मीणा आदिवासी समुदाय राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में प्रमुखतया निवास करता है । मूल रूप में इनका उद्गम और विकास मत्स्य जनपद (अलवर और मेवात क्षेत्र) से माना जाता है । इनका विकास और विस्तार अधिकांशत: राजस्थान के सात जिलों में सर्वाधिक हुआ । इनमें करौली, सवाई माधोपुर, अलवर, धौलपुर, भरतपुर, दौसा और जयपुर प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त अजमेर, सीकर और प्रतापगढ़ में भी यह समुदाय बहुतायत से निवास करता है । प्रतापगढ़ के मीणा स्वयं को ढामोर कहलाना पसंद करते हैं । छपन्या के अकाल के दौरान करौली और डांग क्षेत्र के मीणा मध्यप्रदेश (इंदौर, उज्जैन, भोपाल) में स्थानांतरित हुए । उत्तर प्रदेश में जो मीणा आदिवासी निवास करते हैं वे भी अधिकांशत: राजस्थान से विस्थापित होकर गये हुए हैं । अत: इनके उद्गम और विकास के क्षेत्रीय इतिहास के आधार पर यह स्पष्ट है कि ‘मीणी भाषा’ के उद्भव के लिए हमें संस्कृत भाषा की विकास परंपरा को देखना होगा । भारतीय आर्य भाषा के विकास को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार देखा जा सकता है;- संस्कृत > पालि > प्राकृत > अपभ्रंश > हिन्दी व अन्य आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ । आधुनिक आर्य भाषाएँ अधिकांशत: उत्तर भारत में बोली जाती हैं । दक्षिण भारत की प्रमुख भाषाएँ तमिल (तमिलनाडु), तेलुगु (आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना), कन्नड (कर्नाटक) और मलयालम (केरल) द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं । भाषा का एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र होता है । लेकिन यदि भाषा का संबंध बाज़ारवाद या किसी महत्त्वपूर्ण मांग से जुड़ जाता है तब उसका भौगोलिक क्षेत्र विस्तृत होता है या प्रभावित होता है । • संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है जिसे ‘आर्य भाषा’ या ‘देव भाषा’ भी कहा जाता है । संस्कृति भाषा के दो रूप प्रचलित रहे । ‘वैदिक संस्कृति’ एवं ‘लौकिक संस्कृत’ । वैदिक संस्कृति में वेदों की रचना हुई और लौकिक संस्कृत में रामायण एवं महाभारत की रचना हुई । विकास क्रम में हिन्दी इसी आर्य भाषा ‘संस्कृत’ की उत्तराधिकारिणी मानी जाती है । • किसी भी भाषा के विकास क्रम में भाषा की पूर्वोक्त गत्यात्मकता और समयानुकूल बदलते रहने की स्वाभाविक प्रकृति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है । इसके अलावा यह भी सत्य है कि किसी भी भाषा का समूल नष्ट होकर नई भाषा का विकास नहीं हुआ बल्कि उसी का रूप परिवर्तित होकर नई भाषा का जन्म हुआ है । मीणी भाषा का जन्म प्राचीन भारतीय भाषाओं की ही कोख से हुआ है । जिसके साढ़े तीन हजार से अधिक वर्षों के इतिहास को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित करके आधुनिक भारतीय भाषा हिंदी तक की उत्पत्ति का विकास क्रम निर्धारित किया जा सकता है:- 1. प्राचीन भारतीय आर्यभाषा काल (1500 ई. पू. – 500 ई. पू.)- यह मूलत: संस्कृत काल रहा । भारतीय आर्यभाषाओं का विकास यहीं से हुआ है । 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक वैदिक संस्कृत काल रहा, जिसमें वेदों और उपनिषदों की रचना हुई । सन् 1000 ई.पू. से 500 ई.पू. तक लौकिक संस्कृत काल में रामायण, महाभारत की रचना हुई । 2. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा काल (500 ई.पू. – 1000 ई.) मध्यकालीन आर्यभाषा काल में तीन मुख्य भाषाएँ प्रचलित रही-  पालि (500 ई.पू. से – ईसा की प्रथम सदी):- इसमें बौद्ध धर्म के त्रिपिटकों की रचना हुई ।  प्राकृत (ईसा की प्रथम सदी से 500 ई.):- जैन धर्म के ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई ।  अपभ्रंश (500 ई.-1000 ई.):- भाषाविज्ञानियों ने अपभ्रंश को भ्रष्ट भाषा माना। अपभ्रंश का विकास प्राकृत से ही हुआ है लेकिन यह भाषा जनभाषा के रूप में अधिक लोकप्रिय रही । 3. आधुनिक भारतीय आर्यभाषा काल (1000 ई. से अब तक) अपभ्रंश भाषा के कई स्थानीय रूप कालांतर में प्रचलित रहे । जैसे जनभाषा मैथिलि और अपभ्रंश मिलकर अवहट्ट भाषा का विकास हुआ । यह मैथिलियुक्त विकसित अपभ्रंश थी । इसके उपरांत अपभ्रंश के कई रूप विकसित हुए । यहाँ विस्तृत विवेचन न करते हुए हम नीचे दी गई सारणी के अनुसार इसे विवेचित कर सकते हैं । हिंदी भाषा : उत्पत्ति एवं विकास संस्कृत  पालि  प्राकृत  अपभ्रंश  पुरानी हिंदी (हिंदी)      1500 ई.पू. से 500 ई.पू. 500 ई.पू. से 1 ई. 1 ई. से 500 ई. 500 ई. से 1000 ई. 1000 ई. से अब तक प्राचीन आर्यभाषा काल मध्यकालीन आर्यभाषा काल मध्यकालीन आर्यभाषा काल मध्यकालीन आर्यभाषा काल आधुनिक आर्यभाषा काल भाषा और साहित्य : पाणिनी के व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी में ‘वैदिक’ और ‘लौकिक’ नामों से दो प्रकार की संस्कृत भाषा का उल्लेख पाया जाता है । वैदिक संस्कृत काल में वेदों, ब्राह्मणग्रंथों, उपनिषदों के अलावा वाल्मीकि, व्यास, अश्वघोष, भाष, कालिदास तथा माघ आदि की संस्कृत रचनाओं का सृजन हुआ । दर्शन के अतिरिक्त इस भाषा में जब साहित्य लेखन हुआ तब वह लौकिक संस्कृत कहलाई । रामायण, महाभारत विभिन्न नाटक एवं व्याकरण ग्रंथों की रचना लौकिक संस्कृत में हुई । वैयाकरणों ने पालि प्राकृत एवं अपभ्रंश को लोकभाषा की मान्यता दी । इसका उदाहरण हम कालिदास के ‘अभिज्ञान शकुंतलम’ नाटक में देख सकते हैं । नाटक के अधम पात्र प्राकृत भाषा का प्रयोग करते हैं और उच्च श्रेणी के पात्र संस्कृत भाषा का उपयोग करते हैं । पालि और प्राकृत क्रमश: बौद्ध और जैन धर्म की भाषा रही । उक्त भाषाओं के आंचलिक रूप रहे हैं । साथ भी इनके कई भाषाई रूप भी रहे हैं । भाषाविदों ने अपभ्रंश भाषा को भी लगभग 7 रूपों में विभाजित किया । इस विभाजन का आधार भौगोलिक और क्षेत्रीयता रहा । आगे चलकर इन्हीं रूपों से हिंदी की विभिन्न बोलियों का विकास हुआ । अपभ्रंश के ये भाषा भेद और इनसे विकसित बोलियाँ इस प्रकार हैं- 1. शौरसेनी  पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, गुजराती 2. पैशाची  लहंदा, पंजाबी 3. ब्राचड़  सिंधी 4. खस  पहाड़ी 5. महाराष्ट्री मराठी 6. मागधी  बिहारी, बांग्ला, उड़िया और असमिया 7. अर्धमागधी पूर्वी हिंदी  शौरसेनी का संबंध सूरसेन (मथुरा के आसपास का क्षेत्र / मध्य देश की भाषा) से है तथा इस पर संस्कृत का सर्वाधिक प्रभाव है ।  पैशाची का संबंध सिंध क्षेत्र से तथा मागधी का संबंध मगध क्षेत्र से है । उपरोक्त विवेचन के उपरांत हम पाते हैं कि वैदिक काल में संस्कृत शिष्ट-भाषा थी और प्राकृत लोकभाषा । जब प्राकृत को शिष्टजनों ने अपना लिया, तब अपभ्रंश लोकभाषा बनी । आगे चलकर, जब अपभ्रंश साहित्यिक भाषा बनी तब अन्य लोक भाषाओं को आगे आने का अवसर मिला । हिंदी, मराठी, बांग्ला, पंजाबी आदि आधुनिक आर्यभाषाएँ इसी प्रकार अपभ्रंश से विकसित हुई । हिंदी का विकास हिंदी की विभिन्न बोलियों से मिलकर हुआ । इन बोलियों को पाँच क्षेत्रों के आधार पर विभाजित किया जा सकता है । पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी, पहाड़ी हिंदी, राजस्थानी हिंदी अपभ्रंश के गुर्जरी रूप से राजस्थानी का विकास हुआ । राजस्थानी भाषा कई बोलियों का रूप है । इन बोलियों की कई उप-बोलियाँ हैं । साथ ही कई विभाषा भी रही हैं । राजस्थानी भाषा की सिर्फ़ चार बोलियाँ ही नहीं हैं अपितु इसके अतिरिक्त अन्य कई बोलियाँ हैं लेकिन चूंकि उनका व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका, उनका मौखिक साहित्य भी वैयाकरणों की समझ में पूर्णत: नहीं रहा होगा इसलिए या तो उन्होंने इनके अध्ययन की आवश्यकता नहीं समझी या फिर मोटे तौर पर यह विभाजन कर, बचने का प्रयास किया । इसी समय की एक अन्य प्रमुख भाषा ‘मीणी भाषा’ थी । मीणी भाषा का व्यवहृत क्षेत्र मालवी और जयपुरी से कहीं अधिक रहा है । वैयाकरणों के सामने इसके वैज्ञानिक विभाजन की समस्या थी । इसका प्रमुख कारण यह रहा कि जितने शब्द इस भाषा में राजस्थानी भाषा के डिंगल रूप के रहे उतने ही ब्रज और पिंगल भाषा के रहे हैं । इसलिए किसी एक बोली के रूप में या किसी एक भाषा के रूप में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करना इनके लिए श्रमसाध्य था । चूंकि भाषिक वर्ग की दृष्टि से यह भाषा एक आदिवासी भाषा के रूप में पहचानी जानी चाहिए इसलिए अब संक्षिप्त रूप में आदिवासी भाषाओं के संबंध में इसका विवेचन करना अपेक्षित हो जाता है । नदीम हसनैन के अनुसार, “आदिवासी भाषाओं को मुख्य रूप से तीन भाषाई परिवारों में विभाजित किया जा सकता है । इनके नाम हैं भारतीय-यूरोपीय (आर्य), द्रविड़, ऑस्ट्रिक (कोलोर मुंडा) तथा तिब्बत-चीनी (चीनी तिब्बत)।” डी.एन. मजूमदार (1955) का मत है कि “जहाँ तक जनजातीय लोगों का संबंध हैं आर्य भाषा केवल सांस्कृतिक संपर्क के फलस्वरूप सामने आती है क्योंकि हमारे लगभग सभी जनजातीय लोगों का संबंध पूर्व आर्य अथवा अनार्य प्रजातियों तथा उद्भव से है ।” मीणी भाषा के उद्भव और विकास में भी सांस्कृतिक संपर्क मूल कारण रहा है । अत: अधिकांश विद्वानों का मानना है कि भारत की आदिवासी भाषाएँ मुख्यत: तीन भाषा परिवारों में वर्गीकृत की जा सकती हैं, 1. द्रविड़, 2. ऑस्ट्रिक, 3. चीनी-तिब्बती । लेकिन भारत के पांच भाषा परिवारों में आदिवासी साहित्य वाचिक और लिखित रूप में मौजूद है ।

1. ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार-इस परिवार की भाषाएँ झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़िया और पश्चिमी बंगाल क्षेत्र में व्यवहृत है । संथाली, हो, मुंडारी, खड़िया, सावरा इस परिवार की प्रमुख आदिवासी भाषाएँ हैं । संख्या की दृष्टि से संथाली सर्वाधिक बोली जाती है ।

2. चीनी-तिब्बती भाषा परिवार- यह भाषा भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के आठ राज्यों में बोली जाती है । इनमें नगा, आओ, अंगामी, मिजी, मोन्पा, तांङखुल, गारो, खासी, मणिपुरी, दफ़ला प्रमुख आदिवासी भाषाएँ हैं ।

3. द्रविड़ भाषा परिवार– यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा भाषा परिवार है । गोंड आदिवासियों की ‘गोंड़ी’, धांगर समुदाय की ‘कुडुख’ भाषा तथा मालतो आदि इस परिवार की प्रमुख आदिवासी भाषाएँ हैं । द्रविड़ भाषा परिवार की गोंडी भाषा में सर्वाधिक आदिवासी साहित्य मौजूद है ।

4. अंडमानी भाषा परिवार- जनसंख्या की दृष्टि से यह भारत का सबसे छोटा आदिवासी भाषाई परिवार है । अंडमानी, ग्रेड अंडमानी, ओंगे, सेंटीनली आदि यहाँ की प्रमुख आदिवासी भाषाएँ हैं । यहाँ आदिवासी साहित्य वाचिक परंपरा में मौजूद है ।

5. भारतीय आर्य भाषा परिवार- हिंदी, गुजराती, पंजाबी, डोगरी, गढ़वाली, कोंकणी आदि इस परिवार की प्रमुख भाषाएँ हैं । राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की आदिवासी भाषाएँ इसी भाषा परिवार के अंतर्गत आती हैं । इस क्षेत्र की आदिवासी भाषाओं में भीली, भिलाला, वागड़ी, गोंडी, मीणी और कुछ सीमा तक मेवाती में आदिवासी साहित्य मौखिक और लिखित रूप में उपलब्ध है । सांस्कृतिक संपर्क के फलस्वरूप आदिवासी भाषाओं में आर्यभाषाओं के शब्द घुल-मिल गए । इसी कारण ये भाषाएँ इसी वर्ग में आती हैं । उत्तर भारत में व्यवहृत भाषाओं को वैयाकरणों ने सामान्य तौर पर आर्यभाषा परिवार के अंतर्गत विवेचित किया है । यहाँ यह ध्यातव्य है कि ‘आर्य’ शब्द से आदिवासी भाषाओं को सामान्यत विवेचित किया जा सकता है लेकिन मानवशास्त्र के अनुसार नहीं । इस पद से आदिवासी प्रजातियों को जोड़ना अर्थसंगत नहीं होगा । अत: ‘मीणी भाषा’ उत्तर भारतीय भाषा परिवार (भारतीय आर्य भाषा परिवार) की आदिवासी भाषा है । भीली, गोंडी भी इसी परिवार की आदिवासी भाषाएँ हैं । इस परिवार की आदिवासी भाषाओं में समृद्ध साहित्यिक विरासत मौजूद है । ‘भीली भारत’ और मिथकों पर आधारित कई ग्रंथ भीली भाषा में लिखे गये हैं । मीणी भाषा की प्रमुख बोलियाँ और उनका व्यवहृत क्षेत्र – भाषिक भेद के अनुरूप इस भाषा का स्वरूप बदलता गया । यह परिवर्तन वाक्य के अंत में ‘च’, ‘छ’, ‘अ’ के रूप में देखा जा सकता है । ब्रज मिश्रित मीणी भाषा, माड़ी भाषा, मेवाड़ी युक्त मीणी भाषा, जयपुरी युक्त मीणी भाषा आदि इस भाषा के स्थानीय भेद हैं । ‘ब्रज मिश्रित मीणी भाषा’ को मूल मीणी भाषा माना जा सकता है । इसका क्षेत्र करौली, उत्तर-पूर्वी अलवर, संपूर्ण धौलपुर, करौली से सटा हुआ सवाई माधोपुर का क्षेत्र और दौसा का क्षेत्र आता है । मीणी भाषा की प्रमुख बोलियाँ इस समुदाय की एक लोक किवदंती है, “तीन कोस पे पाणी बदले, 8 कोस पे वाणी” भाषा के बदलने का यह स्वरूप इस भाषा की बोलियों के संबंध में उपयुक्त रूप में बैठता है । भौगोलिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक कारणों की वजह से स्थानीय अंचल के अनुरूप इसकी बोलियों का विकास हुआ है । मीणी भाषा की मुख्य रूप से ग्यारह बोलियाँ हैं और इन ग्यारह बोलियों की छोटी-छोटी विभाषाएँ हैं । आंचलिक स्तर पर इन बोलियों का संक्षिप्त नामोल्लेख अग्रांकित रूप में किया जा रहा है ।

1. राठी – मीणी भाषा की इस बोली का व्यवहृत क्षेत्र अलवर, राजगढ़ और दौसा का सीमांत क्षेत्र है ।

2. जगरोटी बोली– वयाना, हिंडौन सिटी, बजीरपुर तक के क्षेत्र में इस बोली का प्रयोग किया जाता है ।

3. डांग- करौली, करणपुर, कैलादेवी, सरमथुरा, बाड़ी, धौलपुर क्षेत्र में इस बोली का सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है । जगरोटी और डांग अंचल की बोलियाँ ब्रज भाषा से सर्वाधिक प्रभावित रही हैं ।

4. माड़ी– बामणवास तहसील, जाहिरा, बड़ीला, राणीला, गंगापुर ग्रामीण, उदई, शहर, सोप अंचल में माड़ी बोली का प्रयोग किया जाता है ।

5. तलहटी– बोड़ी, गंगापुर, सवाई माधोपुर, हाड़ोती अंचलों से घिरे क्षेत्र में तलहटी बोली का प्रयोग किया जाता है ।

6. नागर चाड़ी- टोंक-सवाईमाधोपुर क्षेत्र में नागर चाड़ी बोली का प्रयोग किया जाता है । तलहटी और नागर चाड़ी बोली में बहुत समानता है ।

7. हाड़ौती बोली- कोटा और बूंदी क्षेत्र में मीणा आदिवासी इस बोली का प्रयोग करते हैं ।

8. मेवाड़ी मीणी- बाँसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रमुखतया प्रतापगढ़ में इस बोली को सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाता है ।

9. गोडवाणी मीणी- सिरोही, रणकपुर क्षेत्र, ऐरिनपुरा अंचल में इस बोली का व्यवहार किया जाता है । इस बोली का मुख्य व्यवहृत क्षेत्र ऐरिनपुरा अंचल है ।

10. शेखावाटी मीणी– यह नीमका थाना, सीकर, झुन्झुनू क्षेत्र में व्यवहृत होती है । नीमका थाना इस बोली का मुख्य केंद्र है ।

11. ढूंढाणी-पचवारी- यह बोली रामगढ़ पचवारा क्षेत्र में बोली जाती है, जिसमें जयपुर, दौसा, लालसोट, बस्सी, चाकसू क्षेत्र आते हैं । इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जगरोटी और डांग बोली को ब्रज मिश्रित मीणी बोली के नाम से भी जाना जाता है । जयपुर अंचल में किसी एक बोली का प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि मिश्रित बोलियों का व्यवहार किया जाता है । डावरा, डिकोली, कुडगाँव और सपोटरा क्षेत्र की बोली में डांग और नागर चाड़ी बोली का मिला-जुला रूप उपलब्ध होता है । इन बोलियों में संस्कृत भाषा के शब्दों का नितांत अभाव है । कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको गोत्रों के आधार पर विभाजित किया गया है । यह विभाजन इन्हीं के आदि पुरखों ने किया है । गोत्रों की समानता के आधार पर मीणी भाषा के स्वरूप में थोडा-बहुत अंतर देखा जा सकता है । इन क्षेत्रों में ‘पचवारा’ अर्थात पाँच गोतों की पाल, यथा बैप्लावत, डोबवाड, बारवाल, गोठवाड एवँ चारवाड ।, ‘डांग’ करौली का पथरीला और न्यून पानी क्षेत्र है, जहाँ लाल पत्थर अधिक मिलता है । इस अंचल में करौली और धौलपुर का क्षेत्र आता है । ‘जगरवाड़’, ‘माड़’ आदि इसी तरह के अंचल हैं । ब्रज मिश्रित मीणी के अतिरिक्त ‘माड़ी बोली’ इसकी दूसरी सबसे प्यारी बोली है । मीणा आदिवासियों ने अपने क्षेत्र को अपने नज़रिए से देखा । भौगोलिक विषमता और गोत्रों के आधार पर इन्होंने समय-समय पर इन भू-भागों को ये नाम दिए हैं । यही इनके लोक का सच है । मीणी भाषा : भाषिक संरचना इस भाषा के वैज्ञानिक विवेचन के लिए इसकी भाषिक संरचना को समझना आवश्यक है । यह भाषा ओकारांत है । मीणी भाषा को संरचनात्मकता के स्तर पर विवेचित करते समय हमें यह आद्यन्त ध्यान में रखना होगा कि इसका रूप अंचल और भौगोलिक वातावरण के अतिरिक्त निकटवर्ती बोलियों से प्रभावित रहा है । इस भाषा की समृद्ध विरासत रही है । इसे और अधिक संगत अर्थ में समझने के लिए इसके लोक साहित्य को देखना होगा । इसकी शब्द संपदा बहुत विस्तृत है । मीणी भाषा के कुछ शब्द दृष्टव्य हैं; खटोटी- (आटा गूंथने का वर्तन), राँच- (थाल/सामान्य वर्तन), गैंती और फावड़ा – (मिटटी खोदने का औज़ार), कुड़ी- (कुंए से जल खींचने के काम में आने वाला औज़ार), हड़- (हल), दांतड़ी- (हंसिया/दाब), कुदाड़ी/कुराड़ी- (पेड़ काटने का धारदार हथियार), करेंडी- (ऊपला), बिटोड़ा- (करेंडी रखने के लिए बनाया गया छोटा घर), बाखड़-(घर/आँगन), सांकड़ा- (कुंदी), रही और जामणी– (मक्खन से घी निकालने का औज़ार), दामण- (चारपाई को एक तरफ़ से कंसने वाली रस्सी), पाई- (चारपाई का एक हिस्सा), सेरा- (चारपाई का लम्बवत हिस्सा), पाया- (चारपाई का एक पैर), जेवड़ी- (सामान्य रस्सी), चड़स- (कुँए से पानी खींचने का औज़ार), लेज- (लंबी रस्सी), कुलडी- (दैनिक जीवन के उपयोग में लाया जाने वाला वर्तन), ऐंडी- (पानी के घड़े को शिर पर स्थिर बनाये रखने के लिए मटके से पहले इसे सिर पर रखा जाता है), नाथ- (बैल को कृषि कार्यों के उपयोग में लाने के लिए उसके दोनों नथुनों में छेद कर इसमें रस्सी डालकर उसे आदि किसान अपने बस में करता है), गिरारे- (टेड़े-मेड़े छोटे रास्ते), लग्गे-ढग्गे- (आस-पास), दचकी- (पिचकी), डोल/डोड़- (मेंड), गड्डमड्ड- (ऊपर-नीचे), निपजी-(उपजी), लड्डी- (ऊट गाड़ी), न्यांहा- (यहाँ), भेड़े- (इकट्टे), भौत- (बहुत), पिण- (लेकिन), हम्बे रे- (हाँ रे), कऊ- (सिगरी), रपेटी- (दवाई), पदड़ता- (भागता), ब्यालू- (शाम का खाना), चीना- (चिन्ह), लोही- (खून) तथा छांद, डांडी, वरेंडी, थूणी, ओलाती, सिल-लो आदि इसी प्रकार के शब्द हैं । उपरोक्त विवेचित शब्दों का किसी अन्य भाषा में मिलना बहुत दुष्कर है । यही इस भाषा की खास विशेषता है । शब्द संपदा ही नहीं बल्कि इसके एक-एक शब्द की एक बड़ी संकल्पना है । जिसे कोई भी भाषा वैज्ञानिक तब तक नहीं समझ सकता जब तक वह इस समाज में उस संबंधित शब्द की प्रयोग भूमि और कला को नहीं समझता तथा यह तब तक समझ नहीं आएगा जब तक वह इस समाज के मध्य अधिक समय तक साथ नहीं रहेगा । इसके लिए भाषा वैज्ञानिक फादर जॉन हॉफमैन और वैरियर एल्विन की तरह आदिवासी समुदायों के मध्य रहना अपेक्षित है । समाजभाषा विज्ञान की दृष्टि से अध्ययन करने पर इसमें बहुत कुछ नई प्रयुक्तियों के दर्शन होंगे । ‘बखडेला’ , ‘छीका’ , ‘मछीका’ , ‘रांडवैर’, ‘भैकड़ो’, सुल्लड़, गेलड़ आदि इसी प्रकार के शब्द हैं । रेमंड विलियम्स का मानना है कि “शब्दों के प्रयोग के इतिहास के माध्यम से समाज ही नहीं प्रकृति से मनुष्य के बदलते संबंधों का इतिहास भी जाना जा सकता है ।” मीणी भाषा के शब्दों के माध्यम से प्रकारांतर से इनके इतिहास ही नहीं बल्कि इस समाज की पूरी जीवन-सभ्यता को पहचाना जा सकता है । मीणी भाषा के प्रमुख लोक शब्दों की संक्षित सूची दी जा रही है । इस विषय पर व्यवस्थित काम करने की आवश्यकता है । पाल- (मेड), कुण- (कौन), चोखी- (अच्छी), नाड- (गरदन), थान- (चबूतरा), डगर- (सकरा रास्ता), ठेपाडा- (धोत्ती), हस्ताडा- (अंगोछा), लत्ता- (कपड़ा), लीर- (कपड़े का टुकड़ा), साफी / सुआपी- (तौलिया), नेजा- (ध्वज), भिरम- (भ्रांति), ढोढ़ी- (नाभि), गडुआ- (जग), कतई- (बिल्कुल), तोड़ा- (कमी), घणी- (बहुत), नागली- (ज्वार), ताब- (ज्वर), महतारी- (माँ), ओवरा- (कमरा), मसाज्या- (श्मशान), झूठल- (झूठ), सांदी- (पशुओं का खाना), छिमा- (क्षमा), मँड़ई- (झोपड़ी), थे- (आप), कांचली- (कपड़ा), ठट्ठेबाजी- (मजाकिया), पटारी- (रेशमी धोती), टीली वराड़- (विवाह के समय का कर), कुंडी- (कुंदी), कूँची- (चाबी), इंडी उंडी- (यहाँ-वहाँ), बुहारी- (झाड़ू), गली-कूचडी (छोटी तंग गलियाँ), (दगड़ा- रास्ता), अगाड़ी कू (आगे से), सिगरी- आग की छोटी भट्टी, थड़ा- (थाल), फूंकणी- फूकनी, परात, डेलची, घंटी- स्टील या पीतल का जग, कुड़ेचली- बड़ा चम्मच, मूसड़- (अनाज कूटने का औज़ार), ओखड़ी- (जिसमें अनाज कूटा जाता है), छाबड़ा- (अनाज साफ़ करने का औज़ार), स्वापी/अंगोछा- (टावल), बुरसेट- (शर्ट), कब्ज़ा- (ब्लाउज), चादरो- (चद्दर), ज्यातड़, कमीज, नेफो- (ध्वजा), ढकोली- भूंसा हेतु प्रयुक्त होने वाला औज़ार, लारै- (साथ होना), पाडा- (छोटा भैंसा), हांडी- (मटकी), जेवडो- (रस्सी), रायो- (चूले के आगे की खाली जगह), चिरपरो साग- (तीख़ी शब्जी), ढावना- (दबाना), मिनख- (मनुष्य), डोकरा- (पिता), या बिगित- (इस समय), बाट- (रास्ता), टेंटी- (गर्दन), गमेंती- (आदिवासी मुखिया), हेला- (आवाज़), चौमासा- (बरसात के दिन), ग्यार, माटी, भाटो- (पत्थर), कड़ीली- (तवा), धूमाल- (दुश्मन पर हमला), आसरतू- (आधारित), गारत- (गढ्ढे), डील- (शरीर), नतण्या- (रोटियाँ ले जाने वाला कपड़ा), थूथरी- (मुँह), सौण- (सगुन), बिदकना- (परेशान होकर भागना), ढोक- (नमन), बाखड़- (आंगन एवं अहाता), टीपना-(पंचांग), हाड़ी- (जीवन भर सामंतों के दास), सही लीक- (ठीक रास्ता), सुस्सा- (खरगोश), दगड़ा- (रास्ता), मेंडा- (गाँव का छोर), छबल्यो, काकंरा, मोगरी, रेन्टल्यो, भुखारी, डाग्लो, कुट्टी, राबडी़, लपटों, फांसा, उनदरो, कुआड, खुरचना, हाबू, छाजड़ो, न्याड़ो, कान्दो, नेति, डांगिर, ओलाती, दामिण, भुआरो, बुआरी, खाट, जेबडो़, मोहर्री, नस्ण्णी, कुआड़, गुआडी़, मुड्डा, खोसडा़, चिद्दर, बडी़तो, फासा, तसली, विलोण्णी, कड़छुली, लोट्या, मग्गा, डब्बा, कंघा, करवाडी़, दांतडी़, चालडी़, भटा- (बैंगन), पिराण्डयो, छाणा, छान, माथो, नोहू, नाड़, कणिया, तुआयो, राख, जुआई, लुगाई, भैकड़ो आदि प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त महिलाओं के आभूषणों के नाम आधुनिक बाजार के शब्द नहीं बल्कि इनके पारंपरिक नाम हैं । यथा, (कडूला, गुलीबन्द, कोंदणी, सीतारानी विलास- (गिलट) इस भाषा के शब्दों में अर्थगत और उच्चारणगत मिठास है । इस मिठास का एक सबसे बड़ा कारण इस भाषा में ब्रज भाषा के शब्दों का होना भी है । इस भाषा के कुछ पदबंध और वाक्य दृष्टव्य हैं,- ‘छोरी पाणी मोड़बा जा जो री’, ‘तड़ा कु ले गो कतई’, ‘छोरी तू नहाई धोई करले री तोकू सासरे में जाणो है’, ‘डोकरा ले बैठयो कड़कड़ार’, ‘म्हारा काका तू सुणतो हो त्यो आज्या साग-भाजी सीड़ी हो री है, ओह दादी आजा ब्याडू कर लें, छोरा थारा काका कू ब्यालू कै मायने हेलो दे दै, गळा में कांटो चुबे, ज्यादा मत बोले नाई तो लीतरा पडिंगा, जीव घबरावे, ओ छोरी तू तो बहुत सोबाड़िक है, अरे ओ छोरा हुक्का धर दे नाहीं तो साड़ा की खोपरी कू लाल कर दूंगो, चौमासो मचा दियो कतई, आज मटाको को कणे खां जारोय, ‘ज्यादा मत अतराबे, मोकू सब पतो है थारो, खैबा सू काईं होय’, ज्यादा सीसा में मोहड़ो मत देख इतेक मलूक भी नाये, जायदा बोलेगी न तो अबार थारे पचाड़ी कुकरा लगा देवेंगा, अरि दावा सी की हमारे तो आज भैस ने दूध ही को दियो, नेक सीसी बग़ल कू हैज़ा री, नैक निकड़ जान दे पूरे रस्ताईये रोक कैनी खड़ी है गयी, ए दावा सी की हमकु काईं लेणो देणो दुनिया की बातन सू, हम तो कोइ की चुगली कुन करें, या हुक्का में पाणी घ्याल बेगो सो और चिलम कू लेजा थारी जीजी रोटी कर री होगी म्हा सूं छैणा की आग धर ल्याज्यो या चिलिम में, छोरा भैसन कू तूड़ो नीर दीजो । उलाहना सूचक शब्द/वाक्य- (गैबी, नपूतो (बिना औलाद का पिता), बड़ गैवी ने बाबड़ा बणा राखा हैं, गंडकड़ो, लोहड़ी ले बैठी कतइ, काई कु बाबड़ी बणबे आइये, लोहड़ी सौत, ओ म्हारा बीरा की लुगाई ओ बापखडी, ओ ऊधड़ाल, खुटौ गड़े तेरो, मरो रे भाभीयो, लोहड़ी सौत, गैबी, म्हारी सौत, ऐ बड़ गेवी, इक धमींड़ो पड़ेगो ने तो तीतरी आ ज्या ग़ी, गैबी तेरी खाल मार मांग री दीखे, मानजा देख, ओ गेबी ढूध उफड़गो, या छोरो में तो कतई लक्खण कोनी, लोहड़ी मेरा खसम कू तो खा गी अब काई चाहवे, जब सू खा तेरा बाप कू रो रो हो, मैं न्यू खू थारी रचना क्यूँ बिगड़ गी, रोडू, लोहडी, सौत, गैबी, रोडला) उपरोक्त शब्द और शब्दों की आर्थी संकल्पना के अतिरिक्त कुछ वाक्य और वाक्यांश भी दृष्टव्य हैं । हरिराम मीणा की ‘सांवड़या’ कहानी का एक संवाद दृष्टव्य है, “दिन चढ़ि आयो, काम को कोई अंत कोनी । इस्यां करो, थम जाओ अर हंडूकड़ी खेलो । म्हारी रोटी कोई छुरेट के हाथ खंदा दो । अर हाँ, आज तो तुहार है नए कोई माल-मलीदो तो बण्यो होयगो!” यह सांवड़या और उसके पुत्रों से हुए संवाद की एक छोटी-सी झलक है । इस प्रकार के कई संवाद इस कहानी में दिखाई देते हैं । ये लोक संवाद भी कहानी को विशिष्ट बनाते हैं । इन संवादों का तब तक अर्थपूर्ण विवेचन नहीं किया जा सकता जब तक इनको मीणी भाषा के संबंध में नहीं देखा जाएगा । इसके लिए समीक्षक को इस समाज के नजदीक रहकर काम करना होगा । मीणी भाषा में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख लोकोक्तियाँ एवं मुहावरे- बीछू का काटा रोवे अर साँप का काटा सोवे (बिच्छु के काटने पर दर्द होता है लेकिन साँप के काटने से मौत तक हो जाती है), ‘आज वार है तो काले कवार भी है’ (सब दिन एक समान नहीं होते), ‘इनका गाँव माँये गेर नी उजाड़ मौये खेती नी’ (न इनका गाँव में घर है और न बाहर खेत है), ‘दन्त्रा कोपे ते नई नी थाय’ (जगत नाखुश हो पर ईश्वर न हो), ‘तोपे राम खबड़ा जेम खाबजे’ (तुझे राम खिलाये वो खाना), ‘सब आपणो-आपणो हवारथ हारा ताके है’ (अपना-अपना स्वार्थ देखना), ‘पंगा आड़ी ने जोई ने नी हेंडे तो ठोकर लागे’ (जो पाँव को देखकर नहीं चलता उसे ठोकर लगती है ।) मीणी भाषा में मिलने वाला साहित्य : चूंकि यह भाषा वैयाकरणों और भारत सरकार द्वारा उपेक्षित रही है इसलिए इसकी लिपि का विकास नहीं हुआ । लेकिन देवनागरी लिपि में आज भी मीणी भाषा में भई, खाते का लेखन, हस्तलिखित लोक गीत, पद आज भी मिलते हैं । स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में श्री लक्ष्मीनारायण झरवाल एवं जैन मुनि मगर सागर ने अपने विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में इस भाषा का प्रयोग किया है । उनके समाज-सुधार के संदेश ब्रिटिश दौर में इसी भाषा में लिखे हुए थे । अत: जहाँ छुट-पुट मीणा जनजाति के भाव व्यक्त हुए हैं वहां देवनागरी लिपि के माध्यम से ही व्यक्त हुए हैं । आधुनिक काल में इस समुदाय से जो लेखक उभरकर आए हैं उन्होंने अपने लेखन में छुट-पुट इस भाषा के शब्दों का प्रयोग किया है । कथाकार हरिराम मीना की कहानी ‘पांच्या’, ‘बोत्या’, ‘घोडला’ और ‘सावडया’ में इस भाषा का माड़ी रूप मिलता है । जागाओं की पोथियों और इस समुदाय की जुवान पर आज भी यह भाषा मौजूद है । क्या लिपि के अभाव में किसी भाषा का अस्तित नहीं होता ? अवश्य होता है । भाषा का संबंध ‘टोन’ से होता है । उनकी लिपि का व्याकरण उनकी जवान पर होता है । इसके अलावा जो मौखिक साहित्य इस भाषा में मिलता है उससे इसकी साहित्यिक समृद्धि को देखा जा सकता है । कई आदिवासी लोक विधाओं में आज भी मीणी भाषा की जीवन्तता के दृष्टांत उपलब्ध हो जाते हैं । इन विधाओं में गीत, पद, सुड्डा, पच्वारा, कन्हैया आदि प्रमुख हैं । इन सब विधाओं की अपनी शैली है । हर शैली का अपना राग है और हर राग का अपना नृत्य । डॉ. रामदयाल मुण्डा भाषा संरक्षण पर बल देते हैं । उनका मानना है कि किसी समुदाय विशेष का आदिवासी ही उस समुदाय की भाषा का संवर्द्धन संरक्षण कर सकता है । इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं, “आदिवासी भाषाओं पर आधारित पुस्तकें बिरले ही मिलेंगी । उदाहरण के लिए फादर जॉन हॉफमैन ने 40 वर्षों तक मुण्डा लोगों के बीच रहकर उनकी भाषा मुण्डारी का अध्ययन करते हुए मुण्डारी विश्वकोश (16 खण्डों में- 10 हजार पृष्ठों से अधिक) लिखा जो कि किसी एक समुदाय पर लिखा गया विश्व का सबसे बड़ा ग्रंथ होगा, किन्तु तब भी बहुत सारी चीजें छूट गई हैं । यह शेष काम गहनतर भाषाज्ञान के बिना संभव नहीं होगा । इसके लिए आदिवासी को ही तैयार होना होगा ।” मौखिक परंपराओं-अनुभवों का सूत्रबद्ध संग्रथन लोकवार्तिक अनुशासन का मूल्यवान विषय है, जिस पर डॉ. मुण्डा ने विशेष बल दिया है । मीणी भाषा की स्थिति भी लगभग इसी प्रकार है । इस भाषा के संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास अपेक्षित है । साहित्य किसी भाषा को जीवंत बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है । इसलिए इस भाषा का मौखिक साहित्य लिखित रूप में सामने आना अपेक्षित है । रामविलास शर्मा के अनुसार आदिवासी भाषाओं के विकास का संबंध उनके सामाजिक-सांस्कृतिक विकास से है । उन्होंने ‘भारत की भाषा समस्या’ में लिखा है, “कुछ प्रदेश ऐसे हैं जहाँ लोग अभी आदिम समाज-व्यवस्था में ही रह रहे हैं । मध्यप्रदेश और राजस्थान के आदिवासी, न अपना न अपनी भाषाओं का विकास कर पा रहे हैं । इनकी भाषाओं के विकास की बात कोई हवाई सैद्धांतिक प्रश्न नहीं है । यह उनके सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का प्रश्न है । जनवादी आंदोलन और मजदूर वर्ग को उनके राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए ।” मीणी भाषा इसी क्षेत्र की प्रमुख आदिवासी भाषा है । किसी भी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए इस भाषा को प्राथमिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम बनाया जाना अपेक्षित है । साथ ही इन आदिवासी भाषाओं की लिपियों का विकास भी किया जाना अपेक्षित है ।

डॉ.नारायण उराँव ‘सैन्दा’ ने कुँडुख भाषा की लिपि-

‘तोलोंग सिकि’ का अविष्कार कर इस आदिवासी भाषा को नया जीवन दिया है । इस लिपि को www.newswing.com से डाउनलोड किया जा सकता है । पूर्वोत्तर की आदिवासी भाषाओं के लिए ‘तानी लिपि’ का विकास किया जा रहा है । गोंडी भाषा के लिए प्रो.तिरुमल राव ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित आदिवासी अध्ययन और अनुवाद केंद्र की सहायता से ‘गोंडी लिपि’ का विकास किया है । आदिवासी भाषाओं में ‘संथाली भाषा’ को बांग्ला, रोमन, देवनागरी और उड़िया में लिखा जाता है । इसलिए मीणी भाषा के साथ लिपि की समस्या अधिक नहीं है । इस भाषा के लिए देवनागरी लिपि सर्वाधिक सहायक होगी । आवश्यकता इसके शासकीय संरक्षण और शब्दकोषों के निर्माण की है । उम्मीद है इस आलेख के प्रकाशन के बाद इस समाज के शोधार्थी और भाषा-वैज्ञानिक इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करेंगे । यदि कोई आदि भाषा आज तक भाषाविदों की नज़रों में नहीं आई तब इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि वह भाषा जीवित-जागृत नहीं थी । इसी प्रकार यदि किसी भाषा की कोई लिपि नहीं है तब इसका मतलब यह नहीं कि कोई भाषा जीवित-जागृत नहीं थी । मीणा आदिवासी समुदाय आज तक जिस भाषा का प्रयोग करता आया है क्या वह भाषा नहीं है ? निश्चित रूप से वह एक चिरकाल से चली आ रही भाषा है । उसका अपना एक इतिहास है जिसे वैयाकरणों और भाषाविदों ने जानना या समझना आवश्यक नहीं समझा। कई दफ़ा जब शोध का कोई विषय अधिक मेहनत कराने लायक होता है तब शोधार्थी अपना शोध विषय बदलने की ही सोचने लगता है । इसके चिरकाल से चले आने के प्रमाण पुरानी बही और पुराने हस्तलिखित खातों में मिलेंगे । इससे भी अधिक जानकारी के लिए भाटों और चारणों की पोथियों को खंगालने की आवश्यकता है । वे संबंधित समुदाय में उस समुदाय विशेष की भाषा में उसके इतिहास और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते थे । आज़ादी से पहले तक के कुछ प्रमाण हमारे पुरखों, जो आज भी जीवित हैं, उनके पास उपलब्ध है । जब से विद्यालयी जीवन में स्कूल जाते थे तब उनके अध्ययन-अधिगम की अपनी भाषा में व्यवहृत एक प्रक्रिया थी । हिंदी की वर्णमाला को भी वे अपनी मातृभाषा में पढ़ते थे । यथा,- “कक्कौ रे केबरियों, भाभी कू ले गो देवरियों”, “घ सू घंटाड़ी, आगे नयो भाग्यो जाय” इसी तरह क, ख और ग को याद करने के लिए,- “सौमण को लाकड़ों, जे कू खा गो भाकड़ो ।” इतिहास विषय के अधिगम के उदाहरण के रूप में,- “सतरा से उन्ताड़ा नादिर ने तोड़ा ताड़ा ।” (अर्थात 1739 में नादिरशाह की मृत्यु हुई थी।) गणित की टेबल याद करने के लिए आज बच्चों को रटाया जाता है । या कुछ गिने चुने सूत्र दिए जाते हैं । गणित की ये टेबल (सारिणी) एक से सौ तक एक क्रम में याद कराई जाती है । जबकि मीणी भाषा में दो या चार के पहाड़े नहीं बल्कि सवा (1.25), डेढ़ (1.30), ढाई (2.30), पौने तीन (2.75), पौने पाँच (4.74) आदि के पहाड़े भी पढ़े जाते हैं । इन्हें क्रमश: सवैया, ढेढ़ा, ढामा, ढोचा और पौंचा के पहाड़ों के नाम से अभिहित किया जाता था । मेरी जानकारी में मीणी भाषा पर अभी तक कोई शोध-आलेख प्रकाशित नहीं हुआ है । इस दिशा में यह पहला प्रयास होगा । इस दृष्टि से प्रतुत शोध आलेख की उपादेयता और भी बढ़ जाती है । इस आलेख के समग्र विवेचन के उपरांत यह अवश्य कहा जा सकता है कि शोधार्थियों को इस दिशा में अपेक्षित पहल करने की आवश्यकता है । फ़िलहाल यह एक शुरुआत है । इस आलेख को पूरा करने में कथाकार हरिराम जी तथा शब्द चयन हेतु श्री देव प्रकाश जी एवं अन्य साथियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है ।

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