प्रकृति सम्मत् हमारा नववर्ष


                                                                                            डॉ. हेमेन्द्र कुमार राजपूत

प्रकृति ने भारतवर्ष की भौगोलिक संरचना इस प्रकार की है कि भारत की इस हिन्दू भूमि को प्रकृति के द्वारा प्रदत्त मौसमों का भरपूर आनंद प्राप्त होता है । दुनिया के किसी देश को छ: ऋतुओं का आनंद प्राप्त नहीं होता । मैक्समूलर से जब दुनिया के विद्वानों और भूगोलवेत्ताओं ने पूछा कि धरती पर स्वर्ग कहाँ है तो उसने अपना प्वाइंट (संकेतक) उढ़ाया और भारत के मानचित्र पर रखते हुए कहा कि यह है दुनिया का स्वर्ग । भौगोलिक दृष्टि से सम्पन्न और मानव सभ्यता का अंकुरित देश – भारत । आखिर क्यों न हो, क्योंकि प्रकृति ने सब तरह से और अनेक रंगों में जो रंग दिया है ।

सर्वप्रथम हमारे हिन्दू नववर्ष का महत्व इस बात से ही प्रकट होता है कि उदय होते सूर्य और सूर्य की किरणों के प्रकाश से प्रकाशित प्रात: की बेला में हिन्दू नववर्ष का आगमन होता है । अंधकार दूर हो रहा है, अज्ञानता दूर भाग रही है । सूर्य का भगवा प्रकाश चारों ओर फैलते हुए भारत में नई ऊर्जा को उदीप्त कर रहा है । वसन्त ऋतु जो ऋतुओं का राजा है, में चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपदा) तो विक्रम सम्वत् 2076 युगाब्द (कलियुग) 5120 वाँ वर्ष अंग्रेजी तिथि 6 अप्रैल 2019 को शुभारम्भ हो रहा है । अन्यत्र दुनिया में कही ऐसा नहीं है । घोर रात्रि के अंधकार में 12 बजे ईसाई जगत का नववर्ष प्रारम्भ होता है जब सब सोये होते हैं चारों ओर अज्ञानता और प्रकृति का अंधकार ही अंधकार । अंग्रेजों की तिथियाँ रात्रि के 12 बजे के बाद शुरू होती हैं जबकि भारतवर्ष में हिन्दू तिथियाँ सूर्योदय से प्रारम्भ होती है । चन्द्रमा के बढ़ते प्रकाश से मास का शुक्ल पक्ष और घटते प्रकाश से कृष्णपक्ष प्रारम्भ होता है । गांवों में जिन्हें चाँदनी रातों के दिन और अंधरी रातों के दिन कहा जाता है । सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है पृथ्वी और पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है चन्द्रमा । हिन्दुओं का सारा जीवन चक्र ही प्रकृति सम्मत् है ।

हिन्दू पूर्वजों ऋषि – महर्षियों ने नववर्ष का शुभारम्भ बसन्त ऋतु को ही क्यों स्वीकार किया यह भी प्रकृति के अनुसार है । बसन्त ऋतु में प्रकृति में नई बहार आती है । पेड़ – पौधों में नई – नई कोंपले (पत्ते) आते हैं । वृक्षों में मौंरें और नई सुगन्ध सर्वत्र विस्तारित होती है । सर्वत्र फूलों की सुगन्ध होती है । नये – नये फूल खिलते है । कठोर शीत ऋतु समाप्त हो जाती है । कृषि प्रधान देश होने के कारण भारत में हरे – भरे खेत खलिहान खाद्यान्न फसलों से भरे होते है उनका रंग स्वर्णिम हो जाता है अर्थात् वे पक जाते हैं । किसानों के घर अन्न से भरने लगते हैं । चारों ओर खुशी का माहौल होता है इसलिए इस नववर्ष के आगमन पर वैशाखी उत्सव मनाया जाता है । नववर्ष के नवरात्र प्रारम्भ होते हैं । राक्षसों का अन्त कर हिन्दुस्थान को दैत्य शक्तियों से मुक्त करा कर माँ भवानी दुर्गा ने विजयश्री प्राप्त की थी इसलिए माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है । नौ दिनों में दुर्गा शक्ति ने राक्षसों का अन्त कर दिया था । प्राचीन काल से ही दुर्गा पूजा भी नववर्ष के प्रारम्भ प्रतिपदा से ही होती है ।

भारत की जलवायु के अनुरूप भारत के बारह महीनों, छः ऋतुओं और चौबीस पक्षों का अपना महत्व है । प्रथम मास चैत्र फिर क्रमशः बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष (पूस), माघ, फाल्गुन । इसीप्रकार 2 महीनों की एक ऋतु । चैत-वैशाख मास में बसन्त ऋतु, ज्येष्ठ-आषाढ़ मास में ग्रीष्म ऋतु, श्रावण-भाद्रपद मास में हेमन्त ऋतु और माघ-फाल्गुन मास में शिशिर ऋतु । इस प्रकार छः ऋतुऐं भारत में प्रकृति के अनुसार ही आती है लेकिन दुनिया के अनेक देशों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने वाला ईसाईयत का विस्तार करने वाले अंग्रेजों के वर्ष और महीनों में प्रकृति साम्यता नहीं है । भारतवर्ष की अखण्डभूमि पर हिन्दू नववर्ष की जड़ें इतनी गहरी थी कि अंग्रेजों को भी शिक्षा सत्र और वाणिज्य – वित्तिय वर्ष की शुरूवात भी हिन्दू नव वर्ष से ही करनी पड़ी । 31 मार्च को शिक्षा सत्र और वित्तीय वर्ष की समाप्ति होती है और एक अप्रैल से इन सभी सत्रों की शुरूवात होती है । यह हिन्दू नव वर्ष की प्रत्येक काल में प्रासांगिक महत्ता रही है और आज भी है । इसलिए प्राचीन काल से ही अखण्ड भारत की भूमि पर अनेक महत्वपूर्ण कार्य चैत्र मास की शुक्ल पक्षीय प्रतिपदा से ही शुभारम्भ हुए हैं । ब्रह्मा जी को जब सृष्टि प्रारम्भ करना पड़ा तब उन्होंने इस तिथि को ही चुना । श्री रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक, धर्मराज युधिष्ठिर का चक्रवर्ती – राज्याभिषेक और सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ तब इसी दिन से विक्रम संवत प्रारम्भ हुआ । स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्यसमाज की स्थापना की और ” कृणवंतो विश्वंआर्यम् ” का संदेश दिया । सम्राट विक्रमादित्य की ही तरह हूणों को पराजित करके शालिवाहन यशोधर्मा ने दक्षिण भारत में इसी दिन हिन्दू राज्य स्थापित किया । सौभाग्य और ईश्वरीय संयोग से महर्षि गौतम, हिन्दूओं के रक्षक सिख द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी, सिंध प्रान्त के प्रसिद्द समाज रक्षक सनातनी हिन्दुओं के वरूणावतार श्री झुलेलाल और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापक प. पू, डा. केशवराव बलिराम हेड़गेवार जी का जन्म दिवस भी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि प्रतिपदा ही है इसलिए इस तिथि को नव वर्ष की प्रतिपदा कहते हैं । यह नव वर्ष समाज में नई उमंग, उत्साह, ऊर्जा और हर्षोल्लास का संचार करता है ऐसा प्रकृति अथवा जलवायु के अनुसार स्वतः ही स्फूर्त होता है । आप सभी पाठकों को इस हिन्दू नव वर्ष विक्रम सम्वत् 2076 के शुभागमन पर बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाऐं । यह हिन्दू नव वर्ष आप सभी के लिए समृद्धशाली, कल्याणकारी एंव मंगलमय हो । लेकिन यह हिन्दू नव वर्ष  तभी मंगलमय होगा जब सभी हिन्दू संगठित होंगे । हिन्दू धर्म की दृष्टि से यह हिन्दू नव वर्ष सभी जातीय एंव पंथिक भेद भाव भुलाकर संगठित होने की प्रेरणा देता है । यदि आप सभी संगठित विजय शालिनी संग्रहित धर्म निष्ठ हिन्दू शाक्ति से धर्म का रक्षण करते है  तभी यह हिन्दू धर्म आपकी रक्षा करेगा —-

“धर्मोरक्षतिरक्षत:” – यही सनातन सत्य है ।

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