पर्यावरण लेख

पर्यावरण संरक्षण से ही होगा अपना रक्षण

डा. विनोद बब्बर

प्रथम जुलाई को पूरी दुनिया के साथ भारत भी वन महोत्सव मनाया जाता है। वर्षा से जब वातावरण और भूमि में नमी होती है तो ऐसे में पौधे लगाना अनुकूल  हैक्योंकि उन पौधों की जड़े जमने की संभावना अधिक होती है। लगभग सभी विभागों, संस्थानों और स्वयंसेवी संगठनों की ओर से वृक्षारोपण की धूम दिखाई देती है। हर वर्ष वन महोत्सव के अवसर पर एक ही दिन में करोड़ों पौधे लगाए जाने के समाचार होते हैं लेकिन उसके बावजूद पर्यावरण लगातार बिगड़ना संदेह उत्पन्न करता है कि जमीन से ज्यादा वृक्षारोपण समाचार पत्रों से सोशल मीडिया के चित्रों में ही दिखाई देता हैं। 

तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं के कारण पर्यावरण पर भी दबाव बढ़ रहा है। इसीलिए प्रधानमंत्री जी की पहल पर देशभर में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान चलाया जा रहा है। ऐसे प्रयास सराहनीय है लेकिन केवल पौधारपण से ही समस्या का समाधान नहीं होगा। लगाए गए प्रत्येक पौधे की  सतत निगरानी और उनके रक्षण के लिए हर संभव उपाय किए जाने की आवश्यकता तो है ही, अंधाधुंध पेड़ काटने का भी संज्ञान दिया जाना चाहिए।

 गत वर्ष तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद की उस शर्मनाक और आत्मघाती कृत्य की सोशल मीडिया पर बहुत चर्चा रही जिसमें हैदराबाद के फेफड़े कहे जाने वाली कांचागाची बोवली गांव से सटी वन भूमि पर उन 40, 000 से अधिक वृक्षों को काट दिया गया जो न केवल पूरे क्षेत्र को प्राणवायु दे रहे थे बल्कि लाखों जीव जंतुओं का आश्रय स्थल भी थे। राष्ट्रीय पक्षी मोर सहित हजारों पशु-पक्षियों का काल बनी इस घटना की व्यापक निंदा आलोचना हुई। अनेक ऐसे वीडियो भी सामने आए जिसमें मासूम खरगोश हिरण आंसू बहा रहे थे। द्रवित कर देने वाले इन दृश्यों का वहां की सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि उसे वह जमीन बेचकर बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त होने वाली थी। उसने उच्चतम न्यायालय में बेरोजगारी का तर्क प्रस्तुत करते हुए उस भूमि पर उद्योग तथा व्यापारिक केंद्र स्थापित करने की दुहाई दी। यह संतोष की बात है कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने उस कुतर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि संपूर्ण देश रोजगार और विकास चाहता है लेकिन पर्यावरण की कीमत पर ऐसे अपराध की अनुमति नहीं दी जा सकती। वास्तव में तेलंगाना सरकार और उसके अधिकारियों की असंवेदनहीनता इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी संस्कृति और उसमें समाहित जीवन मूल्यों से कट रहे हैं। इसलिए यह आज की परम आवश्यकता है भारतीय संस्कृति में जिस पर्यावरण चेतना को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है उसे स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर देश के हर बच्चे के हृदय में स्थापित किया जाए। 

केवल भारत ही नहीं,  सभी विकासशील देशों में विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि सामान्य बात है। यदि कोई पर्यावरण संरक्षण पर बल देता है तो उसे विकास विरोधी घोषित किया जाता है। जब भी कहीं भी वृक्ष काटे जाते हैं तो एक के बदले दस वर्ष लगाने के दाने किये जाते है। पर पेड़ लगाने और पेड़ बचाने के बीच की गहरी खाई को पाटने के लिए फाइलों में चाहे कुछ भी होता हो लेकिन धरातल पर बहुत कम होता है । इस सवाल का जवाब अवश्य होना चाहिए कि पिछले दस वर्षों में कितने पेड़ कटे और कितने लगाये गये?  ‘अब तक कितने लगाये गये और कितने लगे हैं’ के सांख्यिक समीकरण को आने देखा नहीं किया जा सकता।

विकास का अर्थ ‘स्वस्थ परिस्थितियों में यातायात और संचार की आधुनिक सुविधाओं संग लोगों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हो सकता।’  विकास के साथ धुआं, जहरीले गैसों को अनिवार्य रूप से विकास के उपउत्पाद के रूप में क्यों स्वीकार करने की बाध्यता होनी चाहिए?

पर्यावरण की रक्षा हम सभी का के जीवन की रक्षा की तरह अनिवार्य है लेकिन इधर सोशल मीडिया पर फोटो चेपने के प्रचलन मैं इस पवित्र कार्य को भी ढोंग बना दिया है। इसीलिए सेलिब्रिटी और महत्वपूर्ण लोगों का दायित्व अखबारों में छपवाने तक सिमट कर रह गया है। ‘पेड़ लगाओ, फोटो खिंचवाओ और भूल जाओ’ अर्थात  ‘हमारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।’ जैसे नकारात्मक व्यवहार से पर्यावरण में कोई सकारात्मक बदलाव होने वाला नहीं है।

लेकिन लगता है नये दौर मे  हमारे समाज की सोच बन गई है कि स्मार्ट सिटी बनानी है तो वृक्ष लगाने की बजाय चित्र दिखाने वाला स्मार्ट बनना युग की मांग है। 

प्रशासन और सरकार को ‘अचानक हजारों पेड़ काटने की जरूरत क्यों आन पड़ी? क्या योजना एक सतत कार्य नहीं है? पूर्वानुमान क्यों नहीं लगाया गया? काटने से पहले ही एक के बदले दस पेड़ क्यों नहीं लगाये गये?’ जैसे प्रश्नों पर विचलित होने की बजाय गंभीरता से उनके उत्तर तलाशने चाहिए। जब यह सभी को मालूम है कि पेड़ों के कटने से आक्सीजन की कमी होगी तो क्या इसलिए वृक्ष काटे जाते हैं कि इससे रोजगार के नये अवसर खुलेगे अर्थात दम घुटेगा तो पानी की बोतलों की तरह आक्सीजन की बोतले बिकेगी। यह सत्य है कि  सांस के रोगियों की संख्या बढ़ेगी तो डाक्टर, दवा, जांच-केन्द्रो की मांग भी बढेंगी। लेकिन हमें ऐसी रोजगार वृद्धि नहीं चाहिए जो देश के सामान्य जन लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करे।

आश्चर्य है कि जिस देश में पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों ने अपनी जान तक की बाजी लगा दी। चिपको आंदोलन हुए। वहां वन महोत्सव जन आंदोलन नहीं बन पा रहा है। यदि वृक्ष लगाने की रस्म अदाएं की भी होती हैतो एक सप्ताह में ही उनमें से अधिकांश पौधे ढूंढने पर भी नहीं मिलते। पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन बनाने के लिए एक और स्कूली छात्रों में आरंभ से ही इसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करनी होगी तो दूसरी ओर हमारे सभी धर्माचार्य को भी पहल करनी होगी। उन्हें जन-जन को समझना होगा कि अपने हर शुभ अवसर पर न केवल वृक्ष लगाए जाएं बल्कि उन्हें संरक्षित भी किया जाए। यह प्रसन्नता की बात है कि  ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के अंतर्गत बूथ अर्थात मौहल्ला स्तर पर वृक्षारोपण किया जा रहा है। सरकार को हर शहर का कुछ भाग वन क्षेत्र के लिए सुरक्षित करना चाहिए तो हर बस्ती में एक छोटा या बड़ा पार्क अवश्य बनाया जाए जहाँ फूलों की सजावटी पौधे के साथ-साथ नीम जामुन पीपल पाकड़ बरगद जैसे वृक्षों के पौधे भी लगाए जाएं। इन पौधों को नुकसान पहुंचाने को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। दोषियों को दंडित करने के लिए प्रतिदिन सुनवाई के प्रावधान से बदलाव की आशा की जा सकती है अन्यथा पौधारोपण हुआ फोटो खींची, अगले दिन जब अखबार में फोटो और खबर छपी तब तक मैदान साफ मिलेगा। आशा है केंद्र और राज्य सरकारें इस बार वन महोत्सव पर पूरी गंभीरता से परिवेश को हरा भरा बनाने के लिए कृत संकल्पित रहेंग।

डा. विनोद बब्बर