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    कांग्रेस की सोच पर हमारी समझ

    अनिल अनूप

    पहले वर्ष 2014 में और दोबारा 2019 में कांग्रेस ने संसद के लिए हुए चुनावों में बड़ी पराजय का सामना किया। जिस पार्टी ने कभी भी 200 से कम सीटें नहीं जीती थीं, उसे दो अंकों में सीटें मिलीं और अब उसके पास केवल 45 सीटें हैं। लगातार दो चुनावों में उसे एक जैसी सफलता मिली, जो कि उस पार्टी के लिए अपयश का कारण है जिसने करीब 60 वर्षों तक देश में शासन किया तथा महात्मा गांधी, वल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना आजाद तथा कई अन्य महान नेता जिसके पैरोकार रह चुके हैं। इसके अलावा कांग्रेस वही पार्टी है जिसने भारत को आजादी दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। कांग्रेस पार्टी अपनी सम्मानजनक ऊंचाई से गिर कर उस निम्न स्तर तक पहुंच चुकी है, जहां उसके पुनरुत्थान की कल्पना करना भी कठिन है। कांग्रेस बार-बार बढ़ती अपेक्षाओं के किले बना रही है, किंतु वह बार-बार गिर रही है। राजीव गांधी, जो युवा भारत के ‘डिजीटल फेस’ थे, की मृत्यु के बाद कोई भी ऐसा नहीं हुआ जो ‘स्टेज का सेंटर’ अधिग्रहित कर पाए। कांग्रेस ने कई ऐसी अनैतिक व अलोकतांत्रिक परिपाटियां शुरू की, जिन्होंने पार्टी को दिन-प्रतिदिन ऐसे गड्ढे की ओर धकेला जिसमें अब यह गिर गई है। अब उसके 23 नेता चाहते हैं कि आत्मनिरीक्षण करते हुए पार्टी में बदलाव लाए जाएं, परंतु पार्टी इसके लिए तैयार नहीं है। उन्होंने मात्र एक पत्र लिखा था, किंतु अब इस गुनाह के लिए उनको निशाने पर लिया जा रहा है। पार्टी के पुराने नेता गुलाम नबी आजाद ने पहली बार ‘गुलामी’ को छोड़कर ‘आजादी’ अपनाते हुए वर्तमान व्यवस्था को चुनौती दी है। वह अर्थपूर्ण ढंग से कहते हैं, ‘अगर हमारे पास निर्वाचित अध्यक्ष नहीं होगा, तो हमें आने वाले 50 सालों तक चुनाव में हार का सामना करना पड़ेगा।’ अगर चुनाव नहीं होते हैं तो पार्टी 50 साल के लिए विपक्ष में बैठी रहेगी। गत 28 अगस्त को उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि हम चुनाव पर चुनाव हारते जाएंगे, अगर हम पार्टी अध्यक्ष को चुन नहीं पाए, तो।

    गुलाम नबी आजाद और उनके साथी कांग्रेस के उस शून्य की ओर इशारा करते हैं जो आज पार्टी में है, जबकि पहले वह योग्य और उपलब्धियों वाले नेताओं से भरपूर थी। इस पार्टी के पास सुभाष चंद्र बोस जैसे दक्ष नेता थे जो देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ते हैं। वह निर्वाचित होकर कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे, किंतु वह अध्यक्ष ही नहीं बने रहे क्योंकि कांग्रेस की मंडली ने उन्हें काम नहीं करने दिया। आजादी के समय में कांग्रेस नेताओं के बहुमत तथा प्रदेश कांग्रेस प्रमुखों ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को अपना नेता होने की पसंद बताया था, किंतु वह नेहरू को स्वीकार्य नहीं थे क्योंकि उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि वह पटेल के नेतृत्व में काम नहीं करेंगे। उन्होंने यहां तक कि पटेल के खिलाफ चुनाव लड़ने की धमकी दे दी थी। महात्मा गांधी, जो कि सभी नेताओं के बीच समन्वय स्थापित कर रहे थे, ने सरदार पटेल को अपना दावा वापस लेने के लिए कहा क्योंकि कांग्रेस को एकता बनाकर रखनी थी तथा सौहार्द की भावना के साथ काम करना था। मेरे विचार में गांधी ने इस मनोनीत नेतृत्व के बीज को रोपा था। अगर उन्होंने पार्टी में चुनाव की इजाजत दी होती तो भारत का इतिहास पाकिस्तान व चीन के संदर्भ में काफी अलग होता।

    इस निर्णय ने घटनाओं को प्रचंड मोड़ दिया जिसने आने वाले समय में कांग्रेस की पूरी कार्यशैली को निरूपित किया। हालांकि पार्टी लोकतांत्रिक होने का दावा करती है, फिर भी यह महत्त्वपूर्ण मसलों में प्रधानमंत्री के अंतिम आदेश-पत्र को स्वीकार करती है। चुनाव को भूल जाना पार्टी की संस्कृति बन चुका है तथा मनोनयन को स्वीकार करना अथवा बनावटी चुनाव को स्वीकार करना, अब नियम बन चुका है जहां वर्किंग कमेटी में पहले से स्वीकृत नेताओं पर मात्र सहमति प्रकट की जाती है। कांग्रेस इसी को लोकतंत्र कहती है। लोकतांत्रिक भावना को सबसे बड़ा धक्का गांधी परिवार को राजसी कुर्सी पर रखना तथा जननेताओं (जनता को स्वीकार्य नेताओं) को उनके पीछे रखना है।

    ग्रास रूट स्तर पर सर्वहारा वर्ग के लिए काम करने के बजाय सिस्टम कार्यकर्ताओं को सिखाता है कि वे मनोनीत ‘अवस्थानों के रिवार्ड’ के लिए काम करें। योग्यता और जनता के साथ सीधा संपर्क सुनिश्चित करने वाली चुनावी जीत को दूसरी पसंद बना दिया गया है। पार्टी का संविधान अप्रासंगिक हो गया है क्योंकि नेताओं ने सबसे बड़े बॉस की पसंद के अनुसार पद कब्जाए हुए हैं। इसे हाईकमान की संस्कृति कहते हैं तथा यह लोकतांत्रिक नेतृत्व वाली संस्कृति के खिलाफ काम करती है। मैं ऐसे मामलों को जानता हूं जब नियमों का सम्मान किए बिना पूरी तरह असंवैधानिक कार्य किया जाता था।

    एक मामले में मैंने भी विरोध जताया था तथा संवैधानिक उपचार चाहता था, किंतु किसी ने इसकी परवाह नहीं की। ग्रास रूट स्तर पर चुनाव जाली थे, हस्ताक्षर भी जाली होते थे तथा हाईकमान में कोई भी इसकी परवाह नहीं करता था। पार्टी में हर कोई इस ‘राजसी सान्निध्य दौड़’ का अभ्यस्त हो गया तथा कोई भी सामाजिक व दलीय कार्य नहीं हुआ। उत्तर पूर्व में हेमंत बिस्वास सरमा तथा मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी को छोड़ दिया और उसे क्षति पहुंचाई। हाल में कांग्रेस को राजस्थान में हानि होने से बच गई क्योंकि अंत में बगावती सुर अपनाए सचिन पायलट किसी तरह मना लिए गए। कांग्रेस में पार्टी की जगह परिवार और नेता ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गए हैं। यह बिलकुल उचित समय है जब कांग्रेस को अपने पुनरुत्थान के लिए दृढ़ता के साथ कदम उठाने होंगे, बजाय इसके कि वह मात्र सत्तारूढ़ दल अथवा प्रधानमंत्री को ही गालियां निकालती रहे। पार्टी से मूल्यवान नेता अलग हो रहे हैं, इसकी चिंता भी उसे करनी होगी। अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं की सलाह को मानना उसके लिए बेहतर होगा। सच्चा लोकतंत्र वहीं है, जहां अपने नेताओं व कार्यकर्ताओं की इच्छा के अनुरूप काम हो।

    अनिल अनूप
    अनिल अनूपhttps://www.pravakta.com/author/abdullahanup3gmail-com
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

    1 COMMENT

    1. कांग्रेस-मुक्त सोच पर हमारी समझ है कि भारतीय लोकतंत्र के पुनर्निर्माण में साधारण नागरिक औरों के संग मिल केवल देश और समस्त देशवासियों के भविष्य का सोचे। ऐसा तभी हो सकता है जब १८८५ में जन्मी इंडियन नेशनल कांग्रेस का नाम देश के अंधकारमयी इतिहास में छोड़ हम वर्तमान राष्ट्रीय शासन का समर्थन करते आगे बढ़ने को तैयार हैं।

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