नारों के बूते सरकती रही है सियासत की सत्ता

वीरभान सिंह

नारों से होता था पार्टियों का प्रचार बदलते दौर में हवा हो गए चुनावी नारे

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां के लोकतंत्र में लोक अर्थात लोगों की अहमियत हो ना हो, मगर उनके वोट की अहमियत बहुत ज्यादा है। वोट हासिल करने के लिए देश के नेता साम, दाम, दण्ड, भेद के अलावा एक और चीज का जमकर प्रयोग करते आये हैं और वह हैं चुनावी नारे। चुनाव में नारों का अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इतिहास गवाह है कि नारा जितना ज्यादा तीखा होता है उसकी धार भी उतनी ही ज्यादा तेज रही है। नेताओं के लिए चुनावी नारे, जनता को लुभाने वाले ऐसे लालीपाप हुआ करते हैं जिनकी ध्वनि तो मीठी होती है पर तात्पर्य बहुत ही ज्यादा कर्कश।

आइए एक नजर डालते हैं हमारे देश की राजनीतिक तस्वीर पर जिसमें नारों के बूते सियासत की सत्ता सरकाई जाती रही है। आजादी के शुरूआती दिनों में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू अपनी पार्टी और उस दौर की सरकार में अपनी अच्छी खासी पकड बना चुके थे। नेहरू समर्थकों ने उस दौर में एक नारा दिया था – नेहरू के हाथ मजबूत करो। हालांकि यह एक साधारण सा नारा था, पर इस नारे को एक साथ बोलने वालों ने उन दिनों देशवासियों को नेहरू सरकार के साथ जोड दिया था। हर कोई यही नारे लगाकर लोगों की हमदर्दी बटोरता था। उन दिनों जनसंघ पार्टी विपक्ष में बैठने वाली कम महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी थी जिसका चुनाव चिन्ह था दीपक। कांग्रेसी व्यंग्य भरे अंदाज में जनसंघ पर टिप्पणी करते हुए कहा करते थे – इस दिये में तेल नहीं है, यह कैसे उजाला लायेगी। आजादी के बाद तेजी से अस्तित्व में आयी सीपीआ ई ने भी एक नारा दिया था – लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिन्दुस्तान। यह एक क्रांतिकारी नारा था, लिहाजा उस समय अधिकांश देशवासियों ने इस नारे की इबादत की थी और साथ दिया था।

वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश में छात्रों ने भी ऐसे नारे ईजाद किए जो बेहद तीखे थे। उन दिनों छात्र आंदोलनों की वजह से सैकडों छात्र जेलों में बंद थे। तब छात्रों ने छात्र आंदोलन को धार देने के लिए एक नारा दिया था – जेल के फाटक टूटेंगे, साथी हमारे छूटेंगे। इस नारे के क्रांतिकारी परिणाम सामने आये थे। छात्र आंदोलन तेज हुए थे और पुलिस को छात्रों के सामने हार भी माननी पडी थी। पिछडे वर्ग की आवाज बुलंद करते हुए सोशलिस्ट पार्टी ने भी नारा दिया था – संसोपा ने बांधी गांठ, पिछडे पावैं सौ में साठ। उसी दौरान गौरक्षा आंदोलन को तेज करते हुए जनसंघ ने भी नारा दिया था – गौ हमारी माता है, देश धरम का नाता है। दैनिक समस्याओं के जुडे कई मुद्दे भी नारों का रूप लेते रहे हैं। मसलन बेरोजगारी, गरीबी और मंहगाई जैसे मुद्दे चुनावी नारों की शक्त अख्तियार करके समाज को आईना दिखाने का काम भी करेंगे थे। ऐसे ही नारों में शामिल थे –

रोजी-रोटी दे ना सकी जो वह सरकार निकम्मी है,

जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है।

वर्ष 1967 तक साझा चुनाव होते थे इसलिए चुनावी नारों में स्थानीय व प्रांतीय मुद्दों का होना बेहद जरूरी माना जाता था।

प्रधानमंत्री स्व0 इंदिरा गांधी के आते-आते बहुत कुछ बदल सा गया था। कल तक अनपढ रहने वाला नागरिक अब साक्षर व समझदार होने लगा था। उसी समय एक चुनावी नारा आया – इंदिरा हटाओ, देश बचाओ। इस नारे पर कटाक्ष करते हुए इंदिरा गांधी ने भी एक वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ। नारा दिया था – आपातकाल के बाद ऐसे नारों का जबरदस्त जोर दिखायी दिया। इस दौरान तो भइया आकाश फाडू नारे लगे थे जिन्होंने पुराने सभी नारों की बोलती सी बंद कर दी थी –

सन सतहत्तर की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार।

संपूर्ण क्रांति का नारा है, भावी इतिहास हमारा है।

फांसी का फंदा टूटेगा, जाॅर्ज हमारा छूटेगा,

नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा, संजय, बंशीलाल।

इन नारों ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ लोगों में आक्रोश भर दिया था।

वर्ष 1980 में काँग्रेस पार्टी ने फिर एक बार नया नारा दिया- जात पर ना पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। इसी चुनाव में इंदिरा गांधी के समर्थन में और भी ज्यादा वजनदार चुनावी नारों की उत्पत्ति हुई थी – आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा को बुलायेंगे। आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और उनकी हत्या के उपरांत 1984 में राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद का बेहतरीन दावेदार माना गया। राजीव गांधी के समय में जो नारे लगाये गए थे वे भी कुछ कम ना थे – पानी में और आंधी में, विश्वास है राजीव गांधी में। हालांकि यह विश्वास वर्ष 1989 में चूर-चूर होता चला गया और फिर नवीन नारों ने जन्म लिया – बोफोर्स के दलालों को एक धक्का और दो। दूसरी तरफ विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्थन में भी नारे बनाये और लगाये गए – राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है। विरोधी भी हावी हुए और उन्होंने नया नाया बनाया – फकीर नहीं राजा है, सीआईए का बाजा है।

वर्ष 1996 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में भी नारे लगे थे – अबकी बारी अटल बिहारी। अगले चुनाव यानी 2004 में इंडिया साइनिंग का नारा लगा था। फिर भी वे चुनाव हार गए थे। तब कांग्रेस ने नारा दिया था – कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। इस बार कांग्रेसी – कांग्रेस की पहचान, विकास और निर्माण पर ताल ठोंक रहे थे। भइया और भी नारे हावी हुए थे – एक शेरनी सब लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर,

मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड गए जय श्री राम,

 तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।

नारों की हकीकत और उनके बूते चुनाव की सत्ता हथियाने का यह सिलसिला हावी होता रहा। समय बीतता गया लोग साक्षर होते गए और आज एक समय ऐसा आया है जबकि नारों की अभद्रता और उनकी आजमाइश का दौर लगभग इतिहास के पन्नों में समाहित होने को है।

3 thoughts on “नारों के बूते सरकती रही है सियासत की सत्ता

  1. नारे तो बदलते या ख़त्म होते रहते हैं लेकिन लोगों की समझ कब बदलेगी असली सवाल तो यह है?

  2. आजकल अपुन के दिमाग में एक ही नारा गूँज रहा है–
    “देश की बर्बादी, राहुल गांधी!”
    और..ये भी—
    “सोच ले बेटा शादी का, सपना छोड़ गद्दी का”

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