पीके फिल्म का विरोध, आखिर क्यों?

 

सुप्रसिद्ध फिल्मी नायक आमिर खान अभिनीत की “पीके” फिल्म से पाखंडी और ढोंगी धर्म के ठेकेदारों की दुकानों की नींव हिल रही  हैं। इस कारण ऐसे लोग पगला से गये हैं और उलजुलूल बयान जारी करके आमिर खान का विरोध करते हुए समाज में मुस्लिमों के प्रति नफरत पैदा कर रहे हैं।

इस दुश्चक्र में अनेक अनार्य और दलित-आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के लोग भी फंसते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे सब लोगों के चिंतन के लिए बताना जरूरी है कि समाज में तरह-तरह की बातें, चर्चा और बहस सुनने को मिल रही हैं। उन्हीं सब बातों को आधार बनाकर कुछ सीधे सवाल और जवाब उन धूर्त, मक्कार और पाखंडी लोगों से जो फिल्म “पीके” के बाद आमिर खान को मुस्लिम कहकर गाली दे रहे हैं और धर्म के नाम पर देश के शांत माहोल को खराब करने की फिर से कोशिश कर रहे हैं।

यदि फिल्मी परदे पर निभाई गयी भूमिका से ही किसी कलाकार की देश के प्रति निष्ठा, वफादारी या गद्दारी का आकलन किया जाना है तो यहाँ पर पूछा जाना जरूरी है कि-

आमिर खान ने जब अजय सिँह राठौड़ बनकर पाकिस्तानी आतँकवादी गुलफाम हसन को मारा था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।

आमिर खान ने जब फुन्सुक वाँगड़ू (रैंचो) बनकर पढ़ने और जीने का तरीका सिखाया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।

आमिर खान ने जब भुवन बनकर ब्रिटिश सरकार से लड़कर अपने गाँव का लगान माफ कराया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।

आमिर खान ने जब मंगल पाण्डेय बनकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।

आमिर खान ने जब टीचर बनकर बच्चों की प्रतिभा कैसे निखारी जाए सिखाया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।

आमिर खान द्वारा निर्मित टी वी सीरियल सत्यमेव जयते, जिसको देख कर देश में उल्लेखनीय जागरूकता आई, क्या उसे बनाते वक्त वह मुसलमान नहीं था।

इतना सब करने तक तो आमिर भारत का एक देशभक्त नागरिक, लोगों की आँखों का तारा और एक जिम्मेदार तथा वफादार भारतीय नागरिक था। लेकिन जैसे ही आमिर खान ने “पीके” फिल्म के मार्फ़त धर्म के नाम पर कट्टरपंथी धर्मांध और विशेषकर हिन्दुओं के ढोंगी धर्म गुरुओं के पाखण्ड और अंधविश्वास को उजागर करने का सराहनीय और साहसिक काम किया है। आमिर खान जो एक देशभक्त और मंझा हुआ हिन्दी फिल्मों का कलाकार है, अचानक सिर्फ और सिर्फ मुसलमान हो गया? वाह क्या कसौटी है-हमारी?

क्या यह कहना सच नहीं कि आमिर खान का मुसलमान के नाम पर विरोध केवल वही घटिया लोग कर रहे हैं जो पांच हजार से अधिक वर्षों से अपने ही धर्म के लोगों के जीवन को नरक बनाकर उनको गुलामों की भांति जीवन बसर करने को विवश करते रहे हैं? यही धूर्त लोग हैं जो चाहते है-उनका धर्म का धंधा अनादी काल तक बिना रोक टोक के चलता रहे। जबकि इसके ठीक विपरीत ओएमजी में भगवान पर मुक़दमा ठोकने वाले परेश रावल को तो उसी अंध विचारधारा के पोषक लोगों की पार्टी द्वारा माननीय सांसद बना दिया गया है।

सच तो यह है कि इन ढोंगी और पाखंडियों को डर लगता है कि यदि आमिर खान का विरोध नहीं किया तो धर्म के नाम पर जारी उनका ढोंग और पाखंड, खंड-खंड हो जायेगा। उनके कथित धर्म का ढांचा भरभरा कर ढह जायेगा। ऐसे ढोंग और पाखंड से पोषित धर्म के नाम पर संचालित व्यवस्था को तो जितना जल्दी संभव हो विनाश हो ही जाना चाहिए। “पीके” जैसे कथानक वाली कम से कम एक फिल्म हर महिने रिलीज होनी ही चाहिए।

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’.

5 thoughts on “पीके फिल्म का विरोध, आखिर क्यों?

  1. मेरा शक सही निकला.आखिर डाक्टर मीणा ब्रैंडेड का ही दिए गए.आखिर हमारे सवनाम धन्य दकियानुषी महानुभाव लोग बिन्दुवार उत्तर देना कब सीखेंगे. अपने मुंह मियां मीठू बनना आसान है.दूसरों को गाली देना ही अगर बहादुरी है,तो इन लोगों से ज्यादा बहादुर कोई नहीं है.

  2. हमारे देश में जब तक मौकापरस्त लिखनेवाले-सोचनेवाले-बोलनेवाले और इन सभीको सराहनेवाले दीमक की तरह पैदा होते रहेंगे बहुसंख्यको लव जिहाद-पि के जैसी फिल्मे घर-वापसी जैसी घटनाओ से जूझना पड़ेगा।

    डॉ।

    मैंने आपके कई आर्टिकल पढ़े है मुझे लगता है आप लघुग्रंथी से पीड़ित है इस लिए जब भी कोई सोचनेवाली घटना घटती है तो आप अपनी निम्न कक्षा की सोचको रायता की तरह फैलाने पे आमादा हो जाते हो।

    मुझे लगता है आपके पास सिर्फ जानकारी है ज्ञान नहीं है /

  3. मीणा जी !

    सारा का सारा secularism आप जैसे महानुभाव को हिन्दुओ के प्रति ही क्यू दिखाई देता है ।

    क्या हिन्दुओ की खिलाफत करना बुद्धिजीवी होने तथा धर्मनिरपेक्षता, पंथनिरपेक्षता या सेक्युलरवादी होने का पैमाना बन चूका है ?

    क्या कारण है की हिन्दू बहुल क्षेत्र में एक अकेला परिवार भी निर्भय होकर अपने परिवार और धर्म का निर्वाह करता है परंतु अगर स्थिति इसके उलट हो जैसा की ईराक, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिदुओ की स्थिति शोचनीय अवस्था में चली जाती है।
    एक नासमझ बालक द्वारा अज़ान के साथ खेल खेल में उसकी नक़ल करने पर वहा ईशनिंदा जैसे घृणित कानून की आड़ में उसकी निर्मम ह्त्या कर दी जाती है ।

    आज कुरान की आज्ञा के नाम पर पाकिस्तान के सैकड़ो आतंकवादी संगठन क्या कर रहे है संसार में किसी से छिपा नहीं है। ISIS जैसा secular संगठन की बरबरता किसी को दिखाई नहीं देती ।

    अगर फ़िल्म बनानी है तो इन कुकृत्यो के खिलाफ बनाये जिससे की सुमदाय विशेष के युवको की बुध्दि का विकास हो सके ।

    आप जैसे लोगो का soft target हिन्दू ही होते है अपनी बुद्दिजीवी क्षमता को दर्शाने हेतु ।कभी तो निडर बनिये ।

    और हा निडर बनने से पूर्व उस बेचारे English Director को भी याद कर लेना जिसने Innocence Of Muslims बनायीं थी ।

  4. ढोंगियों और पाखंडियों के गाल पर एक करारा तमाचा. आलेख सामयिक है और इंसानियत का पक्ष समक्ष रखने में सफल है विद्वान लेखक ने कुछ प्रश्न उठायें हैं. और वह ढोंगियों और पाखंडियों या उनके समर्थकों से उत्तर की अपेक्षा करता है. क्या वह उत्तर मिलेगा या लेखक भी उसी फिरकापरस्ती का शिकार हो जाएगा और उसे भी ब्रैंडेड कर दिया जाएगा?.

  5. आदरणीय,
    डा. साहब
    आपके लेख में दिये गये सारे तर्क कुर्तक है। इन तर्को का आमिर खान के मुसलनमान होने से काई सम्बन्ध नही है। अगर सम्बन्ध है तो सिर्फ इतना कि कहानी में पैसा कमाने का तत्व किताना है। और फिल्म से पैसा कमाना ही उनका एकमात्र उद्देश्य है। वे कोई समाजसुधारक नही है। कबीर और राजाराममोहन राय ने समाजसुधार के बदले अपनी तिजोरियाॅ नही भरी।
    कटु आलोचना के लिये क्षमा करेगे।
    आपका
    अरविन्द

Leave a Reply

%d bloggers like this: