मां बाप और औलाद

धूप में बाप और चूल्हे पर मां,औलाद के लिए है जलती ।
तब कहीं जाकर औलाद मां बाप से है पलती ।।

निकाल देती है औलाद जब मां बाप को घर से बाहर।
यहीं औलाद बुढ़ापे में मां बाप को है खलती।।

औलाद की तरक्की देख कर दुनिया है जलती।
मां बाप की दुआए औलाद को हमेशा है फलती ।।

हजार करे गलतियां औलाद मां बाप उसे माफ है कर देते ।
पर बुढ़ापे मै मां बाप की गलती कभी माफ है न करते।।

इंसान गलतियों का पुतला है ये औलाद नहीं है समझती।
जब खुद करती है औलाद तब वह इसको है समझती।।

औलाद मां बाप के कष्टों को कभी नहीं समझती।
जब औलाद के औलाद होती है तब वह समझती।।

औलाद के लिए मां बाप,जोड़ जोड़ कर है मर जाते।
देखो विडम्बना औलाद उसी को बड़े मज़े से है खाते।।

होती नहीं जब औलाद,बेचारे मां बाप दुआ है करते।
मां बाप के बुढ़ापे पर वे उनकी मरने की दुआ है करते।।

बचपन में मां बाप ही,औलाद के मल मूत्र तक है धोते।
बुढ़ापे में मां बाप के मल मूत्र से औलाद घरणा है करते।।

कहती है औलाद पालन पोषण करना मां बाप का फर्ज है।
बुढ़ापे में औलाद का मां बाप का पोषण करना न फर्ज है।।

आर के रस्तोगी

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