पवार हुए पावरफुल और शाह को मिली मात

 बरुण कुमार सिंह

‘कुर्सी खतरे में है तो प्रजातंत्र खतरे में है। कुर्सी खतरे में है तो राज्य, देश एवं दुनिया खतरे में है। कुर्सी न बचे तो भाड़ में जाए प्रजातंत्र- राज्य, देश और दुनिया?’
राजनीति की नीति ऐसी बनती जाए।
वचन जाए पर जाए कुर्सी न जाए।।
आज राजनीति कि हालात यह हो गई है कि राजनीति में अपनी कुर्सी कैसे सलामत रहे इसके लिए कोई भी राजनीति हो, करेगा। चाहे उसे अपने बयानों से पलटना पड़ा, तथ्यहीन समझौता करना पडे़। आज हर पार्टी के नेता पाला बदलने में माहिर हैं। ताजा घटनाक्रम महाराष्ट्र के परिदृश्य में हम देख रहे हैं। चुनाव से पहले जो पार्टी गठबंधन कर चुनाव लड़ी और उसके गठबंधन को जीत मिली। लेकिन मुख्यमंत्री हमारा होगा? इस प्रश्न पर पूर्व में हुआ गठबंधन टूट गया। राजनीति की कुनबापरस्ती में सभी दल सुप्रीमकोर्ट के दरवाजे पर अपने-अपने तर्क के आधार पर, अपने पक्ष में फैसले की गुहार लगाते रहें। अंततोगत्वा सुप्रीमकोर्ट ने सारी परस्थितियों के मद्देनजर रखते हुए, सभी से तथ्यगत रिपोर्ट मांगे और अपना फैसला सुना दिया, एक निश्चित तय समय तक बहुमत प्राप्त करने को कहा साथ ही इस बात को भी जोड़ दिया कि गुप्त मतदान नहीं होगा और इसका सीधा लाइव प्रसारण भी होगा।
कल तक जो चुनाव मैदान में बीजेपी-शिवसेना व एनसीपी-कांग्रेस, दोनों एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव-ए-जंग में थी। जिन्हें सरकार बनाने का बहुमत मिला, वह विपक्ष की भूमिका निभायेंगे। जिन्हें विपक्ष की भूमिका निभाने को बहुमत मिली थी, वह अब सरकार बनायेंगे एवं मुख्य कर्ताधर्ता होंगे। यहां सिर्फ कांग्रेस-एनसीपी एवं बीजेपी के पक्ष-विपक्ष की भूमिका अदल-बदल हो रही है। शिवसेना तो पहले बीजेपी के साथ थी, अब कांग्रेस-एनसीपी के साथ मुख्यमंत्री के रूप में मुख्य भूमिका निभाएगी।
ताजा स्थितियां यही बयां कर रही हंै कि भाजपा के चाणक्य शाह मात खा गए और सारी स्थितियों को भांपने में वे बुरी तरह विफल रहे। यह आने वाले दिनों के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह गठबंधन कितने दिनों तक चलेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है। आज राजनीति का कोई आधार और मापदण्ड नहीं रह गया है। वह कब किस करवट बैठेगी, इसका भगवान भी मालिक नहीं है? आज की राजनीति, जैसे कुर्सी सुरक्षित रहे, वैसे ही समझौते किये जाते हैं। राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं। इस मामले में सभी पार्टियां अपने-अपने समय के हिसाब से अपना हित साध रहे हैं, इसमें कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। आज समाज को सुधारने का ठेका लेने वाले ही, दोष समाज के ऊपर ही थोप देते हैं।
राजनीति अब समाजसेवा नहीं रह गया है। आज चुनाव जितने में जितना पैसा खर्च होता है, चुनाव जीतने के बाद उम्मीदवार नफा-नुकसान आदि का खर्च जोड़ते हैं और इस खर्च को जितना जल्द हो कैसे निकाला जाए, यह राजनीतिज्ञों का मुख्य ध्येय होता है, चाहे उन्हें भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़े। राजनीति आज एक ब्रांडेड प्रोफेशन बन गया है कौन किसे कितना चारा डाल रहा है। कौन किस पार्टी से संसद, विधायक का समय पड़ने पर उसे अपने पक्ष में कर सकता है, पार्टी बदलवा सकता है। अपने पक्ष में नई पार्टी बनवा सकता है। आज जनता से सम्पर्क स्थापित करने वाले से ज्यादा जुगारू नेता और चंदा जुटाने वाले नेता की ज्यादा अहमियत है। क्योंकि समय पर नाव का खवैया वही बनेगा और उसकी बात को न मानने पर नाव डूबने की वह चाल चलेगा।
देश की राजनीति में शरद पवार जितना राजनीतिक अनुभव रखने वालों की संख्या गिनती में ही होगी, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उन्होंने जिस तरह से अपने राजनीतिक अनुभव और चातुर्य का इस्तेमाल कर राज्य में पहली बार शिवसेना की एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार के गठन का रास्ता साफ कर दिया। राजनीति के धुरंधर खिलाड़ियों में माने जाने वाले शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े क्षत्रप बनकर उभरे हैं।
जरा समझिए कि शरद पवार भड़के क्यों? वे लगातार कह रहे थे कि उनकी पार्टी के पास विपक्ष में बैठने का जनादेश है। इससे बीजेपी के बड़े नेताओं ने उनका घर और पार्टी दोनों तोड़ने का पांसा फेंका। अजित पवार को तोड़कर बीजेपी ने सोए हुए शरद पवार की महत्त्वाकांक्षाओं को जगा दिया। इससे आहत पवार ऐसे भड़के कि उन्होंने फडणवीस को उखाड़ फेंकने की कसम खा ली और अपनी उम्र की सीमाओं का लबादा उतार दिया और सीधे मोदी-अमित शाह से आर-पार का ऐलान कर दिया।
शरद पवार का यह दांव भाजपा लिए भारी पड़ा, जिससे मुख्यमंत्री फड़नवीस को अपना इस्तीफा देना पड़ा, परन्तु इसके पीछे संवैधानिक नैतिकता और विश्वसनीयता का भी व्यापक मुद्दा जुड़ा हुआ है। सबसे हैरतंगेज बात तो यह कि 23 नवम्बर को राज्यपाल श्री कोश्यारी ने सुबह-सवेरे आनन-फानन में शपथ दिलाकर मुख्यमन्त्री फडणवीस को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने के लिए 14 दिनों का समय दे दिया। उनका यही फैसला कानून की नजर में संवैधानिक मर्यादा के विरुद्ध साबित हुआ।
भाजपा को सरकार गठन के मामले में उतावलापन दिखाने से बचना चाहिए था। आखिर उसने कर्नाटक के अनुभव से कोई सबक क्यों नहीं सीखा? राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह न करते हुए भाजपा को यह आभास हो तो बेहतर है कि ढ़ाई दिन वाली फड़णवीस सरकार से वह उपहास का ही पात्र बनी है। साथ ही शिवसेना अपनी जीत के कितने ही दावे करे, लेकिन यथार्थ को कोई नहीं बदल सकता कि महाराष्ट्र की भावी सरकार मौकापरस्ती की राजनीति का शर्मनाक उदाहरण होगी। कुल मिलाकर देखा जाए तो महाराष्ट्र का ताजा घटनाक्रम इतिहास में भारतीय लोकतंत्र के एक शर्मनाक अध्याय के रूप में ही दर्ज होगा।

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