पवार की नाराजगी, कुंठा या स्वार्थ की राजनीति

सिद्धार्थ शंकर गौतम

मराठा राजनीति के नुमाइंदे शरद पवार इन दिनों कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं| मीडिया में उनकी नाराजगी की कई वजहें बताई जा रही हैं| पहली मुख्य वजह तो यह है कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद सरकार में वरिष्ठता क्रम को देखते हुए उन्हें नंबर २ की कुर्सी पर होना चाहिए था किन्तु आलाकमान ने उनकी जगह रक्षामंत्री एके एंटोनी को उस स्थान पर काबिज करवा दिया| इससे व्यथित पवार व उनकी पार्टी के सांसदों ने सरकारी दफ्तरों ने जाने से लेकर सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल बंद कर दिया है| यहाँ तक कि देश में सूखे की भावी संभावना को देखते हुए भी पवार कृषि मंत्रालय में समय देने से अधिक कांग्रेस से नूराकुश्ती में व्यस्त हैं| देखा जाए तो मीडिया में इस मुद्दे को बेवजह तूल दिया जा रहा है| ख़ास बात तो यह है कि पवार की प्रधानमंत्री बनने की पुरानी इच्छा पुनः हिलोरे मारने लगी है| रही बात सरकार में नंबर २ स्थान की तो इसे लेकर पवार इतना बखेड़ा नहीं कर सकते| इस मुद्दे को कांग्रेसी चाणक्य आसानी से सुलझा सकते थे| इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं और २०१४ में शायद उनकी राजनीतिक पारी का अंत हो जाएगा| जहां तक बात राहुल के प्रधानमंत्री बनने की है तो यह अभी दूर की कौड़ी लगता है| ऐसे में बिल्ली के भाग्य से छींका यदि फूटा तो पवार की किस्मत उन्हें प्रधानमंत्री पद के सशक्त दावेदारों में शुमार करवा सकती है| एक तो वरिष्ठता क्रम उनका साथ दे ही रहा है, दूसरे महाराष्ट्र में यदि कांग्रेस को जिन्दा रहना है तो उसे पवार को साधना ही पड़ेगा| खैर यह जितना आसान दिख रहा है उतना ही पेचीदा मामला है| लिहाजा पवार इसे और उलझाकर सुलझाने की जुगत में हैं जो उनकी स्वाभाविक राजनीति का हिस्सा भी रहा है| यह इस तथ्य से साबित भी होता है कि पवार एनसीपी के राजनीतिक भविष्य को लेकर संजीदा हो गए हैं और यह काम कांग्रेस पर नकेल कसकर ही किया जा सकता है| महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस के साथ गठबंधन धर्म का निर्वहन कर रही एनसीपी का हाल-बेहाल है| उसके कोटे के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं जिससे पार्टी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है| ये बात और है कि पवार के भतीजे और राज्य के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का कद दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहा है| चाहे प्रशासनिक क्षेत्र हो या निजी, अजित; मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण पर भारी पड़ते नज़र आ रहे हैं| फिलहाल तो चव्हाण की हालत यह है कि उनके विरुद्ध कांग्रेस के ही ४० से अधिक विधायकों ने सोनिया गाँधी को पत्र लिख दिया है जिससे यह संभावना प्रबल हो गई है कि महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन संभव है| चाचा-भतीजे की नज़र इसी संभावित परिवर्तन पर टिकी है| एक बार महाराष्ट्र की सत्ता हाथ आई तो दिल्ली की गद्दी का पवार का सपना हकीकत में बदल सकता है|

 

फिर अपने भतीजे को महाराष्ट्र की राजनीति में उलझाकर पवार ने अपनी पुत्री को दिल्ली दरबार का रास्ता इसलिए दिखाया था कि वह दिल्ली में उनकी विरासत को संभालेगी, किन्तु सुप्रिया सूले का कद न तो महाराष्ट्र में बढ़ा न ही दिल्ली दरबार में उनकी तूती बोली| पवार चाहते हैं कि एक बार उनकी पुत्री को कैबिनेट मंत्रीपद मिल जाए तो वे येन-केन प्रकरेण उसे स्थापित करवा ही देंगे| गौरतलब है कि एनसीपी के ९ सांसदों के समर्थन के बोझ तले दबी केंद्र सरकार में एनसीपी कोटे के २ मंत्री हैं और यदि पवार दबाव की राजनीति कर अपनी पुत्री को मंत्री बनवाने में कामयाब होते हैं तो एनसीपी कोटे से ३ मंत्री होंगे| कांग्रेसी रणनीतिकारों को पवार की यह मूक मांग इसलिए भी स्वीकार नहीं है क्योंकि इससे सरकार पर अन्य सहयोगी दलों का दबाव पड़ेगा जिससे स्थिति बिगड़ सकती है परन्तु पवार हैं कि मानने को ही तैयार नहीं हैं| वहीं अपने दामाद की लवासा सिटी प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी न मिलने की वजह से भी पवार अंदर ही अंदर कुंठित थे जिसे वे अब भुनाने का प्रयत्न कर रहे हैं| देखा जाए तो पवार की राजनीति ही इन कुटिल चालों पर टिकी है| एनसीपी के गठन से अब तक का इतिहास खंगाला जाए तो यह सार्वजनिक होता है कि पवार ने सिर्फ दबाव की राजनीति कर स्वार्थसिद्ध किए हैं| यह तो पवार भी जानते हैं कि जितनी जरुरत कांग्रेस को उनकी है उससे अधिक तो उन्हें हाथ का साथ चाहिए| फिर यह समझ से परे है कि क्यूँ कांग्रेस उनके समक्ष बैकफुट पर है?

 

कभी ममता तो कभी मुलायम और अब पवार; कांग्रेस यक़ीनन दुविधा में है कि अपने सहयोगियों को किस तरह साधा जाए? देखा जाए तो यह इतना कठिन भी नहीं है, बस ज़रूरत है तो एक बार इनसे सख्ती से निपटने की| जहां तक पवार की भावी रणनीति की बात है तो यह बता पाना फिलहाल मुश्किल है कि पवार का दांव क्या गुल खिलाता है? पवार की नाराजगी, कुंठा व स्वार्थ की राजनीति ने संप्रग सरकार को नए सियासी भंवर में ड़ाल दिया है जिसका समाधान फिलहाल तो संभव नहीं है| पवार की यह अदावत उनकी स्वार्थसिद्धि के बाद ही खत्म होगी|

1 thought on “पवार की नाराजगी, कुंठा या स्वार्थ की राजनीति

  1. पंवार जी को चार पांच महीने मैं देसी घी मैं से बदबू आने लग जाती हे और वो प्रफुल्ल को साथ लेकर १० जनपथ के चक्कर लगाना शुरू कर देते हैं ,और वहां से अपने सभी फचहर क्लेअर करवाने के बाद फिर कुछ दिनों के लिए विश्राम की मुद्रा मैं आ जाते हैं , यही उनकी कामयाबी का राज हे …

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