लेखक परिचय

अशोक बजाज

अशोक बजाज

श्री अशोक बजाज उम्र 54 वर्ष , रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से एम.ए. (अर्थशास्त्र) की डिग्री। 1 अप्रेल 2005 से मार्च 2010 तक जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद का निर्वहन। सहकारी संस्थाओं एंव संगठनात्मक कार्यो का लम्बा अनुभव। फोटोग्राफी, पत्रकारिता एंव लेखन के कार्यो में रूचि। पहला लेख सन् 1981 में “धान का समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत” शीर्षक से दैनिक युगधर्म रायपुर से प्रकाशित । वर्तमान पता-सिविल लाईन रायपुर ( छ. ग.)। ई-मेल - ashokbajaj5969@yahoo.com, ashokbajaj99.blogspot.com

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सड़ता अनाज और न्यायालय का फैसला
प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने सुप्रीमकोर्ट को नीतिगत मामलो में हस्तक्षेप न करने की नसीहत देकर एक नये विवाद को जन्म दे दिया है । न्यायालय के आदेश, निर्देश या इच्छा को न मानने या उसे लंबित रखने का वाक्या तो पहले भी हुआ है लेकिन यह पहली बार हुआ है कि देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति ने अधिकारिक तौर पर नीतिगत मामलो मे हस्तक्षेप न करने की नसीहत न्यायालय को दी है । इसके पूर्व 8 मई को बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आयोजित एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को संविधान से मिले अधिकार क्षेत्र को पार नहीं करना चाहिए और जनहित में तीनों अंगों को सामंजस्य के साथ काम करना चाहिए।
न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और दीपक वर्मा की खंडपीठ ने 12 अगस्त को एक फ़ैसले में कहा था कि “अनाज बर्बाद हो इससे बेहतर है कि उसे भूखे गरीबों में बाँट दें।”सबसे पहले कृषि मंत्री शरद् पवार ने न्यायालय के आदेश को सुझाव मानकर टाल दिया । बाद में न्यायालय को पुनः कहना पड़ा कि यह सुझाव नही बल्कि आदेश है।डा. मनमोहन सिंह अब कृषि मंत्री शरद् पवार के बचाव में आ गये है, अपनी सरकार बचाने के लिए शरद् पवार का बचाव करना उनकी राजनैतिक मजबूरी भी है । लेकिन उनके रूख को केवल राजनैतिक मजबूरी कह देने मात्र से काम नही चलेगा ।
आमतौर पर वृथा बयान बाजी से बचने वाले प्रधानमंत्री ने यदि यह बयान दिया है तो इसमें कई बातें निहित है । पहला तो यह कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मान लिया जाता तो इसमें सरकार की कमजोरी उजागर हो जाती । लोग कहते कि सरकार अनाज को सुरक्षित नही कर पा रही थी इसीलिए गरीबो को बांट रही है । दूसरा इसका कोई राजनैतिक लाभ इन्हें नही मिलता क्योंकि सरकार के बजाय न्यायालय को इसका श्रेय जाता । तीसरी बात जो डा. मनमोहन सिंह के बयान में निहित है वह यह है कि यदि एक बार मुफ्त बांटने की प्रक्रिया शुरू हो गई तो हमेशा के लिए यह परम्परा बन जायेगी । वैसे प्रधानमंत्री ने अपने बयान में जो कारण बताया है उसमें उन्होंने कहा कि गरीबो को मुफ्त अनाज बांटने से अन्न-उत्पादन पर प्रतिकुल असर पड़ेगा । मामला था सड़ रहे अनाज को गरीबों में मुफ्त बांटने का । उचित रख रखाव के अभाव में करोड़ो रूपियो का अनाज सड़ रहा है । जिस देश की कुल आबादी के लगभग 37 प्रतिशत  लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहें हों, उस देश में लाखों टन अनाज सड़ जाय यह कितनी दुर्भाग्य जनक बात है । वास्तव में यह मेहनतकस किसानो के पसीने का अपमान है, यह राष्ट्रीय क्षति है । इसे गरीबों को बांट देने से सरकार की कोई नीति प्रभावित हो रही है, ऐसा कहीं नही लगता । इससे कांग्रेस या उसके सहयोगी दलों का दृष्टिकोण गरीबो के प्रति कितना उदार या कठोर है इसकी परख होती है ।
दरअसल  यह मामला अब केवल सड़ते हुये अनाज को बांटने या न बांटने तक सीमित नही है  । बल्कि यह मामला  कार्यपालिका एंव न्यायपालिका के सम्बंधों से जुड़ गया है । जिस देश में संविधान की संप्रभुता है, जिस देश में संविधान के संरक्षण की जिम्मेदारी न्यायपालिका को है उस देश की सरकार सुप्रीम कोर्ट को नसीहत दे या उसके निर्णय को सुझाव मानकर टाल दे ,यह दुर्भाग्य जनक बात है ।केन्द्र सरकार जिस पर देश में शांति, सद्भाव  व  अनुशासन बनाये रखने की जिम्मेदारी है वह स्वयं कितनी अनुशासनहीन है यह प्रधानमंत्री एवं कृषि मंत्री या यों कहे की केन्द्र सरकार के वर्तमान रवैया से जाहिर हो गया है । कार्यपालिका और न्यायपालिका के संमबंध तनावपूर्ण हो गये है । प्रधानमंत्री के शब्द बाण से न्यायपालिका के प्रति जन-श्रद्धा कसौटी पर आ गई है। कोई जरूरी नही कि न्यायालय का फैसला हर बार अपने अनुकूल आये, यदि फैसला अपनी इच्छा के विरूद्ध भी आता है तो न्यायालय के प्रति श्रद्धा व सम्मान बना रहता है, यह इस देश की संस्कृति है । इस संस्कृति को बनाये रखने की जिम्मेदारी जनता, सरकार व स्वयं न्यायपालिका की भी है। आने वाले समय में ऐसे अनेक अवसर आयेंगें जब प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के बयान को लोग  कोर्ट के फैसलों में “कोड” करेगें। इसीलिए यह मामला केवल असुरक्षित अनाज को गरीबो को बांटने या न बांटने तक सीमित न हो कर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव का हो गया है। वर्तमान केन्द्र सरकार के रूख का दुष्परिणाम सदियों तक झेलना पड़  सकता है जो लोकतंत्र के सेहत के लिए ठीक नहीं है इस स्थिति में देश के महामहिम राष्ट्रपति स्वयं हस्तक्षेप कर विवाद को टालें तो उचित होगा।

6 Responses to “प्रधानमंत्री की नसीहत : गरीबों की फज़ीहत”

  1. ateet

    Apka Bahut Dhanyabad Bajaj je,
    Yah sarkar me baithe hue Mantri kisi …..ki tarah hote hai is liye ye Aadmi ko Marta dekh sakte hai kisi ….. ko nahi kyunki yah inke biradari ke thahare,
    Pankaj ji apki bat se mai Sahmat hoo.

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  2. Jeengar DS Gahlot

    Ashok Ji, Rajniti me ‘Kursi’ vah ‘Kutti’ chij hai ki Usko pane oor Uas par bane rahne ke liye Rajnetao dwara kuch bhi kah dena Unka “Samvedhanik Adhikar” bana hua hai. Desh jalta hai to jale oor Janta marti hai to mare – Netaji ko en sabse koi lena-dena nahi. En par bologe oor likhoge to “Aatankwadi” ya “Deshdrohi” ghosit kar mar diye javoge.

    Meharbani kar Aap apna oor apne parivar ka dhayan rakhe. Modi ke Gujrat me Amit Jetwa ko mar diya gaya, kisne kya kar liya ? Ab Gahlot ke Rajasthan me bhi Bikaner ka Gordhan Singh apni oor apne parivar ki hifajat ke liye mara-mara phir raha hai – dekte hai vah kab tak bacha rahta hai ?

    – Jeengar Durga Shankar Gahlot, Publisher & Editor, “SAMACHAR SAFAR” [Fornightly], Satti Chabutre ki Gali, Makbara Bazar, Kota – 324 006 [Raj.] ; Mob. : 098872-32786

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    निर्मम व संवेदना हीन सरकार की करनी तथा सोच का एक और प्रमाण है. लोगों का भूख से बिलक-बिलख कर मरना कोई मुद्दा नहीं है इस सत्ता की नज़र में. न्भ्खे भारतीयों का स्मरण दिलाने जैसा दुष्कर्म (?) हमारे देश के सज्जन समझे जाने वाले प्रधान मंत्री कोसहन नहीं हुआ. कितनी निर्मम है ये सरकार और इसकी सोनिया ”जी”
    क्या फर्क है अत्याचारी अंग्रेजों और इन काले अंग्रेजों के शासन में ? वे भी हम भारतीयों की जान की कीमत दो कौड़ी की समझते थे और अंग्रेजों के मानसिक गुलाम ये आज के हमारे शासक भी हमारी मुश्किलों ,मुसीबतों को हल करने की जिम्मेवारी निभाने की कोई ज़रूरत नहीं समझते.
    कहाँ हैं वे राज कुमार जी जो गरीबों की झोंपड़ियों में भोजन करने का नाटक करते रहे ? आज भूखे मरने वालों को सड़ते अनाज को बांटने के मुद्दे पर वे राजकुमार और उनकी रानी माँ ( परदे के पीछे से सत्ता के सूत्र संचालित करने वाली महा देवी) कहाँ सो गए ?

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    यह देश के सामने एक और कठिन चुनौती आ खड़ी हुई .वैसे ही हम चारों ओर मुश्किलों से घिरे हैं अब ये विद्वान् प्रधानमंत्री जी ने पता नहीं किस अनाड़ी की सलाह पर न्याय पालिका को अपनी मर्यादा जाता दी .बेशक लोकतंत्र में जनमत की आवाज संसद पर ही सर्वोच्च है किन्तु उस जनमत की व्यथा को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिश लिया ;क्या गुनाह किया ?प्रधानमंत्री जी को सुप्रीम कोर्ट को नसीहत देने की जरुरत नहीं .उनकी सरकार सड़ते हुए गेहूं देखकर भले ही आंसू न बहाए किन्तु जनता की भावनाओं को व्यक्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट पर इस तरह अंगुली उठाकर ;सारी दुनिया में प्रतिष्ठा प्राप्त भारतीय न्याय पालिका को अपमानित न करे .हम जानते हैं ;और विद्द्वान नयायाधीस भी जानते हैं की न्याय व्यवस्था में भी ढेरों खामियां हैं किन्तु
    उसकी इन कमजोरियों को दूर करने के बजाय प्रधानमंत्री जी तो ब्लैक मेल जैसा रास्ता अख्त्यार करते हुआ नज़र आ रहे हैं .

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  5. पंकज झा

    पंकज झा.

    देशवाशियों के लिए ”खुशखबरी”…बहुत बधाई. इस महान लोक कल्याणकारी गणराज्य की सरकार देश के सभी 6 लाख गांवों तक कंडोम पहुचाने की तैयारी कर रही है. चलो अब अनाज नहीं पहुचा तो क्या, कंडोम है ना.

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  6. पंकज झा

    पंकज झा.

    आपने बिल्कुल सही लिखा है बजाज जी. न्यायपालिका के प्रति इस तरह का हिकारत भाव किसी लोकतांत्रिक देश के शालीन प्रधानमंत्री का नहीं है. यह बयान है अंग्रेजों द्वारा स्थापित पार्टी के इटालियन अध्यक्ष के नौकर-शाह का. इस बयान में नमक ‘दांडी’ का नहीं बल्कि उस विश्व बैंक का है, जिसकी चाकरी कर प्रधानमंत्री पहले रोजी-रोटी कमाते रहे हैं. न्याय व्यवस्था को धत्ता बता कर जो पार्टी गरीब शाहबानो के मूंह का निवाला छीन सकती है वह अगर आज देश के करोड़ों गरीबों के पेट पर लात मार रही है तो क्या आश्चर्य. बहरहाल….आप शहीद वीर नारायण की धरती के हैं. यहां का जयस्तंभ चौक ‘चावल गाथा’ का जीता जागता स्तम्भ है. उसे बचा कर रखने में अपना योगदान इसी तरह देते रहे…धन्यवाद.

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