व्यंग – कविता:आज़ादी

राघवेन्द्र कुमार ”राघव”

फहर रहा था अमर तिरंगा जगह युनिअन जैक की |

गुजर गयी थी स्याह रात चमकी किस्मत देश की |

स्वाधीन हुआ परतंत्र देश फिर नया सवेरा आया |

पन्द्रह अगस्त का दिन खुशियों की झोली भर कर लाया |

बापू, चाचा, सरदार सभी की मेहनत रंग थी लायी |

भगत सिंह, अशफाक, लाहिड़ी की क़ुरबानी रंग लायी |

खुशियाँ कब-कब बंधकर रहती वो तो आती जाती हैं |

वक्त बदलते समय न लगता कैसे रंग दिखाती हैं |

आज़ादी फिर आज बन गयी सत्ताधीशों की दासी |

बापू के अरमान जल रहे खादी पहने अपराधी |

देश जल रहा दंगों में कुम्भकर्ण सरकार हो गयी |

पराधीन फिर हिंद हो गया आज़ादी बर्बाद हो गयी |

फक्र करूँ किस आज़ादी पर तिल-तिल भारत ज़लता है |

आम आदमी आज़ादी के समझ मायने डरता है |

आज सियासत की आँधी में आज़ादी का रंग उड़ गया |

भारत की पावन धरती का रंग आज बदरंग हो गया |

स्वाधीन हिंद की वर्षगांठ हो तुम्हे मुबारक बार-बार |

पर जन-गण-मन है नंगा ,भूखा इज्ज़त अपनी तार -तार |

स्वाधीन हिंद की वर्षगांठ हो तुम्हे मुबारक बार-बार ||

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