उष्ण क्षेत्र में पाया जाता, रात्रि में करता ये काम।
जिससे सारे लोग डरते है, ‘बिच्छु’ है इसका नाम।
पत्थर,ईंट कभी लकड़ी के नीचे, अक्सर होता इसका निवास।
जहाँ इसके अनुकूल मौसम होता, वहीं बनाता अपना आवास।
छः पैर पे मस्ती में चलता , आगे चिमटा सा आकार।
जिसे देखकर रूह कापता, पीछे होता विष का भंडार।
काले ,नीले ,पीले ,भूरे जैसे, होते इसके कई प्रकार।
दिखने में डरावना लगता, झुमका सा होता आकार।
मांसाहारी जीव के श्रेणी में आता, खुद से करता अपना शिकार।
जिसपे भी ये अपना डंक मारता, विष से आता उसको बुखार।
विष छिड़ता बिजली की भांति, तड़पने लगते तुरन्त ही प्राण।
सभी पे दिखाता अपना असर ये, किसी का तो ले लेता ये जान।
इसके डंक के विष का अभी तक, निकला कोई न सटीक उपचार।
कवि सिन्हा विष से व्याकुल होकर, रख रहा है आज अपना विचार।
प्रवेश कुमार सिन्हा

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