लेखक परिचय

जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

मूलत: गोरखपुर (बढ़हल गंज) के रहने वाले, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र से परास्नातक करने के पश्चात् भारतीय पुलिस सेवा में चयनित एवं वर्तमान में दिल्ली पुलिस में सहायक आयुक्त। काव्य एवं साहित्य लेखन में विशेष रूचि।

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ज़नाज़ा रोक दो सब देख ले मेरे जिस्म के टुकड़े 

बड़े मुश्किल से जुट पाया है ये टुकड़े जो थे बिखरे 

हुआ विस्फोट औ फिर चीख का तांता ही लग गया 

अरे शैतान के हाथों से फिर इंसान मर गया 

अधुरे आधे जिस्मों का तो जैसे ढेर लग गया 

नहीं पहचान पाया कोई किसका कौन हिस्सा है 

कि हर विस्फोट का मौला यही बस बनता किस्सा है 

मिला जो भी उठाते समझ ये तो उनका हिस्सा है 

इन्हें जो मारता लगता तुम्‍हें कोई फरिश्‍ता है 

जरा पहचान अब्दुल है कहां है कौन काशीनाथ 

सभी बिखरे पड़े हैं धुल में बिखरे पड़े हैं साथ 

सभी का खून तो है लाल फिर ये भेद कैसा है 

हमारी एकता की शाल में ये छेद कैसा है 

बस एक अफज़ल की खातिर कितने अफज़ल मार डाले हैं 

सियासत करने वालो के भी मन क्या इतने काले है 

5 Responses to “कविता : ये भेद कैसा है”

  1. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

    jitendra

    जहा मंजिले हो राह हो

    पर कोई हमसफ़र न हो

    मौला मेरे इतना तो तनहा

    मेरा कोई सफ़र ना हो

    हर दर पे जो करना पडे

    सजदा मुझे मजबूर हो

    अल्लाह फिर मेरे जिस्म पे

    बेहतर है कोई सर न हो

    पाकीजगी से बंदगी से

    उनकी रहमत मिलती है

    उस पाक दिल बिन क्या दुआ

    जो दुआ मे कोई असर न हो

    जो भी फूकते हो बस्तिया

    अपना रसूख दिखाने को

    इतना तो कर मौला मेरे

    उनका कभी कोई घर न हो

    वो रात तो कभी आये ना

    तेरे बंदगी की राह मे

    चाहे रात लम्बी हो , पर न हो

    की इसके बाद सहर ना हो

    स्वरचित

    जीतेन्द्र मणि

    सहायक आयुक्त पुलिस

    पी सी आर

    पुलिस मुख्यालय

    Reply
  2. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

    jitendra

    कही हंगामा जलज़ला तबाही का मंज़र

    ऐसे हालत मे जीना भी हुनर लगता है

    हमने अपनों के लिया जान भी लुटा दी मगर

    चाहे जितना करो उनको तो कसर लगता है

    चैन से सोने वाले उनकी बुराई करते

    जो सारी रात बात इन्ही के लिए जगता है
    यहाँ कुछ शोर है कुछ गंदगी बदबू है यहाँ

    ऐसा लगता यहाँ इंसान बसर करता है

    वरना तो ऊंची हवेली यहाँ बहुत है मगर

    कितना वीरान क्या इंसान यहाँ रहता है

    ऊँचे महलो मे है नोटों के बिस्तरे लेकिन

    उनको है नींद नहीं किसका डर सा रहता है

    देखो सडकों पे खा के रूखी दिन की मेहनत से

    कैसे मजदूर वो बेफिक्र पसर रहता है

    स्वरचित

    जीतेन्द्र मणि

    सहायक आयुक्त पुलिस

    पी सी आर

    पुलिस मुख्यालय

    Reply
  3. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

    jitendra

    ऐतबार
    वो मेरा ऐतबार ही तो हो ओ मेरे खुदा

    जिसने एक ना खुदा को देख बनाया है खुदा

    वरना मस्जिद मे शिवालो मे भी रखा क्या है

    वरना गिरजो मे हिमाला मे भी क्या रखा है

    बुतों मे पत्थरो पहाड़ो मे क्या रखा है

    घंटियों शंख अजानो मे भी क्या रखा है

    शब्द मे साखी पुरानो मे भी क्या रखा है

    यही वो ऐतबार हगे मेरे परवरदिगार

    जो पत्थरो मे मस्जिदो मे भी दिखाय खुदा

    जिसे भी चाहे ऐतबार बनाए है खुदा

    स्वरचित

    जीतेन्द्र मणि

    सहायक आयुक्त पुलिस

    पी सी आर

    पुलिस मुख्यालय

    Reply
  4. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी

    jitendra

    आपके विचार व्यक्त करने प्रतिक्रिया देने का स्वागत है डोक्टर मधुसुदन जी हम पोलिसे वालू को ये परिदृश्य बडे करीब से देखना पड़ता है और आत्मा रो उठती है पर क्या करे

    Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    आतंकवादी को क्या आत्मा नहीं होती? या ह्रदय नहीं होता? कैसे ये बन्दे ऐसा घृणित काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं?
    निष्पाप लोगों को मारने और मरवाने के लिए कैसे तैयार किया जाता होगा?
    उसके पहले मारने वालोंकी आत्मा मर जाती होगी.

    त्रिपाठी जी आप की कविता और उसके पीछे की प्रेरणा असामान्य है. और आप पुलिस अधिकारी हैं? एक कवि और वह भी पुलिस?
    धन्य! धन्य !

    Reply

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