कविता – शहर का आदमी

baadhमैं कागज काला करता रहा
कि पानी खतरे के निशान पार कर रहा है
लोगों ने पढ़ा
किसी के चेहरे लटक गये
कोई तनावग्रस्त हो गया
कोई ढूँढने लगा
सर छुपाने की जगह
कुछ ऐसे भी थे
पढ़कर फेंक दिया कूड़ेदान में
और सो गया पाँव पसारकर
बड़े इत्मिनान के साथ ।

मैं बार-बार लिखता रहा
कि गाँव के गाँव डूब गये है
साथ ही साथ
आस का तिनका भी डूब गया है
लेकिन शहर का आदमी
जरा सा भी हिला नहीं
आराम से पसर कर कुर्सी पर
पढ़ता रहा गाँवों के डूबने की खबर
और हिसाब करता रहा
सहायता राशि पर अपना भाग ।

और जब अंत में
डूबने लगा उनका शहर
हाहाकार मचने लगा
आदमी दर आदमी
खटखटाने लगा हर दरवाजा
खुलने लगी उनकी नींद
और तब
बंद होने लगा मेरा
पन्ना दर पन्ना लिखने का सिलसिला ।

मोतीलाल

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