लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

Posted On by &filed under कविता.


जब तिमिर बढ़ने लगे तो दीप को जलना पड़ेगा

दैत्य हुंकारें अगर तो देव को हँसना पड़ेगा

दीप है मिट्टी का लेकिन हौसला इस्पात-सा

हमको भी इसके अनोखे रूप में ढलना पड़ेगा

रौशनी के गीत गायें हम सभी मिल कर यहाँ

प्यार की गंगा बहाने प्यार से बहना पड़ेगा

सूर्य-चन्दा हैं सभी के रौशनी सबके लिये

इनकी मुक्ति के लिये आकाश को उठना पड़ेगा

जिन घरों में कैद लक्ष्मी और बंधक रौशनी

उन घरों से वंचितों के वास्ते लड़ना पड़ेगा

लक्ष्य पाने के लिये आराधना के साथ ही

लक्ष्य के संधान हेतु पैर को चलना पड़ेगा

कब तलक पंकज रहेंगे इस अँधेरे में कहो

तोड़कर चुप्पी हमें अब कुछ न कुछ करना पड़ेगा

9 Responses to “कविता: जब तिमिर बढ़ने लगे तो”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    हो तिमिर घनघोर जब ,शम्मा जलाना चाहिए …
    जल रहा हो वतन तब .न वंशी बजाना चाहिए …

    Reply
  2. कृष्ण कुमार सोनी (रामबाबू)

    गिरीश जी,
    तिमिर तो बढ चुका है.अब तो बारी हम सब की दीपक बनने की है.हमारी भावी पीढ़ी अँधेरे के गर्त में घुटने को मजबूर न हो, इसके लिए हमें दीपक बनकर हमारे नैतिक दायित्व का निर्वहन करना ही पड़ेगा .

    Reply
  3. Anil Sehgal

    ” कब तलक पंकज रहेंगे इस अँधेरे में कहो

    तोड़कर चुप्पी हमें अब कुछ न कुछ करना पड़ेगा ”

    मेरे जैसा आम आदमी भी, जिसका का सृजन करने-कराने से कुछ लेना-देना नहीं, पंकज – vs – संपादक संजीव विवाद में – क्या ” कुछ न कुछ ” कर सकता है ?

    – अनिल सहगल –

    Reply
  4. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    वाह गिरीश पंकज जी| बेहद शानदार कविता| सच ही है हम पंकज जी को नहो खो सकते| हम सब उनके साथ हैं|

    Reply
  5. abhishek1502

    ”कब तलक पंकज रहेंगे इस अँधेरे में कहो

    तोड़कर चुप्पी हमें अब कुछ न कुछ करना पड़ेगा”

    आप से अक्षरसः सहमत

    Reply
  6. Rajeev Dubey

    …तोड़कर चुप्पी हमें अब कुछ न कुछ करना पड़ेगा ”

    दृढ़ निश्चय एवं चेतना की जागृति के प्रेरक इन “दीपों” पर बधाई एवं दीपोत्सव की शुभकामनाएं .

    Reply
  7. गिरीश पंकज

    girish pankaj

    धन्यवाद मधुसूदन जी, आप, डॉ. राजेश कपूर और पंकज झा जैसे जैसे दो-चार लोग ही तो है, जिनके कारण सृजन का हौसला बना रहा है. संपादक संजीव को भी धन्यवाद, की रचना को छाप कर सुधीजनों तक पहुंचा दिया. सबको दीपावली की शुभकामनाएं….

    Reply
  8. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    वाह, वाह, वाह,
    गिरीश जी आपने अपना ’पंकज’ नाम और ’पंकज’ झा जी का भी नाम सार्थक कर दिया। आप की इस कविता के सारे अर्थ मंडल—उसे, मनन करने योग्य बना देते हैं। यह मंचन की और मनन की ऐसी दोहरे गुणोवाली कविता है। दीपावली, पंकज और पंकज –वाह।
    अभिनंदन, दीपावली शुभ कामनाएं।

    Reply

Leave a Reply to Anil Sehgal Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *