कविता : देश का बजट

 मिलन सिन्हा

फिर पेश हुआ

देश का बजट ।

 

चल भाई हट

मत कर

खटपट

करें काम

झटपट

क्यों करें

हम अपना

समय नष्ट

 

फिर पेश हुआ

देश का बजट ।

 

किसको मिला लाभ

हमें न बता

किसको होगी  हानि

हमें है पता

गरीबों की

नहीं कोई खता

फिर भी बढ़ेगा

उनका  कष्ट

 

फिर पेश हुआ

देश का बजट ।

 

लाखों – करोड़ों का

है लेखा -जोखा

विश्लेषक बतायेंगे

किसे मिला मौका

किसके साथ हुआ

फिर से  धोखा

जो भी हो, सुखी रहेंगे

हैं जो देश में भ्रष्ट

 

फिर पेश हुआ

देश का बजट ।

 

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