राजधानी की आवोहवा में जहर!

देश में लाखों डेयरियों में रोज शाम को धुंए के बादल उठते दिखाई देने लगते हैं। भले ही वातावरण में मच्छर हों या न हों। परंतु अब प्रदूषण की यही स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई लगती है। खासतौर पर हमारे देश से संबंधित ऐसे भयानक आंकड़े सामने आने लगे हैं जो हमें यह बताने के लिए काफी हैं कि इन हालात को पैदा करने के जि़म्मेदार भी हम स्वयं हैं।

अवनीश सिंह भदौरिया

एक बार फिर दीपावली में पूरे देश में जहरीली गैस वातावरण में फैलने का स्तर पहले से कई गुणा अधिक फैलने का काम किया है। वहीं, सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण भारत की राजधानी में फैल रहा है। राजधानी 17 साल की सबसे घनी धुंध के आगोश में है। सूचनाओं के अनुसार राजधानी में वायु प्रदूषण पहले से 15 गुणा ज्यादा हो गया है इसका मतलब यह है कि राजधानी में आपातकाल जैाी स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसमें वायु प्रदूषण के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण के बढने का स्तर भी शामिल है। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार इन दिनों देश के विभिन्न अस्पतालों तथा निजी डॉक्टर्स के पास आने वाले मरीजों में दमा, खांसी, इंफेक्शन, आंखों में जलन व इंफेक्शन के मरीजों की संख्या अधिक आ रहे हंै। सोने पर सुहागा तो यह कि दीपावली पर्व के दौरान एक ओर तो हमें बाजार में नकली, बासी, पुरानी व जहरीली मिठाईयां खाने को मिलती हैं तो दूसरी ओर आंख, नाक और कान को भारी प्रदूषण भी झेलना पड़ता है। राजधानी की यह स्थिति को देखर ऐसा लग रहा है कि भारत की राजधानी दिल्ली में लंदन ग्रेट स्मॉग जैसे हालात बन रहे हैं। आप को बता दें कि हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द न सुधरे तो लंदन में 1952 में हुई हजारों मौतों जैसी स्थिति बन सकती है। राजधानी की हवा की क्वॉलिटी निचले स्तर पर पहुंच गई। हवा में मौजूद कई किस्म के छोट कण वैसे ही खराब हैं, जैसे 1952 में लंदन में थे। ‘लंदन में 1952 में स्मॉग की वजह से 4 हजार लोगों की मौत हो गई। तब एसओटू हाई लेवल पर थी और पीएम लेवल 500 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर था। यहां एसओटू भले ही उतना ज्यादा न हो, लेकिन दिवाली पर हवा में कई तरह की गैसों का स्तर बढ़ा है।’ ‘कुल मिलाकर अगर पॉल्यूशन का यह स्तर बरकरार रहा तो दिल्ली में भी सांस से रिलेडेट बीमारियों के कारण कई लोगों की मौत हो सकती है।’ चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक पटाखों से सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। सांप गोली, पटाखों की लड़ी और अनार, चकरी जैसे पटाखे से 2000 गुना ज्यादा पार्टीकुलेट मैटर छोड़ते हैं। एक पटाखा 464 सिगरेट के जितना धुआं छोड़ता है। सीएसआई साइंटिस्ट विवेक चट्टोपाध्याय ने कहा कि पटाखों का धुआं धुंध के कारण हट नहीं पाया। हवा के ऊपर जाने की गति कम है हवा अभी फैल नहीं रही है। दिवाली के दिन हवा की एवरेज स्पीड 1.3 मीटर/ सेकेंड थी पिछले साल 3.4 मीटर/ सेकेंड थी। हवा की गति धीमी है, कुछ दिन ऐसा ही रहेगा। पंजाब में 320 लाख टन फसल का कचरा और भलस्वा डंपिंग ग्राउंड में आग से धुंध बढ़ी। वहीं, दूसरी ओर नासा ने कहा है कि नॉर्थ इंडिया की तस्वीर जारी कर कहा पंजाब में फसल जलने का धुआं दिल्ली तक पहुंचा। सैटेलाइट से दिल्ली की साफ तस्वीर लेने में भी मुश्किल हुई। प्रत्येक वर्ष दीवाली के करीब आते ही विभिन्न प्रचार माध्यमों के द्वारा समाज में यह जागरूकता लाने की कोशिश भी की जाती है कि आतिशबाजी का प्रयोग न करें, वातावरण में जहरीला धुंआ तथा भारी प्रदूषण मत घोलें। परंतु इस प्रकार के किसी भी प्रचार का कोई फ़िक्र हमारे समाज पर पड़ता दिखाई नहीं देता। केवल दीवाली का त्यौहार ही नहीं बल्कि हमारे भारतीय समाज में प्रदूषण फैलाने संबंधी और भी ऐसी अनेक विडंबनाएं हैं जो लोगों की दिनचर्या में शामिल हो चुकी हैं। औद्योगिक विकास, वाहनों की बेतहाशा बढ़ती संख्या,प्रदूषण को लेकर हमारे देश के नागरिकों में जागरूकता की कमी,अज्ञानता तथा हमारी अनेक परंपराएं व रीति-रिवाज ऐसे हैं जिनकी वजह से भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 6 लाख लोग केवल वायु प्रदूषण के कारण ही मौत को गले लगा रहे हैं। विश्व स्वास्थय संगठन द्वारा जारी की गई 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 शहर केवल भारत के थे। 2012 के आंकड़े यह बताते हैं कि भारत में दो लाख 49 हजार 388 लोगों की हृदय रोग के चलते मौत हुई। एक लाख 95 हजार लोग दिल के दौरे से मरे। जबकि एक लाख दस हजार पांच सौ लोगों ने फेफड़ों की बीमारी के चलते अपने प्राण त्याग दिए। और 26हजार 334 लोगों की मौत फेफड़ों के कैंसर की वजह से हुई। pollution आज हमारे देश में प्रतिदिन हजारों जगहों पर अनेक धर्मों के धर्मगुरु अपने प्रवचन देते रहते हैं। कभी कोई भी धर्मोपदेशक श्रोताओं व अपने अनुयाईयों से यह कहता सुनाई नहीं देता कि प्रदूषण पर किस प्रकार से नियंत्रण रखा जाना चाहिए। उल्टे जहां ऐसे आयोजन होते हैं वहीं धूप,अगरबत्ती तथा दिए आदि पर्याप्त मात्रा में जलाए जाते हैं। आज आप देश के किसी भी शहर में जाकर देखें तो कबाड़ का काम करने वाले लोग रबड़ जलाकर उसमें से लोहे या तांबे की तार निकालने की कोशिश करते हैं। नतीजतन पूरे देश में खतरनाक धुंआ आमतौर पर शाम के समय उठता दिखाई देता है। इस व्यवस्था को न तो कोई रोकने वाला है न ही इसके विरुद्ध कोई कार्रवाई की जाती है। इस संबंध में सरकारी कामकाज में भी अजीब विरोधाभास है। एक ओर तो सरकार प्रदूषण नियंत्रित रखने की औपचारिकता पूरी करते हुए कभी-कभार कोई विज्ञापन या अपील जारी करती है तो दूसरी ओर सरकारी सफाई कर्मचारी जगह-जगह कूड़े को आग लगाते देखे जाते हैं। हमारे देश में यह भी एक अजीब चलन है कि प्रतिदिन अनेक पशुपालक पशुओं के बांधने के स्थान पर धुंआ करते हैं। पूछने पर इसका कारण मच्छर भगाना बताया जाता है। जबकि पशु चिकित्सक इसे गलत व नुकसान पहुंचाने वाली परंपरा बताते हैं। पशु चिकित्सकों का कहना है कि इस प्रकार डेरियों में धुआं करने से मच्छर तो कम भागते हैं जानवरों की आंख व नाक में धुंआ जरूर चढ़ता है जिससे जानवरों को नुकसान पहुंचता है। परंतु लोगों की समझ में यह बात नहीं आती। देश में लाखों डेयरियों में रोज शाम को धुंए के बादल उठते दिखाई देने लगते हैं। भले ही वातावरण में मच्छर हों या न हों। परंतु अब प्रदूषण की यही स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई लगती है। खासतौर पर हमारे देश से संबंधित ऐसे भयानक आंकड़े सामने आने लगे हैं जो हमें यह बताने के लिए काफी हैं कि इन हालात को पैदा करने के जि़म्मेदार भी हम स्वयं हैं। और अपनी लापरवाहियों व अज्ञानता के चलते हम अपनी आने वाली नस्लों को ऐसा भयावह भविष्य देकर जा रहे हैं जिसकी हम स्वयं कल्पना भी नहीं कर सकते। गत् वर्ष हार्वर्ड,येल तथा शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा जारी एक संयुक्त रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया कि भारत विश्व के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल है। औसतन यहां के लोग इन्हीं कारणों से अपनी निर्धारित आयु से तीन वर्ष पहले अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहे हैं। इसी रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि यदि हमारे देश में वायु प्रदूषण पर जल्दी नियंत्रण नहीं पाया जाता तो 2025 तक देश की राजधानी दिल्ली में ही इस प्रदूषण के चलते प्रत्येक वर्ष छब्बीस हजार छ: सौ लोगों की मौत हुआ करेगी। अगर इस जानलेवा हवा पर रोध नहीं लगी तो देश को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो राजधानी सहित कई शहरों में लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है।

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