नेताजी के कुनबे में राजनीतिक भूचाल?

चाचा-भतीजे की लड़ाई में विपछी पार्टियां खूल चुटकियां ले रही हैं वहीं कुछ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि मुलायम सिंह अपने कुनबे को तो सभाल नहीं पा रहे हैं तो यूपी क्या सभालेंगे। वे यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि पैर उतने ही पसारने चाहिए कि जितनी बड़ी चादर हो वरना ढंड लग जाएगी।

disquiet-in-samajvadi-party-and-the-yadav-familyअवनीश सिंह भदौरिया
यूपी की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी में आज-कल जो हाल चला रहा है वह हम सभी जानते हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी ने यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया है। एक तरफ नेती जी के नाम से कुख्यात समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि समाजवादी पार्टी समाज को जोड़कर एक साथ चलती है पर यहां तो खेल ही दूसरा है। नेता जी के कुनबे में आज तेरी-मेरी, तू-बड़ा के मैं-बड़ा पर राजनीति चल रही है। यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और नेताजी मुलायम सिंह यादव के बेटे चाहते हैं कि मेरी सरकार है तो मेरी चले वहीं, नेताजी के छोटे भाई और अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव चाहते हैं कि मेरी चले वहीं अभी तक तो इस लाड़ाई में चाचा शिवपाल ही जीतते आ रहे हैं। वहीं आप को बतादें कि उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया मुलायम सिंह यादव को चिट्ठी लिखकर पार्टी प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले विधानपरिषद सदस्य उदयवीर सिंह को शनिवार को सपा से निकाल दिया गया। मालूम हो कि सिंह को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है। चौधरी ने कहा कि अमर्यादित तरीके से अनुशासनहीन आचरण करने वालों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मालूम हो कि प्रदेश के ‘समाजवादी परिवार में दरार बढऩे के बीच पार्टी के विधान परिषद सदस्य उदयवीर सिंह ने गत 19 अक्तूबर को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को पत्र लिखकर सनसनी फैला दी थी। उन्होंने पत्र में पार्टी के प्रान्तीय अध्यक्ष शिवपाल यादव के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आरोप लगाया था कि शिवपाल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जलन रखते हैं। अपने चार पन्ने के पत्र में उन्होंने किसी का नाम लिये बगैर यहां तक कह दिया था कि अखिलेश के खिलाफ साजिश में मुलायम की पत्नी, बेटा और बहू भी शामिल है और शिवपाल सपा मुखिया की पत्नी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का चेहरा हैं। सिंह ने पत्र में आरोप लगाया था कि अखिलेश के खिलाफ षड्यंत्र वर्ष 2012 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के फैसले के बाद से ही शुरू हो गया था। उस वक्त शिवपाल ने इस निर्णय को रकवाने की भरसक कोशिश की थी। उसके बाद से ही शिवपाल की निजी महत्वाकांक्षा अखिलेश के पीछे पड़ी है। उन्होंने सपा मुखिया पर एकतरफा बातें सुनकर कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए अनुरोध किया था कि वह सपा के संरक्षक बन जाएं और अखिलेश को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दें।
चाचा-भतीजे की लड़ाई में विपछी पार्टियां खूल चुटकियां ले रही हैं वहीं कुछ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि मुलायम सिंह अपने कुनबे को तो सभाल नहीं पा रहे हैं तो यूपी क्या सभालेंगे। वे यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि पैर उतने ही पसारने  चाहिए कि जितनी बड़ी चादर हो वरना ढंड लग जाएगी। वहीं कांग्रेस और बसपा भी कहां रुकने वाली थी उन्होंने भी बहती गंगा मेंं खूब रगड़-रगड़ के हांथ धोए। कांग्रेस ने कहा कि नेताजी यह बतांए कि आप की पार्टी में अपने-अपने वर्चस्व को बचाने की होड़ चल रही है। एसे में यूपी की जनता को क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है? दूसरी तरफ बसपा पार्टी की मुखिया सुश्री मायावती ने कहा कि मुलायम जी के कुनबे में फूट से यूपी का भला कभी नहीं हो सकता है। यूपी को बसपा का साथ चाहिए। वहीं चाचा-भतीजे की फूट ने यूपी  की राजनीति को तेज कर दिया है। चाचा शिवपाल सिंह यादव ने एक-एक करके भतीजे अखिलेश यादव के करीबियों को पाार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। वहीं, शिवपाल इस बात का बदला भी ले रहे हैं जब यूपी के मुख्यमंत्री ने अपने चाचा शिवपाल यादव से उनके पद वापस ले लिए थे, इस बात पर शिवपाल ने पार्टी से इस्तीफा देने की बात कही थी इस पर नेताजी काफी नाराज भी हुए थे। वहीं, नेताजी ने यहां तक कह दिया था कि शिवपाल के चले जाने से पार्टी का वर्चस्व खत्म हो जाएगा। वहीं, नेताजी ने यह कहकर अखिलेश यादव की काबीलियत पर प्रश्न उठा दिया था? आज जो समाजवादी पार्टी का हाल उससे उसे यूपी में होने वाले विधानसभा चुनावों में बड़ा झटका लग सकता है। मुलायम को डर है कि चाचा-भतीजे की लड़ाई में पार्टी अपना वर्चस्व न खोदे। ऐसे में नेताजी पार्टी को एक जुट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वैसे सपा नेताओं में छिड़ा यह घमासान यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से पार्टी के लिये काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्यों कि सपा के विरोधी राजनीतिक दल जब राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों की दृष्टि से अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने एवं पार्टी प्रत्याशियों के चयन की माथापच्ची में लगे हुए हैं। वह अपनी राजनीतिक ऊर्जा को सकारातमक ढंग से इस्तेमाल करते हुए चुनावी जीत की चक्रव्यूह रचना कर रहे हैं वहीं समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं का यह कीमती समय आपसी घात-प्रतिघात व आरोप-प्रत्यारोप में व्यतीत हो रहा है। पिछले दिनों सपा में मचे सियासी घमासान के बाद संकटमोचक के तौर पर खुद मुलायम सिंह द्वारा पहल किये जाने और सभी बड़े नेताओं के साथ संवाद करके आपसी मतभेद व गुटबाजी खत्म कराने की पहल की गई थी तो ऐसा लग रहा था कि सपा में अब सबकुछ सामान्य हो गया है तथा पार्टी नेता पूर्ण एकजुटता एवं सदाशयता के साथ राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत झोंकेंगे लेकिन पार्टी नेताओं के ताजा रवैये से अब यह पूरी तरह साबित हो रहा है कि मुलायम सिंह यादव की उक्त पहल का कोई नतीजा नहीं निकला है तथा पार्टी में अंतर्कलह का दौर यूं ही जारी है। क्या नेताजी इस घामासान को रोक पाएंगे? अब देखना यह है कि कब तक मुलायम के कुनबे में चाचा-भतीजे का घमासान जारी रहेगा।

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