पूर्वोत्तर भारत में बौद्ध धर्म

पूर्वोत्तर भारत में बौद्ध धर्म की जड़ें बहुत गहरी हैं I पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में छिटपुट रूप से बौद्ध धर्मावलंबी लोग रहते हैं लेकिन अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम में इस धर्म को माननेवाले लोगों की संख्या सर्वाधिक है I अरुणाचल प्रदेश के अनेक आदिवासी समुदाय बौद्ध धर्म में आस्था रखते हैं I प्रदेश के मोंपा, खाम्तीअ, खंबा, मेंबा, सिंहफो, शेरदुक्पे न और जखरिड. समुदाय बौद्ध धर्म को मानते हैं I अरुणाचल में बौद्ध धर्म की हीनयान और महायान दोनों शाखाओं को माननेवाले लोग रहते हैं I महायान शाखा को उत्तररी बौद्ध मत और हीनयान शाखा को दक्षिणी बौद्ध मत कहा जाता है । भगवान बुद्ध के उपदेशों के प्रति वे लोग गहरी श्रद्धा रखते हैं I लेकिन लामा अर्थात पुजारी को छोड़कर आमतौर पर लोग मांसाहारी हैं । राज्य के बौद्ध धर्मावलम्बी भगवान बुद्ध को अनेक नामों से संबोधित करते हैं ।

भगवान बुद्ध को दयालु, चमत्कालरी और कल्याणकारी माना जाता है । इन जनजातियों के जीवन में लामा का महत्वापूर्ण स्थान है । लामा इन आदिवासी समुदायों के आध्या।त्मि क गुरु और अभिभावक हैं । ये बच्चोंर का नामकरण संस्काइर कराते हैं, रोगियों को आरोग्य करने के लिए प्रार्थना करते हैं तथा अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं । मोंपा अरुणाचल की प्रमुख बौद्ध धर्मावलंबी जनजाति है । तवांग और पश्चिकमी कामेंग जिलों में इनकी अधिकांश आबादी निवास करती है । ये लोग बौद्ध धर्म की महायान शाखा में आस्था रखते हैं । तवांग का एशिया प्रसिद्ध बौद्ध मठ इनका प्रमुख आध्याकत्मिक केंद्र है । मोंपा समुदाय का निवास क्षेत्र घने वनों और गहरी घाटियों से संपन्न है । इस समाज में बच्चों के जन्मह से जुड़े अनेक रीति-रिवाज प्रचलित हैं । बच्चें के जन्म के तुरंत बाद बच्चा और उसकी मां को गर्म जल से स्नाेन कराया जाता है । इसके बाद बच्चे् को घर से बाहर निकाला जाता है ताकि वह आकाश और पृथ्वी को देख ले और ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त कर ले । उसके बाद बच्चे को एक नाम दिया जाता है । जन्म के तीन दिनों के बाद बच्चेा को बाहर निकाला जाता है और लामा द्वारा उसका शुद्धिकरण संस्कार किया जाता है । लामा बच्चे का नामकरण संस्कार करता है और उसके भावी जीवन के बारे में भविष्यवाणी करता है । अरुणाचल के लोहित जिले में खाम्तीक जनजाति के लोगों का निवास है । इस समुदाय के लोग बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा में आस्था रखते हैं I ये एक सर्वव्यापी और सार्वकालिक ईश्वर में विश्वाास करते हैं जिन्हें खाम्तीस भाषा में “चान-खुन-सांग” कहा जाता है । बौद्ध धर्म से परिचित होने के पूर्व ये लोग बहुदेववादी थे । बहुदेववादी आस्थात के कुछ चिह्न अभी भी उनके धार्मिक क्रिया-कलापों में मौजूद हैं । बौद्ध धर्म अपनाने के उपरांत खाम्तीअ समाज ने धीरे-धीरे बौद्ध धर्म की शिक्षा को आत्मसात कर लिया । इस समुदाय के लोग गौतम बुद्ध के उपदेशों के अनुसार अपना आचरण करते हैं । इनका मानना है कि मानव सेवा ही ईश्वर की पूजा है और मानव को दुख देना ईश्वर को दुखी करना है । ये लोग ऊंच-नीच और अमीर-गरीब के भेदभाव को नहीं मानते और न ही किसी उच्च कुल में जन्म लेनेवाले व्यीक्‍ति को अधिक महत्व देते हैं । इनका मानना है कि मनुष्यम की स्थि ति का निर्धारण जन्मी से नहीं बल्किक उसके आध्या त्मिाक क्रिया-कलापों से होता है । निर्वाण की प्राप्ति ही मानव का चरम लक्ष्य है । खाम्तीि समाज भगवान बुद्ध की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि मनुष्यी का पथ प्रदर्शन करनेवाले एक नैतिक उपदेशक के रूप में करता है । इन लोगों की धारणा है कि गौतम बुद्ध का बौद्ध धर्म की परंपरा में चौथा स्था न है I अपनी मृत्युो के पांच हजार वर्षों के बाद गौतम बुद्ध पंचम बौद्ध उपदेशक “अरी मितिया” के रूप में प्रकट हुए । खाम्तीर लोग भगवान बुद्ध का जन्म दिन और पुण्य तिथि उल्लासपूर्वक मनाते हैं । इन अवसरों पर बुद्ध के विचारों और उपदेशों की चर्चा की जाती है ।

“संकेन” खाम्तीस समुदाय का प्रमुख त्यौहार है I यह नए वर्ष का पर्व है । खाम्ती वर्ष के प्रथम दिन इस त्योहार का आयोजन किया जाता है । इस दिन स्त्री -पुरुष और बच्चे एक-दूसरे पर जल छींटते है और नव वर्ष की बधाई देते हैं । शेरदुक्पेीन समुदाय के लोग अरुणाचल के पश्चिमी कामेंग जिले में निवास करते हैं । इस जिले के रूपा, जिगांव और शेरगांव नामक तीन गांवों में ही मुख्यि रूप से इनकी अधिकांश आबादी निवास करती है । इस क्षेत्र की प्रमुख नदी कामेंग है जिसके नाम पर जिले का नामकरण किया गया है । ये लोग बौद्ध धर्म की महायान शाखा में आस्था रखते हैं । बौद्ध धर्म के साथ इसमें स्थानीय लोक परम्पराएं भी सम्मिलित हो गईं हैं । भगवान बुद्ध को स्थानीय भाषा में “कोंचोजम कहा” जाता है । भगवान बुद्ध अत्यंात दयालु, चमत्काारी और तेजस्वी ईश्व्र के रूप में प्रतिष्ठिसत हैं । इस समुदाय में लामा अथवा पुजारी को विशेष महत्व दिया जाता है । लामा को सम्मावन की दृष्टि से देखा जाता है । लामा के बिना शेरदुक्पे न समुदाय का कोई संस्का्र आयोजित नहीं होता है । बौद्ध मठ को गोंम्पाल कहा जाता है जो शेरदुक्पे न लोगों की धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र है । रूपा और शेरगांव दोनों गांवों में गोंपा है जिसमें तिब्बोती शैली में भगवान बुद्ध की अनेक मूर्तियां स्थापित हैं । रूपा ग्राम का गोम्पाह शेरदुक्पे‍न क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे प्राचीन गोंपा है । प्रत्येक गोंपा की देखरेख लामा द्वारा की जाती है I

लामा द्वारा ही भगवान बुद्ध की पूजा की जाती है । गोंपा में जाने के लिए एक मुख्यजद्वार होता है जिसे “काकालिंग” कहते हैं । यह वर्गाकार होता है जिसमें पत्थिर से बनी दो समानांतर दीवारें होती है । इसमें भगवान बुद्ध और अन्यह बौद्ध विभूतियों के चित्र होते हैं । “लोसर” इनका प्रमुख त्यौहार है । यह नए वर्ष का त्योयहार है जो जनवरी के अंतिम सप्ताहह से लेकर फरवरी के द्वितीय सप्ताुह तक मनाया जाता है । त्यो्हार के प्रथम दिन सभी ग्रामवासी ब्रह्ममुहूर्त में ही जग जाते हैं । ऐसी मान्य ता है कि इस दिन जो देर तक सोएगा वह आनेवाले वर्ष में निरोग नहीं रहेगा । स्नांन करने के उपरांत लोग नए परिधान धारण करते हैं और महिलाओं द्वारा बनाया गया बिस्किट खाते हैं । नास्तें के बाद ये लोग मदिरापान करते हैं । इसके बाद लामा प्रत्येक घर में जाकर पारंपरिक विधि से त्योहार संपन्न कराता है । पर्व के अंतिम दिन सभी ग्रामवासी गोंपा में जाकर ईश्वर से अपनी सुख-समृद्धि और धन-वैभव की कामना करते हैं । त्योहार के अंतिम चरण में सभी लोग किसी नदी या झरने के तट पर जाकर नाचते-गाते हैं । छोटा व्याक्ति बड़े-बूढ़ों से आशीर्वाद लेता है और उनसे पुरस्कार भी प्राप्त करता है । अरुणचल के लोहित, चांगलांग और तिरप जिलों में सिंहफो जनजाति का निवास है । सिंहफो का अर्थ मनुष्य होता है ।

यह समुदाय अनेक प्रकार के धार्मिक त्योवहार मनाता है जिनमें “संकेन” त्योहार सबसे प्रमुख है । यह मार्च-अप्रैल माह में मनाया जाता है । यह बौद्ध कैलेंडर के अनुसार नववर्ष का त्यौहार है । इस अवसर पर भगवान बुद्ध की प्रतिमा का स्नान कराया जाता है । यह तीन दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है । पर्व के प्रथम दिन भगवान बुद्ध की मूर्ति को गोंपा से बाहर लाकर पंडाल में स्थानपित किया जाता है और पारंपरिक रीति- रिवाजों से मूर्ति की पूजा की जाती है । लोग नाच-गाकर खुशियां मनाते हैं तथा एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं देते है । अरुणाचल की मेंबा और खंबा दोनों जनजातियों की आबादी बहुत कम है । आर्थिक और सामाजिक दृष्टि। से ये जनजातियां बहुत पीछे हैं । भौगोलिक कारणों से ये लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं । आवागमन के साधनों का अभाव इनके विकास में बाधा है । अरुणाचल के वेस्ट सियांग और अपर सियांग जिले इनके निवास क्षेत्र हैं । दोनों जनजातियां बौद्ध धर्म में आस्था रखती हैं । “दुबा” मेंबा जनजाति का प्रमुख त्योहार है । यह त्योहार एक सप्ताह तक मनाया जाता है ।

टुटिंग का गोंपा इनके धर्मिक क्रियाकलापों का सबसे प्रमुख केंद्र है । पर्व के दिन रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर सभी लोग गोंपा में एकत्रित होते हैं । लोगों की भलाई और समाज में सुख-शांति की स्था्पना के उद्देश्य से यह पर्व मनाया जाता है । ऐसी मान्यता है कि इस त्योहार को मनाने से बुरी शक्ति्यों का विनाश होता है और अच्छी शक्ति यां प्रबल होती हैं I सभी लोग दुर्भाग्यन, रोग और प्राकृतिक आपदा से रक्षा के लिए इष्ट देवता की प्रार्थना करते हैं । लोगों का मानना है कि दुबा त्योहार का आयोजन नहीं करने से वे सुखी नहीं रह सकते । मुखौटा नृत्य इस पर्व का मुख्य आकर्षण है I सिक्किम में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायी रहते हैं I महान बौद्ध संत गुरु पद्मसंभव ने 8 वीं शताब्दी में सिक्किम का दौरा किया और इस पुण्य भूमि को अपना आशीर्वाद देकर इस भूमि को पवित्र किया I ऐसा माना जाता है कि उनकी कई गुप्त शिक्षा छुपी हुई है जिसे भविष्य में आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न लोगों द्वारा खोजा जाएगा। 17 वीं शताब्दी में तीन लामा, लहत्सुन चेन्पो, कार्तोक रिक्ज़िन चेन्पो और नागादक सेम्पा चेन्पो ने सिक्किम में तीन अलग-अलग दिशाओं से प्रवेश किया और नॉरबगांग, युकसोम में मुलाकात की I इन लामाओं ने राज्य में बौद्ध मठ स्थापित करने का फैसला किया। वर्ष 1642 में इन तीन भिक्षुओं ने सिक्किम के पहले राजा को फुंट्सोग नामग्याल का ताज पहनाया और उन्हें चोग्याल (धर्म राजा) का खिताब दिया। जबकि फुंट्सोग नामग्याल ने साम्राज्य को मजबूत करने पर काम किया, ल्हात्सुन चेन्पो की अगुवाई में तीन भिक्षुओं ने पूरे सिक्किम में मठों और मंदिरों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया।

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