डाकघर के कर्मवीर

—विनय कुमार विनायक
हे डाकघर
तुम जैसे वैसेतेरे कर्मवीर
तेरे गात्र की लालीसाही
बहताहैउनका अश्रु नीर!

तेरी ही पत्र पेटी केजैसा
उनका पेटकभी नही भरता
कठिन कामकर अर्धदाम पर
अधखाए असमय ही मरता!
इसका तुम्हेंनहीकुछ भान?

बेवक्त के अधबूढ़े जैसा,
तंगहाल पर तीव्र चाल से
डाकघर की ओर अग्रसर
वह अंतर्देशीयनुमा ढांचा!

पहला मोड़ घुटने पर,
दूसरा कमर,तीसरा गर्दन पर
मैल गोंद से चिपका कालर
इन श्रमवीरों का बोलो
किसने किया अपमान?

एक डाककर्मी अच्छे पद का
लगता यौवन में बूढ़ेजैसा,
अटपटे फाइलों में दबे चिपटे
वो लगता खुद से चिढ़ेसा!

बंजर जमीं पर उगे झाड़ सा दाढ़
सर्ट-पेंट यूं मुड़ा-तुड़ा लगता है कूड़े सा!

इस विकट दुर्दशा का कैसे हुआ निर्माण?
हेडाकघर तेरेश्रमजीवी मात्र पंद्रह पैसे के
टिकट परपोस्टकार्ड को जन के मुराद को
बढ़ती महंगाई के दौर मेंभारत भ्रमण कराता!

इस घाटे की भरपाई बोलो कौन कर जाता?
क्या नही कटाके वेडाककर्मीअपनी कौर से,
मगर श्रेय भारतसरकार को जाता
हायरे श्रमशोषण,वाह जनकल्याण!
—विनय कुमार विनायक

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