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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आशुतोष झा

वोट को हासिल करने के लिए कांग्रेस का यह कोई नया हथकंडा नहीं है। इसके पहले भी कई कांग्रेसी नेताओं ने बेबुनियाद बयान देकर देश को शर्मसार और अलगाववादी ताकतों को मजबूत किया है। कांग्रेस के अखिल भारतीय महामंत्री दिग्विजय सिंह ने 26-11-2010 को मुम्बई पर हुये हमले में पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की मौत के लिए हिंदू वादी संगठन को दोषी करार दिया है। सबूत में उन्होंने घटना से दो घंटे पहले हुई उनसे टेलीफोन पर बातचीत को बताया है। स्वर्गीय हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने दिग्विजय सिंह के बयान को वोट प्राप्ति का जरिया बताकर खारिज कर दिया है और कहा है कि दिग्विजय सिंह पूरी तरह से झूठ बोल रहे हैं, मेरे पति की हत्या किसी हिंदूवादी संगठनों ने नहीं बल्कि पाकिस्तानी आतंकवादियों ने की है। कविता करकरे ने यह भी कहा कि वोट के लिए मेरे पति की शहादत का अपमान नहीं किया जाय। यह पहली घटना नहीं है कि जब इस नेताजी ने इस प्रकार का बयान दिया है, इसके पहले भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक को देश द्रोही संगठन व सिमी से भी अधिक खतरनाक बताना और अपने मुख्यमंत्रित्व काल में संघ पर प्रतिबंध लगाने की पुरजोर वकालत वे कर चुके हैं। दिग्विजय के बयान से हालांकि कांग्रेस ने अपना कोई सरोकार नहीं जोड़ा है, लेकिन भाजपा ने इस बयान पर प्रधानमंत्री व सोनिया गांधी से सफाई मांगी है। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दिग्विजय सिंह से पूछा है कि आखिर घटना के दो साल बाद ही वे ऐसा क्यों बोल रहे हैं, जबकि इसका खुलासा तो तुरंत की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा है कि हेमंत करकरे से उनका परिचय कब से था, और अपने पर होने वाले संभावित हमले की जानकारी किसी इंटेलीजैंस ब्ूयूरो को न देकर उनसे ही क्यों कही। यह जो बयान है निश्चित तौर पर कांग्रेस की मंशा को व्यक्त करता है। मुम्बई हमले के बाद तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ए आर रहमान अंतुले ने भी यह कह कर कि मालेगांव बम विस्फोट की जांच कर रहे करकरे को हिंदुवादी संगठनों ने धमकी दी थी, इसलिए इनकी इस मौत में वे भी शामिल हो सकते हैं। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार इस बयान पर अपनी मौन सहमति देकर वोट के नफा नुकसान में जुट गई थी। बेबसाइट विकिलीक्स ने भी साफ तौर पर ख्ुालासा किया है कि कांग्रेस ने इस घटना का राजनीतिक लाभ लेने का भरपूर प्रयास किया था और यह सुनिश्चित कराने की कोशिश की थी कि इस घटना से हिंदूवादी संगठनों को जोड़ दिया जाय। इसलिए दिग्विजय सिंह के इस बयान को अंतुले के उस समय दिये गये बयान से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। संसद पर हमले का मुख्य सूत्रधार अफजल जिसे जिला सत्र न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने फांसी की सजा सुनाई हो उस अफजल को तुष्टीकरण की खातिर फांसी से बचाने वाली कांग्रेस का मुम्बई हमले में शामिल और भारतीय जेल में बंद कसाब को कहीं बचाने की तैयारी तो नहीं है। कांग्रेस की नीति में वह सब जायज है जिससे उसे वोट प्राप्त होता हो। नहीं तो अर्जुन सिंह के मानव संसाधन मंत्री के कार्यकाल में देश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा ही खोलने पर क्यों जोर दिया गया। कांग्रेस सरकार देश मे किसी और विश्वविद्यालय को नहीं बल्कि केवल इसी विश्वविद्यालय को आदर्श विश्वविद्यालय के तौर पर देखती है। जबकि यह सर्वविदित है कि इसी मुस्लिम विश्वविद्यालय में भारत विभाजन का रोडमैप तैयार हुआ था। चाहे जिन्ना हो या उस समय के भारत विभाजन के अन्य गुनहगार सभी को इस विश्ववि़द्यालय ने इसे अंजाम देने में मदद पहुंचाई। लेकिन कांग्रेस को वोट चाहिए इसलिए देश की अस्मिता ही क्यों न खतरे में पड़ जाय। यदि मन के अंदर ऐसी कोई कामना नहीं होती तो दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं की बोलती बहुत पहले ही बंद कर दी जाती। यह कांग्रेस है यहां कोई किसी से कम नहीं है चाहे उनकी जमीनी ताकत कुछ भी हो। बिहार की जनता ने जिसे राजनीति औकात बताया उस राहुल गांधी ने भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सिमी की तरह देशद्राही संगठन कहा था। सवाल आखिर यह है कि कांग्रेस इस प्रकार की राजनीति क्यों कर रही है, हिंदू बहुल देश में हिंदुओं को बदनाम करने का जो वह कुत्सित प्रयास कर रही है उसका परिणाम उसे स्वयं ही भुगतना होगा।

One Response to “अफजल की तरह कसाब को कहीं बचाने की तैयारी तो नहीं”

  1. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    न तो अफजल बचा है और न ही कसाब बच सकेगा, फिर ये गैर जरूरी सवाल क्यों खड़े किये जाते हैं? इस देश की न्याय प्रणाली जिस गति से चलती है, उससे तेज रफ़्तार से कसाव के मामले का निर्णय हुआ है.

    मैं ऐसे व्यक्ति को जनता हूँ जिसे सात वर्ष तक जेल में बंद रखने के बाद जिला अदालत ने निर्णय सुनाया कि पुलिस के पास आरोपी के खिलाफ पहले दिन से ही कोई सबूत नहीं है!

    आश्चर्य तो ये कि इस दौरान आठ जज बदल गए, लेकिन किसी को ये बात समझ में नहीं आयी!

    एक दुसरे मामले में आरोपी को जिला जज ने फांसी कि सजा सुनायी, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा बहाल रखी. राष्ट्रपति ने भी सजा बहाल रखी और बाद में हाई कोर्ट ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया.

    ये भारत है. यहाँ सब संभव है?

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