लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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-राकेश कुमार आर्य-

narendra modi

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में  कई चीजें  बेतरतीब रूप में देखी गयीं। उन सब में प्रमुख थी किसी भी सरकारी विज्ञापन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ-साथ कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के चित्र का लगा होना। यह लोकतंत्र और लोकतंत्र की भावना के विरूद्ध किया गया कांग्रेसी आचरण था। जिससे प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण और संवैधानिक पद की प्रतिष्ठा का पतन हुआ। प्रथम दृष्टया तो इसे देखकर यही कहा जा सकता था कि प्रधानमंत्री के साथ सरकारी विज्ञापन पर किसका चित्र लगे किसका न लगे, यह सरकार का विवेक है। इसलिए इस पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में यह कांग्रेसियों का कुतर्क था, जिसे वह  अपनी नेता श्रीमती सोनिया गांधी को खुश करने के लिए दे रहे थे।

यह बात  तो सही है कि सरकारी विज्ञापन पर किसका चित्र का लगे किसका न लगे,यह सरकार का विवेक है, पर विवेक भी विवेकपूर्ण होगा इस बात की क्या गारंटी है।  ऐसा विचार करना ही विवेक पर  प्रश्नचिन्ह लगा देता है कि सोनिया गांधी जिनके पास कोई संवैधानिक पद नहीं था, को प्रधानमंत्री के साथ सरकारी विज्ञापन पर क्यों बैठाया जाने लगा? लोकतंत्र की अपनी सीमायें हैं और अपनी मर्यादाएं हैं। लोकतंत्र की सबसे पहली मर्यादा है कि यह लोगों को लोकतंत्र ही दिखाई दे, किसी पार्टी या किसी  पार्टी के ‘पूज्य परिवार’ की जागीर नहीं। इसलिए सरकारी नीतियों की मर्यादा और सीमा यही है कि लोकतंत्र के स्वरूप को लोकतंत्र  की आत्मा संविधान का कही से हनन न हो। प्रधानमंत्री एक संवैधानिक पद है, जिससे राष्ट्र की गरिमा का बोध होता है। जबकि राष्ट्रपति हमारे संविधान का प्रमुख संरक्षक है। इसलिए सरकारी नीतियों में, सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से यह संकेत और संदेश कदापि नहीं जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री के समान हैसियत का कोई और व्यक्ति भी है। कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी के कहने पर बेशक प्रधानमंत्री बनाया, परंतु प्रधानमंत्री बनते ही वह ‘कांग्रेस के प्रधानमंत्री’ न होकर ‘भारत के प्रधानमंत्री’ बन गये थे। ऐसे में   वह राष्ट्र की गरिमा का प्रतीक बन गये थे, जिसका अभिप्राय है कि वह दलीय भावना और दलीय परिस्थितियों से ऊपर उठ गये।  अत: उनके साथ सोनिया गांधी के चित्र का लगे होने का अभिप्राय था कि वह देश के प्रधानमंत्री न होकर कांग्रेस के प्रधानमंत्री  थे और इसलिए कांग्रेस व देश में सोनिया गांधी उनसे बड़ी हैसियत रखती थीं।

विनम्र मनमोहन सिंह ने  अपनी इस स्थिति को   अपने लिए स्वीकार्य बना लिया। जिसका परिणाम यह आया कि  प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद का अवमूल्यन हुआ। इस अवमूल्यन  का दुष्प्रभाव  विदेशों में  भी देखने को मिला । जब लोगों ने भारतीय प्रधानमंत्री  को अधिक भाव नहीं दिया था या कुछ ऐसा अहसास कराने का प्रयास किया कि भारत का  प्रधानमंत्री किसी एक महिला का ‘अधीनस्थ कर्मचारी है।’ इससे भारत की विश्व मंचों पर भी किरकिरी हुई और भारत की आवाज को लोगों ने हल्के में लेना आरंभ कर दिया।

अब भारत के सर्वोच्च न्यायाल ने निर्देश दिया है कि सरकारी विज्ञापनों पर केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के चित्र ही प्रकाशित किये जायें। सर्वोच्च न्यायालय ने  यह भी स्पष्ट किया है कि इन विज्ञापनों को राजनैतिक दलों के नेताओं के प्रचार का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। और न ही किसी मंत्री या नेता की व्यक्तिगत छवि को बनाने के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए। क्योंकि सरकार का कोई कार्य या योजना किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय नहीं हो सकता।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश का पालन कड़ाई से होना चाहिए। न्यायालय का यह निर्देश  वास्तविक  लोकतंत्र की स्थापना में सहायक होगा और इससे लोकतांत्रिक संस्थानों की स्वीकार्यता बढ़ेगी। इस देश में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को भगवान के रूप में पूजा जाता है, परंतु  भगवान राम की मर्यादाओं का लोग सम्मान नहीं करते। गली मौहल्ले के लोग भी या पार्टी के कार्यकर्ता अपने  प्रदेश के या अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री या अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री के साथ विज्ञापनों पर अपने चित्र लगाकर लोकतांत्रिक संवैधानिक मर्यादाओं का हनन करते हैं, जबकि यह गलत है। यदि मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री को लोग इन पदों पर जाते ही उन्हें अपनी किसी पार्टी विशेष से न बांधकर देखें तो ही अच्छा होगा। तब पार्टी कार्यकर्ताओं को भी अपने प्रधानमंत्री अथवा  मुख्यमंत्री की  रचनात्मक आलोचना करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा।  जैसा कि आजादी के बाद के प्रारम्भिक वर्षों में देखा भी गया था। जब लोग संसद में अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना कर लिया करते थे। यह स्थिति स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं की प्रतीक थी।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्देशों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि-‘‘सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री के चित्रों पर प्रतिबंध लगाने का उच्चतम न्यायालय का निर्देश राज्य के अधिकारों का हनन है।’’ उनका मानना है कि संविधान  प्रधानमंत्री के समान स्तर प्रदान करता है। श्री करूणानिधि के अनुसार  उच्च न्यायालय का यह निर्देश कि सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री के चित्रों का प्रयोग न होकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश के चित्र होने चाहिए, यह राज्यों के अधिकारों का हनन होता है। उनका यह भी कहना है कि भारत  के संविधान के अनुसार संघीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री का पद समान स्तर का है।

श्री करूणानिधि की अपनी व्यवस्था है और अपनी मान्यता है, जिसे प्रस्तुत करने के लिए वह स्वतंत्र हैं, जबकि  शीर्ष अदालत की अपनी धारणा है और शीर्ष अदालत की उस धारणा  और मान्यता का सही अर्थों  और सही संदर्भों में  अर्थ निकालना हम  सबके लिए अनिवार्य है। इसमें दो मत नहीं हैं कि  जो अधिकार केन्द्र में  कुछ परिस्थतियों में प्रधानमंत्री के सुरक्षित होते हैं वही प्रदेश में मुख्यमंत्री के पास सुरक्षित होते हैं। परंतु इसके उपरांत भी प्रदेश प्रदेश है। और मुख्यमंत्री केवल मुख्यमंत्री है। उसकी सोच सीमित हो सकती है, दृष्टिकोण  लघु  हो सकता है। इसलिए उसे हटाने के लिए संविधान में धारा 356 की व्यवस्था की गयी है, जबकि प्रधानमंत्री को चलता करने के लिए कोई धारा 356 संविधान में नहीं है।  यह अलग बात है कि किन्ही विशेष परिस्थितियों में देश में आपातकाल की घोषणा की जा सकती है, और यह  प्रधानमंत्री को संवैधानिक प्रक्रिया के तहत  हटाया भी जा सकता है, परंतु हटने वाला कोई व्यक्ति होता है प्रधानमंत्री नहीं, और यह भी  कि आपातकाल में भी देश का नेता प्रधानमंत्री ही होता है। इसका अभिप्राय है कि  एक प्रधानमंत्री से अत्यंत परिपक्व बुद्धि का होने और उसके द्वारा विशाल हृदयता  का प्रदर्शन करने की अपेक्षा की जाती है कि जो व्यक्ति  प्रधानमंत्री बन गया वह  इन दोनों गुणों से भली प्रकार सुशोभित हुआ।  प्रदेश का मुख्यमंत्री राष्ट्रीय नेता नहीं हो सकता क्योंकि वह अपने  राज्य से  बाहर की बात नहीं सोच सकता, उसके राज्य की सीमाएं उसके क्षेत्राधिकार  का निर्धारण करती हैं,और उसे बता देती हैं कि तुझे कहां तक उडऩा है? जबकि  देश के प्रधानमंत्री की सीमाएं देश की सीमाओं से भी बाहर जाती हैं। जब उसे विश्वमंचों पर देश के नायक के रूप में अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल जी ने अनेकों  अवसरों पर विश्वमंचों पर देश का सम्मान बढ़ाया था, तब लोगों को लगता था कि   उनके पास कोई नेता है।  आज उसी परंपरा को नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने चीन में या उससे पूर्व अन्य देशों में  जाकर जो सम्मान अर्जित किया है उससे देश का मस्तक ऊंचा हुआ है। उन्होंने  चीन की धरती से   ठीक ही कहा है  कि  चीन के राष्ट्रपति  ने प्रोटोकॉल तोडक़र जिस प्रकार उनका सम्मान किया है वह  मेरे देश के  सवा अरब लोगों को दिया गया सम्मान है। जिस किसी ने भी मोदी के यह शब्द सुने उसी ने  प्रसन्नता का अनुभव किया। हर व्यक्ति ने  मोदी से अधिक  स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया। कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री बनने की सोच सकता है, और समय आने पर जनता की इच्छा से प्रधानमंत्री बन भी सकता है, यह एक अलग बात है। पर मुख्यमंत्री रहते हुए   वह प्रधानमंत्री का समकक्ष नहीं हो सकता। इसलिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और  देश के मुख्य न्यायाधीश को ही सरकारी विज्ञापनों में स्थान देकर उचित और न्यायसंगत निर्देश दिया है। हमारा राष्ट्रपति पूरे देश का सम्मान इसलिए प्राप्त करता है कि वह दलीय भावनाओं से ऊपर होता है। पूरा देश उसे अपना  समादरणीय मानकर सम्मानित करता है। इसी प्रकार मुख्य न्यायाधीश को लोग न्यायमूर्ति के रूप में सम्मानित करते हैं।  राष्ट्रपति का  काम सृष्टा (ब्रह्मा) का है,प्रधानमंत्री  का काम पालनकर्ता (विष्णु) का है और मुख्य न्यायाधीश का काम संहारकत्र्ता (महेश)  का है ।

यहां संहारकर्ता का अभिप्राय दुष्ट अन्यायी और नीच लोगों को दंडित करने से है  । ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पूजक इस देश की परंपराओं के निहित अर्थों का सम्मान होना चाहिए । गायत्री मंत्र का भू:-उत्पत्तिकर्ता (ब्रह्मा) भुव:-पालन कर्ता (विष्णु-जैसे परिवार में पिता होता है और वह निष्पक्ष भाव से सबका पालन पोषण करता है वैसे ही राष्ट्र में प्रधानमंत्री होता है ) और स्व:-सुखप्रदाता  (महेश) भी यही संकेत करता है कि राष्ट्र में तीनों  शीर्ष शक्तियों का सम्मान करते चलो और  वे तीनों शक्तियां अपनी मर्यादा का पालन करें तो राष्ट्र, समृद्धि, उन्नति को प्राप्त कर अपनी अखण्डता की रक्षा कर सकता है।

10 Responses to “राष्ट्रपति, पीएम और मुख्य न्यायधीश होते हैं- राष्ट्र के ब्रह्मा, विष्णु, महेश”

  1. Durga S Nagda

    राकेश जी व मधुसूदन जी के कथन शत प्रतिशत सही है ।

    ब्रह्मा, विष्णु, महेश के उपर भी सम्भवतया प्रजा परमेश्वर होती है जो विष्णु को जन्म देती है और उसी प्रजा मे से ब्रह्मा व महेश निकलते है।

    प्रजातंत्र मे प्रजा ही श्रेष्ठ है, जैसे परमेश्वर ही सबसे श्रेष्ठ है चाहे वह सगुण हो या निर्गुण और दोनो मे भेद तो खास कुछ नही है परन्तु सगुण की अधिक विशेषता है ।

    धन्यवाद ।

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      नगोदा जी,
      आज आवश्यकता अपने सांस्कृतिक मूल्यों और परम्पराओं को सही परिपेक्ष में समझने की है। ब्रह्मा,विष्णु,महेश बीते हुए समय की बातें नहीं हैं ये शाश्वत सत्य हैं और यदि इन्हे सही अर्थों में आज भी समझ लिया जाए और तदनुसार अपना आचरण बना लिया जाए तो भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है। आपने सही अर्थों में मेरे मन्तव्य को समझने का प्रयास किया है इसके लिए आपका हार्दिक आभार।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    राकेश जी—सही विषय उठाने के लिए धन्यवाद। कुछ शीघ्रता से ही सार पढ गया।
    चाणक्य नीति, विदुर नीति इत्यादि नीतियों में ऐसे “शक्ति केंद्र” व्यक्तिमत्वों की व्याख्याएं की गयी है।
    अमात्य के गुण से ही उनकी समानता मानी जा सकती है।(निः स्पृहता को भी उन्हों ने सुरक्षित किया था।)
    (१) जिसके पास ऐसे निर्णय की शक्ति हो, उसे कौटुम्बिक स्वार्थ से भी ऊपर होना चाहिए। जैसे आदर्श होता है ब्राह्मण्य का। (यह न्याय सत्ता की बात है।)यह लोग स्वयं चकाचौंध से दूर हुआ करते थे। कुटिया में रहनेवाले।
    (२) जिसके पास (राज) सत्ता थी उसके लिए (न्यायदण्ड) यानी धर्मदण्ड सर्वोपरि था।
    (३) प्रजा भी कर्तव्य के आदर्श से धर्म के अंतरगत अर्थ, और काम दोनो पुरूषार्थों की प्राप्ति के लिए उद्युक्त थी।
    इस पौराणिक एव ऐथासिक सत्ता संतुलन के उदाहरण, राम, चंद्रगुप्त, शिवाजी और भी कुछ उदाहरणों में हो सकते हैं।
    शायद कुछ विषयांतर हुआ हो सकता है। इस “बारतीय परम्परा प्राप्त, सत्ता संतुलन”
    कहा जा सकता है।
    प्रजा, न्याय, और शासक —-तीनों भी कर्तव्य भाव प्रेरित (न कि अधिकार भाव प्रेरित)।

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      श्रद्धेय डा० साहब,
      सादर प्रणाम
      उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
      चाणक्य नीति, विदुर नीति, शुक्र नीति, इत्यादि ऐसे ग्रंथ हैं जो युग युगों तक भारत का मार्गदर्शन कर सकते हैं। यह हमारा अज्ञान ही होगा कि हम अपने आप को इन मार्गदर्शक नीति शास्त्रों से दूर रखने का प्रयास करें। और जितना हम इन नीति शास्त्रों से स्वंय को दूर रखने का प्रयास करेंगे उतना ही हम समस्याओं के भँवर जाल फँसते जाएंगे जैसा कि कोंग्रेसी शासन की कुपरंपराओं ने करके ही दिखा दिया है ।
      “उगता भारत” बनाने के लिए नए संकल्पों की आवश्यकता नहीं है,अपितु पुरातन विकल्पों में से ही संकल्पों को खोजने कि आवश्यकता है ।
      आपका शुभाशीष मिला इसके लिए हृदय से आभार।

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  3. parshuram Kumar

    देश असली आज़ादी की अपेक्षा इन तीनो से कर रहा है।

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      परशुराम जी
      देश कि अपेक्षा हमसे भी है कि हम ब्रह्मा,विष्णु,महेश का ही चयन करें।

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  4. MithilaConnect

    सरकारी विज्ञापन के सन्दर्भ में बिलकुल उचित व्याख्या की है सुप्रीम कोर्ट ने । प्रधानमंत्री ,राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के उच्च न्यायाधीश पर संविधान की सुरक्षा का भार है । ये राष्ट्र के प्रतिनिधि है ना कि प्रान्त के ।

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      मिथिला जी
      भारत की न्यायपालिका ने अपने सम्मान की कई बार स्वंय रक्षा की है इसके न्यायपूर्ण निर्णयों ने भारत की न्यायपालिका को विश्व की सुद्रढ़ न्यायपालिका सिद्ध करने में सहायता की है ।

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      सिन्हा जी
      नमस्कार
      आपकी प्रेमपूर्ण उत्साह और उत्साहवर्धन भावनाओं के लिए आभारी हूँ।

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