देश को एक खतरनाक कानून से बचाएं

विनोद बंसल

किसी भी देश के लिए उसके नागरिक एक अमूल्य निधि होते हैं तथा उनके अधिकारों की रक्षा राज्य सत्ता का परम धर्म होता है। प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा तथा उसके मूलाधिकारों की रक्षा की गारंटी सुनिश्चित करते हुए सरकार को यह भी ध्यान रखना होता है कि सभी नागरिकों को अपनी प्रगति के समान अवसर प्राप्त हों। राज सत्ता या सरकार का यह प्रमुख कर्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों में मत, पंथ, सम्प्रदाय या भाषा के आधार पर कोई भेद न होने दे। भारतीय संविधान में भी सांम्प्रदायिक आधार पर नागरिकों को बांटने की स्पष्ट मनाही है?

किन्तु क्या आप जानते हैं कि विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र भारत में एक ऐसा कानून बनने जा रहा है जो न सिर्फ़ अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक के बीच गहरी खाई बनाएगा बल्कि देश के बहु संख्यकों (हिन्दुओं) का दमन कर उसके मानवाधिकारों को भी छीन लेगा। आइए! सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011(‘Prevention of Communal and Targeted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill,2011) नामक इस तानाशाही कानून को जानें तथा इसे संसद में पारित होने से रोकें :

  • इस विधेयक में पहले से ही मान लिया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा की समस्या केवलबहुसंख्यक समुदाय के सदस्य ही पैदा करते है। अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति इसकेलिए जिम्मेदार नहीं है।
  • बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ किए गए सांप्रदायिक अपराध तो दंडनीय है, किंतु अल्पसंख्यक समुदाय के द्वारा बहुसंख्यकों के खिलाफ किए गए सांप्रदायिक अपराध दंडनीय नहीं है।
  • विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है समूहकी परिभाषा समूह से तात्पर्य पंथिक या भाषायी अल्पसंख्यकों से है। समूह की परिभाषा में बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों को शामिल नहीं किया गया है। इसमें माना गया है कि बहुसंख्यक समुदाय का कोईव्यक्ति सांप्रदायिक हिंसा का शिकार नहीं हो सकता है। किन्तु अभियुक्त हर हाल में बहुसंख्यक समुदाय का व्यक्ति ही होगा।
  • कानून की शक्तियां एक ऐसे प्राधिकरण को प्राप्त होंगी जिसमें निश्चित ही बहुसंख्यक समुदाय के सदस्य अल्पमत में (नगण्य) होंगे।
  • पीड़ित के बयान केवल धारा 164 के तहत अर्थात अदालतों के सामने ही दर्ज हो सकेंगे। यदि किसी व्यक्ति के ऊपर घृणा संबंधी प्रचार का मिथ्यारोप भी लगता है तो भी उसे तब तक एक पूर्वधारणा के अनुसार दोषी माना जाएगा जब तक वह निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाता। साफ है कि आरोप सबूत के समान होगा
  • मुकदमे की कार्यवाही चलवाने वाले विशेष लोक अभियोजक सत्य की सहायता के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित के हित में काम करेंगे।
  • शिकायतकर्ता का नाम और पहचान गुप्त रखी जाएगी। केस की प्रगति की रपट पुलिस शिकायतकर्ता को ही बताएगी। अभियुक्त को न तो यह जानने का अधिकार होगा कि उसके विरुद्ध किसने शिकायत की है तथा न ही यह कि उस शिकायत पर अब तक की पुलिस कार्यवाही की स्थिति क्या है?
  • सांम्प्रदायिकता की एक बानगी देखिए। यह विधेयक एक गैर हिन्दू महिला के साथ किए गए दुर्व्यवहार को तो अपराध मानता है परन्तु, हिन्दू महिला के साथ किए गए बलात्कार को भी अपराध नहीं मानता
  • अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि विधेयक के प्रभावी होने पर अब अफजल गुरु को फांसी की मांग करना, बांग्लादेशी घुसपैठियों के निष्कासन की मांग करना, धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग करना इत्यादि भी अब अपराध बन जायेगा।
  • भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुसार किसी आरोपी को तब तक निरपराध माना जाता है जब तक वह दोषी सिद्ध न हो जाये। परन्तु, इस विधेयक में आरोपी तब तक दोषी माना जायेगा जब तक वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध न कर दे। इसका मतलब है कि किसी भी गैर हिन्दू के लिए अब किसी भी हिन्दू को आतंकित कर उसे जेल भेजना आसान हो जायेगा। वह केवल आरोप लगायेगा और पुलिस अधिकारी आरोपी हिन्दू को जेल में डाल देगा।
  • यदि किसी संगठन के कार्यकर्ता पर साम्प्रदायिक घृणा का कोई आरोप है तो उस संगठन के मुखिया पर भी शिकंजा कसा जा सकता है।
  • विधेयक कहता है कि संगठित सांप्रदायिक और किसी समुदाय को लक्ष्य बनाकर की जाने वाली हिंसा इस कानून के तहत राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जाएगी। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार ऐसी दशा में अनुच्छेद 355 का इस्तेमाल कर संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने में सक्षम होगी अर्थात, विधेयक के लागू होने पर केंद्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकारों को हड़प लेगी।

संप्रग अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने यह विधेयक तैयार किया है सके सदस्यों और सलाहकारों में हर्ष मंडेर, अनु आगा, तीस्ता सीतलवाड़, फराह नकवी जैसे हिन्दू विद्वेषी तथा सैयद शहाबुद्दीन, जॉन दयाल, शबनम हाशमी और नियाज फारुखी जैसी घोर साम्प्रदायिक शक्तियों के हस्तक हों तो विधेयक के इरादे क्या होंगे, आसानी से इसकी कल्पना की जा सकती है।

विधेयक के इस पौशाचिक व राष्ट्रघाती स्वरूप के कारण ही इसके विरुद्ध न सिर्फ़ गत माह देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए वल्कि गत सप्ताह हुई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक की एकता भी बिखर गई । कई राज्यों के मुख्य मंत्रियों तथा राजनैतिक दलों ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया। यह निश्चित है कि विधेयक अगर पास हो जाता है तो हिन्दुओं का भारत में जीना दूभर हो जायेगा। देश द्रोही तत्व खुलकर भारत और हिन्दू समाज को आतंकित कर समाप्त करने का षडयन्त्र करते रहेंगे। हिन्दू संगठन इनको रोकना तो दूर इनके विरुध्द आवाज भी नहीं उठा पायेंगे। हिन्दू जब अपने आप को कहीं से भी संरक्षित नहीं पायेगा तो धर्मान्तरण का कुचक्र तेजी से प्रारम्भ हो जायेगा इससे भी भयंकर स्थिति तब होगी जब सेना, पुलिस व प्रशासन इन अपराधियों को रोकने की जगह इनको संरक्षण देंगे और इनके हाथ की कठपुतली बन देशभक्त हिन्दू संगठनों के विरुध्द कार्यवाही करने के लिए मजबूर हो जायेंगे। क्योंकि यदि किसी अल्पसंख्यक की शिकायत पर पुलिस ने कार्यवाही में देरी कर दी तो विधेयक के अनुसार पुलिस के मुखिया के विरुद्ध भी कार्यवाही निश्चित है। अधिक जानकारी के लिए प्रस्तावित विधेयक को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की वेव साइट http://nac.nic.in/communication.htm  पर भी पडा जा सकता है।

आओ ! हम सब देशवासी मिल कर केन्द्र सरकार को उसके संवैधानिक उत्तर दायित्वों की याद दिलाते हुए इस विधेयक को तुरन्त निरस्त करने के लिए दवाब डालें तथा इस खतरनाक कानून की आड में सांप्रदायिक आधार पर देश के एक और विभाजन को रोकें। कहीं ऐसा न हो कि कोई हमसे कहे कि “अब पछताए क्या होत है जब चिडिया चुघ गई खेत”।

1 thought on “देश को एक खतरनाक कानून से बचाएं

  1. देश के पिछले १०० वर्षों के इतिहास का यदि अवलोकन किया जाये और सरकारी पत्रावलियों तथा जांच आयोगों और संसद में सर्कार के गृहमंत्री द्वारा दिए गए बयान को देखा जाये तो सभी निर्विवाद रूप से चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं की देश में सांप्रदायिक झगड़ों की शुरुआत कभी भी बहुसंख्यक (हिन्दुओं) द्वारा नहीं की गयी. हाँ जवाबी प्रतिकार में मुस्लिमो का भी नुकसान हुआ जो ऐसे मामलों में बिलकुल स्वाभाविक है. यह कानून केवल अपना अल्प्संख्यक वोट बैंक पक्का करने के लिए लेन का प्रयास किया जा रहा है जिसकी आलोचना भारत के पूर्व मुख्या न्यायाधीश जे. एस. वर्मा तथा पूर्व न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण द्वारा भी की गयी है. सर्कार को यदि थोड़ी भी सद्बुद्धि है तो इस कानून को लेन का विचार छोड़ दे वर्ना देश के हिन्दू बहुसंख्यकों की प्रतिक्रिया में इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादियों का नामोनिशान मिट जायेगा.

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