कविता

वैदिक विष्णु

-अशोक “प्रवृद्ध”

अक्षय अज अव्यक्त प्रभु, व्यापक सकल जहान।
शोभित सुंदर रूप है, करता जग कल्याण।।

अन्तरिक्ष में पग धरा, विष्णुकर्म सूक्त गात।
शोभा अमित विराट की, करती भव-भय पात।।

अणोरणीयान रूप है, महतोमहीयान रूप।
शोभा सिंधु अनंत की, कहते वेद अनूप।।

अनघ नाम हरि का जपो, कटते कष्ट महान।
शोषण होता पाप का, करता ज्ञान विहान।।

अनन्या चेतना करे, केवल हरि का ध्यान।
शांत चित्त में प्रभु बसें, करते कृपा निधान।।

अद्भुत रूप चतुर्भुजम्, शंख चक्र अति धार।
शोभित गदा पद्महस्त, करते असुर संहार।।

अग्नि मुख हैं विष्णु के, यज्ञ रूप भगवान।
श्रद्धा से आहुति मिले, कल्याणक सुखखान।।

अमृत सम हरि नाम है, श्रवण करो दिन रैन।
शोकाकुल व्याकुल हिया, कर पावे सुख चैन।।

अवनि मापी एक पग, नभ मापा कर भूरि।
शोभित पग त्रिविक्रम का, करता संकट दूरि।।

अशरन शरन जनार्दन, राखो अपनी ओट।
शरण तुम्हारी जो रहे, काल न मारे चोट।।

अगम अगोचर देव जो, वेदों के हैं प्राण।
शोभा पावन नाम की, करती मुक्ति विधान।।

अविनाशी वह परम पद, सुर देखें दिन रात।
शोभित गोपीनाथ का, करता तिमिर निपात।।

अघनाशन माधव स्मरण, मेटे भव की पीर।
शमन करे सब त्रास को, कहे दास मनधीर।।

अनंत शयन जलधि विषय, लक्ष्मी चरण दबात।
शोभा अमित गरुड़ध्वज, कहते सब मुनि व्रात।।

अरविंदाक्ष नाम का, गाओ पावन गान।
शोषण सब संताप का, करता नाम महान।।

अन्तरयामी प्रभु सजग, घट-घट करते वास।
शुद्ध हृदय में जो बसें, कटता मोह विलाश।।

अविद्या का नाश कर, देते दिव्य प्रकाश।
शोभा ज्ञान स्वरूप की, करती भर्म विनास।।

अक्रूरप्रिय करुणा करन, भक्तन के रखवार।
शोक मिटाते दास का, करते बेड़ा पार।।

अच्युत अनंत गोविंद का, मन में सुमिरन होय।
शांति मिले संसार में, कष्ट न व्यापे कोय।।

अर्पित कर दी चेतना, चरण कमल की छांव।
शरण गहे जन विष्णु की, कर पावे शुभ ठांव।।

  • अशोक प्रवृद्ध