राजनीति

परीक्षा पर सवाल, लोकतंत्र कटघरे में

कुमार कृष्णन 

झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी की परीक्षाओं को लेकर चल रहा आंदोलन अब परीक्षा का मामला भर नहीं रह गया है। परीक्षा में कथित अनियमितता, छात्रों का आंदोलन, विधानसभा का हंगामा, पुलिस की कार्रवाई, राजनीतिक दलों के आरोप और प्रत्यारोप—इन सबके बीच एक बुनियादी सवाल कहीं दबता जा रहा है। वह सवाल है कि राज्य अपने युवाओं से आखिर कह क्या रहा है—मेहनत करो और भरोसा रखो, या मेहनत करो और फिर व्यवस्था पर संदेह करते रहो?

किसी प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र केवल कागज पर छपे सवालों का पुलिंदा नहीं होता। उसके पीछे किसी छोटे शहर के कमरे में रात-रात भर जागता हुआ विद्यार्थी होता है, खेत बेचकर या कर्ज लेकर पढ़ाने वाला परिवार होता है, उम्र निकल जाने का डर होता है और नौकरी मिल जाने पर जीवन बदल जाने की उम्मीद होती है। इसलिए परीक्षा की निष्पक्षता पर उठने वाला सवाल केवल प्रशासनिक सवाल नहीं होता। वह उस सामाजिक अनुबंध पर सवाल होता है जिसमें राज्य अपने युवाओं से कहता है कि अवसर सबके लिए समान है।

झारखंड में पिछले दिनों जो हुआ, वह इसी भरोसे के संकट को सामने लाता है।

छात्र पिछले अठारह दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। दस अगस्त को विधानसभा मार्च के दौरान पुलिस से टकराव हुआ। पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज की खबरें आईं। इसके बाद भी आंदोलन थमा नहीं। रांची में एबीवीपी के करीब 110 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने और हिरासत में लिए गए लोगों को ले जा रही बस को रोकने के प्रयास के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की खबर सामने आई। महिला प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लिए जाने की बात कही गई। उधर, इन घटनाओं के विरोध में भाजपा विधायकों के हंगामे के कारण विधानसभा की कार्यवाही तय समय से एक दिन पहले अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई।

यह सब केवल घटनाओं की एक श्रृंखला नहीं है। यह लोकतंत्र के तीनों रास्तों—सड़क, सदन और सरकार—के बीच संवाद टूटने का संकेत भी है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विधानसभा में कहा कि भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीआईडी जांच चल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की ओर से सुझाए गए सुधारों को आंदोलनकारी छात्रों ने स्वीकार कर लिया है। यदि ऐसा है तो सरकार को इसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना चाहिए। छात्रों की कौन-सी मांगें मानी गई हैं, किन पर सहमति बनी है, कौन-सी मांगें लंबित हैं और उनके समाधान की समयसीमा क्या है—इन सवालों के जवाब जनता के सामने होने चाहिए।

लोकतंत्र में सरकार का भरोसा केवल उसके बहुमत से नहीं बनता, उसके फैसलों की पारदर्शिता से बनता है।

सरकार ने 14वीं जेपीएससी और बैकलॉग परीक्षा रद्द करने की घोषणा की है। टीडीपीएल के माध्यम से अब तक आयोजित परीक्षाओं की उच्चस्तरीय जांच की बात भी कही गई है। परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए आईआईटी, आईआईएम और एक्सएलआरआई जैसे संस्थानों से विशेषज्ञ राय लेने की बात स्वागतयोग्य है। लेकिन परीक्षा रद्द कर देना अपने आप में सुधार नहीं है। वह तो उस विफलता का प्रमाण है जिसके कारण रद्द करने की नौबत आई।

जिस परीक्षा में हजारों युवाओं ने अपना समय लगाया, उसे रद्द करने का सबसे बड़ा मूल्य भी वही युवा चुकाएगा। उसकी उम्र बढ़ेगी, उसकी तैयारी का समय फिर लगेगा, परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और वह फिर उसी अनिश्चितता में जाएगा जिससे निकलने के लिए उसने परीक्षा दी थी। इसलिए परीक्षा रद्द करने के साथ सरकार को यह भी बताना चाहिए कि अभ्यर्थियों के इस नुकसान की भरपाई किस तरह होगी।

और इससे भी बड़ा सवाल है—अगर गड़बड़ी हुई तो जिम्मेदार कौन है?

किसी परीक्षा एजेंसी को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। एजेंसी का चयन किसने किया? उसकी निगरानी किसने की? परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी? शिकायतों को समय पर क्यों नहीं सुना गया? अगर पहले से संकेत मिल रहे थे तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? प्रशासनिक व्यवस्था का यही वह हिस्सा है जिस पर सार्वजनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए।

इस विवाद का दूसरा पहलू राजनीति है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा आंदोलन को राजनीतिक रंग देने के लिए पश्चिम बंगाल से भाजपा युवा मोर्चा से जुड़े युवाओं को ट्रकों में झारखंड ला रही है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक वीडियो भी साझा किया है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन अगर यह आरोप सही है तो छात्र आंदोलन को राजनीतिक भीड़ में बदलने की कोशिश गंभीर है। और अगर आरोप गलत है तो उसका खंडन प्रमाण के साथ होना चाहिए।

राजनीति का एक दुर्भाग्य यह है कि वह जनता के सवाल को अपने पक्ष में प्रमाणित करने लगती है। सरकार कहती है कि आंदोलन विपक्ष का है। विपक्ष कहता है कि आंदोलन जनता का है। लेकिन इन दोनों दावों के बीच छात्र कहां है?

किसी आंदोलन में राजनीतिक दलों का पहुंचना उसे झूठा नहीं बनाता। और किसी आंदोलन में छात्रों की भीड़ होना उसे अपने आप राजनीतिक रूप से पवित्र भी नहीं कर देता। असली कसौटी यह है कि मांग क्या है, तथ्य क्या हैं और समाधान क्या है।

यहीं सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा है।

मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर धनबल, संस्थाओं के दुरुपयोग और छात्रों को गुमराह करने के आरोप लगाए हैं। विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने और पुलिस बल के इस्तेमाल का आरोप लगा रहा है। लेकिन आरोपों की इस प्रतिस्पर्धा में परीक्षा व्यवस्था का सवाल पीछे नहीं जाना चाहिए।

सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता है आंदोलन को विपक्ष की साजिश कहना। विपक्ष के लिए सबसे आसान रास्ता है हर पुलिस कार्रवाई को सरकार की दमनकारी नीति कहना। दोनों रास्ते आसान हैं क्योंकि दोनों में अपने-अपने समर्थकों को संतुष्ट किया जा सकता है। कठिन रास्ता है तथ्य के सामने खड़ा होना।

यदि छात्रों ने बैरिकेड तोड़े तो प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र में यह भी पूछा जाएगा कि बल प्रयोग कितना आवश्यक था। यदि पुलिस ने सीमा लांघी तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून सबके लिए समान है—यही लोकतंत्र की पहली शर्त है।

राहुल गांधी ने छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बल प्रयोग की आलोचना की है और संवाद से समाधान की बात कही है। कांग्रेस झारखंड सरकार में सहयोगी है। इसलिए यह बयान सरकार के लिए राजनीतिक रूप से असुविधाजनक जरूर है, लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से इसका उत्तर भी राजनीतिक तर्क से नहीं, तथ्यों से दिया जाना चाहिए।

इसी तरह सीबीआई जांच की मांग को भी केवल राजनीतिक साजिश कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। अगर सीआईडी जांच निष्पक्ष और विश्वसनीय है तो सरकार को उसकी प्रगति सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अगर किसी पक्ष को उसकी निष्पक्षता पर संदेह है तो वह संदेह किन तथ्यों पर आधारित है, यह भी बताया जाना चाहिए। जांच एजेंसी का नाम नहीं, जांच की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण है।

यहां एक और सवाल है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री के पास है। इसका मतलब यह है कि भर्ती और परीक्षा व्यवस्था की राजनीतिक तथा प्रशासनिक जवाबदेही का एक हिस्सा सीधे सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर आता है। इसलिए सरकार को राजनीतिक आरोपों से ऊपर उठकर यह दिखाना होगा कि वह अपने प्रशासनिक तंत्र की कमियों को स्वीकार करने और उन्हें सुधारने के लिए तैयार है।

विधानसभा का समय से पहले स्थगित होना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सदन वह जगह है जहां सड़क के सवालों का संस्थागत उत्तर मिलना चाहिए। अगर सड़क पर छात्र हैं और सदन में नारे, तो सवाल उठता है कि संवाद कहां हो रहा है?

संसद हो या विधानसभा, लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार चलाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि अल्पमत को सवाल पूछने का अधिकार हो और बहुमत को जवाब देने की जिम्मेदारी। विपक्ष का काम केवल हंगामा करना नहीं और सरकार का काम केवल बहुमत के आधार पर आगे बढ़ जाना नहीं।

झारखंड का युवा इससे ज्यादा चाहता है।

उसे चाहिए कि परीक्षा का कैलेंडर स्पष्ट हो। उसे पता हो कि विज्ञापन कब निकलेगा, परीक्षा कब होगी, परिणाम कब आएगा और नियुक्ति कब होगी। उसे यह भरोसा चाहिए कि प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा, परीक्षा एजेंसी जवाबदेह होगी और किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में दोषी बच नहीं पाएगा।

यह मांग असाधारण नहीं है। यह किसी छात्र की राजनीतिक मांग नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था का न्यूनतम दायित्व है।

आज झारखंड के सामने अवसर भी है। मौजूदा संकट को अगर केवल राजनीतिक टकराव की तरह देखा गया तो अगली परीक्षा के साथ वही संकट लौटेगा। लेकिन अगर इसे भर्ती व्यवस्था के व्यापक पुनर्गठन का अवसर बनाया गया तो यही आंदोलन एक सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।

सरकार चाहे तो स्वतंत्र विशेषज्ञों की समिति बना सकती है। परीक्षा एजेंसियों के चयन की प्रक्रिया सार्वजनिक कर सकती है। भर्ती कैलेंडर को कानूनी या प्रशासनिक रूप से बाध्यकारी बना सकती है। शिकायतों की स्वतंत्र सुनवाई की व्यवस्था कर सकती है। परीक्षा और नियुक्ति के बीच अनावश्यक देरी खत्म कर सकती है। और सबसे जरूरी, छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ नियमित संवाद की परंपरा बना सकती है।

विपक्ष भी चाहे तो केवल सरकार को घेरने के बजाय एक वैकल्पिक भर्ती नीति सामने रख सकता है। इससे उसकी राजनीति भी गंभीर होगी और छात्रों का आंदोलन भी राजनीतिक नारों से बच सकेगा।

क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं कि भाजपा की भीड़ कितनी थी, कांग्रेस का आरोप कितना तीखा था या सरकार ने विपक्ष को कितनी बार कठघरे में खड़ा किया। सवाल यह है कि जिस युवक ने परीक्षा दी, उसे न्याय मिला या नहीं।

लोकतंत्र में सत्ता बदल सकती है, सरकारें आती-जाती हैं, दलों के नारे बदलते हैं। लेकिन यदि भर्ती व्यवस्था पर भरोसा टूट गया तो उसका असर पीढ़ियों तक जाता है। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है; जब योग्य युवा अपनी योग्यता पर नहीं, व्यवस्था की निष्पक्षता पर संदेह करने लगे, तब यह लोकतंत्र की नैतिक समस्या बन जाती है।

झारखंड का छात्र आंदोलन इसी नैतिक सवाल को सामने ला रहा है। उसे दबाने से सवाल नहीं दबेगा। उसे राजनीतिक रंग देने से भी सवाल नहीं बदलेगा। सवाल वहीं रहेगा—क्या राज्य अपने युवाओं को निष्पक्ष अवसर देने की गारंटी दे सकता है?

इसका उत्तर न लाठी में है, न नारे में, न आरोप में और न किसी जांच एजेंसी के नाम में। इसका उत्तर एक ऐसी व्यवस्था में है जो पारदर्शी हो, जवाबदेह हो और जिस पर भरोसा किया जा सके।

युवाओं के सपने किसी दल की राजनीतिक संपत्ति नहीं होते। वे पूरे समाज की पूंजी होते हैं। और जिस दिन राज्य की परीक्षा व्यवस्था उस पूंजी को भरोसा देने में विफल होती है, उस दिन असफल केवल एक परीक्षा नहीं होती—लोकतंत्र की विश्वसनीयता भी थोड़ी-सी असफल हो जाती है।