धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार

हरियाली तीज : 15 अगस्त

कहाँ गए श्रावण के झूले

डा. विनोद बब्बर 

जेठ आषाढ़ की सड़ी गर्मी के बाद राहत प्रदान करने वाली श्रावण की फुहार का विशेष महत्व है। धरती से तन-मन तक, परिवार से परिवेश तक ताजगी की छटा बिखेरते श्रावण मास में हरियाली अमावस को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की पूजा का महत्व है इसीलिए देशभर में शिव भक्त कांवड़िए पवित्र नदियों का जल लेकर भगवान शंकर का अभिषेक करने के लिए अपने गांव घर की ओर लौटते हुए दिखाई देते हैं तो श्रावण शुक्ल तृतीया को हरियाली तीज से श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन तक सर्वत्र उत्साह, उमंग तरंग रहती है।

लोक साहित्य से फिल्मों तक श्रावण (सावन) की महिमा का बखान देखने को मिलता है। एक नहीं, अनेक गीतों में झूले का उल्लेख है तो ऐसे दृश्यों की भी भरमार रही है जिसमें नायिका अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलते हुए गीत गा रही है। वास्तव में प्राचीन काल से परम्परागत रूप से सावन में झूला झूलने को परम्परा रही है क्योंकि हमारे पूर्वज इसे केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं देखते थे। वे जानते थे कि इन दिनों झूला झूलने से हमे अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

बेशक पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने पौष, माघ पर जनवरी, फरवरी को हावी कर दिया है लेकिन ज्येष्ठ की लू को मई-जून नहीं दबा सकी। सब जानते हैं कि लू की चपेटों के बाद आषाढ़ के उमस भरे दिन आते है तब किसी के लिए भी पूरी तरह से संतुष्ट प्रसन्न रहना संभव नहीं होता। ऐसे में सभी को इंतजार होता है सावन की ठण्डी फुहार का जब मौसम मनोहरम हो उठता है। वो सावन की रिमझिम बूंदे ही हैं जो प्यासी धरती पर पड़ते ही अपना असर दिखाने लगती हैं। पहली बूंद पड़ते ही मिट्टी की सोंधी-सोंधी सुगन्ध मन मोह लेती है। तो इस महीने में पड़ने त्यौहारों पर बनने वाले पकवानों की सुगंध विशेष होती है।

प्रकृति जब हर तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो इसे देख मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को श्रावणी तीज या हरितालिका तीज कहते हैं। देश के किसी एक अंचल में नहीं बल्कि पूर्व-पश्चिम, उत्तर- दक्षिण का भेद मिटाते हुए लगभग हर क्षेत्र में तीज त्यौहारों का सिलसिला शुरु हो जाता है। हरियाली तीज के क्या कहने। इसे फिल्मों का प्रभाव कहे या संपन्नता की नुमाइश, फार्म हाउसनुमा लम्बे-चौड़े घरों में अब सारा साल झूला टंगा रहता है लेकिन सावन में झूला झूलने की परम्परा जो सदियों में चली आ रही थी वह छिन्न भिन्न हो रही है, जब हर गांव में गीत गाती लड़कियां महिलाएं झूला झूलते हुए दिखाई देती थी। गाँवों कस्बों न जाने कब से यह लोकगीत लोकप्रिय बना हुआ है – –

कच्चे नीम की निबौरी, सावन जल्दी अईयो रे,

अम्मा दूर मत दीजौ, दादा नहीं बुलावेंगे, 

भाभी दूर मत दीजौ, भइया नहीं बुलावेंगे।

खुद झूलने का जो आनंद है वह तो शब्दातीत है लेकिन किसी उपवन में दूसरों को झूलते देखने से भी मन में उल्लास, उमंग, उत्कंठा होती है। वास्तव में  खुली हवा में झूलना मात्र आनंद की अनुभूति नहीं अपितु एक ऐसा शरीरिक व्यायाम  है जो हमारे फेफड़ों को सावन के मनोरम मौसम के कारण प्रदूषण मुक्त कई शुद्ध वायु देते हुए सुंदर स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है। क्योंकि सावन में वातावरण  अपेक्षाकृत अधिक रमणिक और कम प्रदूषित होता है। वर्षा की निरंतरता के कारण वातावरण में विद्यमान धूल, धूएं के कण, पानी में घुलनशील सभी हानिकारक गैसें भी वर्षा के जल के साथ-साथ धरती पर आ जाती हैं जिससे हवा शुद्ध होकर स्वास्थ्य के लिए उत्तम हो जाती है।

धरती की प्यास बुझते ही सावन में चहुंदिशा हरियाली छा जाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार हरा रंग आंखों पर अनुकूल प्रभाव डालते हुए नेत्र ज्योति बढ़ता है। इसके अतिरिक्त झूलते समय दृश्य कभी समीप और कभी दूर जाते होते है। रोमांच के कारण आंखे कभी बंद होती हैं तो खुलती है। इस क्रम में  नेत्रों का सम्पूर्ण व्यायाम भी हो जाता है। इसके अतिरिक्त झूलने से मन मस्तिष्क में रोमांच वृद्धि होने से तेजी से रक्त संचार होने से मस्तिष्क और अधिक सक्रिय बनता है। तनाव न्यून होता है तथा स्मरण शक्ति बढ़ती है। इसके साथ ही झूलते समय श्वांस अधिक भरा, रोका एवं वेग से छोड़ा जाता है। इससे  स्वतः प्राणायाम हो जाता है।

एक विशेष बात जो झूले के साथ जुड़ी हुई है वह है सुदृढ़ पकड़ का होना। जब खड़े होकर झूलने से अथवा कभी उठकर तो बैठकर झूलने जैसी क्रियाओं से एक ओर हाथ, हथेलियों और उंगलियों की शक्ति बढ़ती है।  पीठ-रीढ़ सहित पूरे शरीर के अंग-अंग का व्यायाम होता है। 

आश्चर्य कि झूलने के इतने फायदे होते हुए भी परंपरागत झूले गायब से हो रहे हैं परंतु अब मेले सर्कस आदि में मशीनी  विशालकाय झूले दिखाई देते हैं। शहर तो छोड़िए गांवों तक में अब पेड़ो पर परंपरागत रस्सी वाले झूले दिखाई नहीं देते। इस बदलते परिवेश में ग्रामीण अंचलों में सुनाई देने वाले सदाबहार लोकगीतों के प्रवाह का बाधित होना जैसे संस्कृति के स्रोत का सूख जाना है। इस क्षति को आज बेशक न समझा जा रहा हो लेकिन भविष्य इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाएगा। यदि हम इसके कारणो का जानना चाहे तो बहुत साफ दिखाई देता है कि यह सांस्कृतिक पर्व कुछ पाश्चात्य सभ्यता भी भेंट चढ़ गया तो रही सही कसर पेड़ों के काटने से पूरी हो गई। आज इंटरनेट के माध्यम से सोशल मीडिया तो दूसरी ओर मॉल संस्कृति में नकली मेले लगाकर इन पर्वों की औपचारिकता को पूरा किया जा रहा है। परिवारों का विखंडन यानि अपनी से जड़ों से कटने और व्यस्त जिंदगी को जिम्मेवार ठहराये भी तो कैसे आखिर हमने ही तो एकल परिवार के काल्पनिक लाभों की गणना करते हुए संयुक्त परिवार के वास्तविक बड़े-बड़े लाभों को अनदेखा किया है। 

एक वो भी जमाना था जब हम अपने बचपन में कागज की नाव बना कर खेलते थे। आम, नीम, शहतूत के पेड़ों पर झूले झूलते थे तो नीचे उतर कर घर में बने पकवानों पर टूट पड़ते थे। लेकिन आज??? आज तो बाजारवाद का बोलबाला है। घेवर भी खरीदना हो तो दाम सुनकर डर लगता है। तीज मेले तो हैं पर झूले को छूने तक की भारी भरकम कीमत चुकानी पड़ती है। हाँ, ब्यूटी पार्लरों, मेंहदी वालों के पास जरूर भीड़भाड़ देखने को मिल सकती है।