More
    Homeविविधारेडियो, श्रोता और उद्घोषक  

    रेडियो, श्रोता और उद्घोषक  

    -रेडियो श्रोता दिवस (20 अगस्त) पर विशेष लेख:-

    -अशोक बजाज-

    Radio.

    जनसंचार के माध्यमों में रेडियो अति प्राचीन माध्यम है, रेडियो और उसके श्रोताओं का जो आपसी सम्बन्ध है, वह संचार के अन्य माध्यमों में देखने को नहीं मिलता. वैसे तो रेडियो के असंख्य श्रोता हैं, परन्तु उनमें से अनेक श्रोता ऐसे भी है जो ना केवल रेडियो का कार्यक्रम नियमित रूप से सुनते हैं, बल्कि सुन कर अपनी प्रतिक्रिया एवं फरमाईस भेजना जिनका नित्य का काम है. श्रोता और उद्घोषक भले ही एक दूसरे की शक्ल से परिचित ना हों लेकिन दोनों में बड़ा आत्मीय संबंध होता है. श्रोताओं को जितनी बेसब्री से कार्यक्रम का इंतजार होता है एनाउन्सरों को उतनी ही बेसब्री से श्रोताओं के पत्रों का इंतजार होता है. बहरहाल ऐसे श्रोताओं के देश भर असंख्य संगठन है. छत्तीसगढ़ में भी ऐसे नियमित श्रोताओं एवं श्रोता संगठनों की भरमार है. इन्ही श्रोताओं ने सन 2008 में श्रोता सम्मलेन में यह तय किया कि साल में एक दिन यानी 20 अगस्त को श्रोता दिवस मनाया जायेगा. तब से हर साल 20 अगस्त को श्रोता दिवस मनाने का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है. छत्तीसगढ़ से प्रारंभ हुई इस परंपरा का असर यह हुआ कि अब देश के अनेक हिस्सों में श्रोता दिवस मनाया जाने लगा है. माना जाता है कि 20 अगस्त 1921 को भारत में रेडियो का पहला प्रसारण हुआ था, टाइम्स ऑफ इण्डिया के रिकार्ड के अनुसार  20 अगस्त 1921 को शौकिया रेडियो ऑपरेटरों ने कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और लाहौर में स्वतंत्रता आन्दोलन के समय अवैधानिक रूप से प्रसारण शुरू किया तथा इसे संचार का माध्यम बनाया. रेडियो श्रोताओ ने इसी दिन की याद में 20 अगस्त का चयन रेडियो श्रोता दिवस के रूप में किया. विधिवत रूप से भी भारत में रेडियो का पहला प्रसारण 87 वर्ष पूर्व 23 जुलाई 1927 को  मुंबई से हुआ था.

    संचार क्रांति के आधुनिक दौर में लोग शान से कहते हैं कि  “दुनिया मेरी मुट्ठी में”. क्योंकि उनके पास अब  टेलीविजन, टेलीफोन, मोबाईल, कंप्यूटर और इंटरनेट है. पल पल की खबरों से हर व्यक्ति अपडेट रहता है. मनोरंजन का खजाना हर पल उसके साथ रहता है, लेकिन संचार के क्षेत्र में यह विकास एकाएक नहीं हुआ है बल्कि शनै शनै हम इस दौर में पहुंचे हैं . हालांकि  दुनिया में रेडियो के प्रसारण का इतिहास काफी पुराना नहीं है, सन 1900 में मारकोनी ने इंग्लैण्ड से अमरीका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश की शुरूआत की. उसके बाद कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेंसडेन ने 24 दिसम्बर 1906 को रेडियो प्रसारण की शुरूआत की, उन्होंने जब वायलिन बजाया तो अटलांटिक महासागर में विचरण कर रहे जहाजों के रेडियो आपरेटरों ने अपने-अपने रेडियो सेट से सुना. उस समय वायलिन का धुन भी सैकड़ों किलोमीटर दूर चल रहे जल यात्रियों के लिए आश्चर्यचकित करने वाला था. संचार युग में प्रवेश का यह प्रथम पड़ाव था. प्रसिद्ध साहित्यकार मधुकर लेले ने अपनी पुस्तक भारत में जनसंचार और प्रसारण मीडिया” में लिखा है कि “भारत जैसे विशाल और पारम्परिक सभ्यता के देश में बीसवीं सदी के आरंभ में जब आधुनिक विकास का दौर शुरू हुआ तो नये युग की चेतना के उन्मेष को देश के विशाल जनसमूह में फैलना एक गंभीर चुनौती थी. ऐसे समय में जनसंचार के प्रभावी माध्यम के रूप में रेडियो ने भारत में प्रवेश किया. कालांतर में टेलीविजन भी उससे जुड़ गए. दोनों माध्यमों ने हमारे देश में अब तक अपनी यात्रा में कई मंजिलें पार की है. आकाशवाणी और दूरदर्शन ने भारत में प्रसारण मीडिया के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. भारत जैसे भाषा-संस्कृति-बहुल और विविधता-भरे देश में राष्ट्रीय प्रसारक की भूमिका और जिम्मेदारियां बड़ी चुनौती भरी रही हैं.”

    बहरहाल संचार क्रांति के इस युग में  सूचना और मनोरंजन के लिए श्रोताओं का बहुत बड़ा तबका आज भी रेडियो के साथ जुड़ हुआ है. श्रोताओं ने ही जनसंचार के इस प्राचीन माध्यम को जीवंत बना के रखा है. बी.बी.सी. की हिंदी सर्विस आज भी चालू है तो केवल श्रोताओं की सक्रियता की वजह से क्योंकि वर्ष 2011 में इसे बंद करने की तैयारी चल रही थी, आर्थिक संकट की वजह से बीबीसी ट्रस्ट ने 5 भाषाओँ की रेडियो सेवा बंद कर दी थी तथा हिन्दी सेवा भी बंद करने की तैयारी कर ली थी. इस खबर से चिंतित दुनिया भर के रेडियो श्रोताओं ने हिंदी सेवा बंद करने का विरोध किया था तब जाकर ब्रिटिश सरकार ने अगले तीन सालों में 22 लाख पाउंड प्रति वर्ष देने की घोषणा कर इसे आर्थिक संकट से उबारा था. श्रीलंका ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन यानी रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा भी धक्के खा खा कर चल रही है आर्थिक संकट के कारण कब बंद हो जाये कोई भरोसा नहीं. इनकी लाईब्रेरी में अति प्राचीन हिन्दी फिल्मों , नाटकों एवं अन्य कार्यक्रमों का संग्रह है. जो भारत में किसी के पास नहीं है , इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए श्रोता सक्रीय है. श्रोता चाहते है कि रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा चालू रखा जाय अथवा उसकी लाईब्रेरी को भारत सरकार खरीद कर देश ले आये ताकि धरोहर की रक्षा हो सके.

    अशोक बजाज
    अशोक बजाज
    श्री अशोक बजाज उम्र 54 वर्ष , रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से एम.ए. (अर्थशास्त्र) की डिग्री। 1 अप्रेल 2005 से मार्च 2010 तक जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद का निर्वहन। सहकारी संस्थाओं एंव संगठनात्मक कार्यो का लम्बा अनुभव। फोटोग्राफी, पत्रकारिता एंव लेखन के कार्यो में रूचि। पहला लेख सन् 1981 में “धान का समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत” शीर्षक से दैनिक युगधर्म रायपुर से प्रकाशित । वर्तमान पता-सिविल लाईन रायपुर ( छ. ग.)। ई-मेल - ashokbajaj5969@yahoo.com, ashokbajaj99.blogspot.com

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,739 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read