गुजरात से निखरी राहुल गांधी की तस्वीर और गहलोत निकले चाणक्य

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निरंजन परिहार-

गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों को एक तरफ रख दीजिए। वे जो हैं, सो हैं। कांग्रेस, कांग्रेसियों और राहुल गांधी के शुभचिंतकों के लिए खुशी की बात यह है कि इस चुनाव में राहुल एक तपे हुए, मंजे हुए और धारदार नेता बनकर देशभर में ऊभरे हैं। इससे भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि राहुल गांधी उस गुजरात से नेता बनकर निकले हैं, जहां बीजेपी के दो सबसे बड़े नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह उनके सबसे मुख्य विरोधी के रूप में प्रमुख उपस्थिति में थे। गुजरात में पूरे चुनाव के दौरान राहुल गांधी बिल्कुल निखरे निखरे से, आक्रामक तेवरवाले पूरे देश के नेता से लगे। इस चुनाव में रणनीतिक सफलता के बाद उन्हें देश में सही मायने में राजनेता के रूप में स्वीकारा जाने लगा है।

 

बीजेपी, संघ परिवार, विश्व हिंदु परिषद और हिंदुवादी संगठनों के लिए यह सबसे बड़ा आश्चर्य है कि जो गुजरात उनके लिए बरसों बरसों से हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर एक स्थापित राज्य रहा हो, अशोक गहलोत ने उसी प्रदेश का राहुल गांधी को नेता के रूप में स्थापित करने की प्रयोगशाला के रूप में कैसे उपयोग कर लिया। और बीजेपी को इस बात पर भी बहुत आश्चर्य है कि जिस गुजरात को बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने विकास के मॉडल के रूप में दुनिया भर में स्थापित किया, उसी गुजरात को आखिर कैसे इतनी सहजता के साथ से अशोक गहलोत ने राहुल गांधी के राजनीतिक विकास के रास्ते के रूप में उपयोग करके उन्हें देश के नेता के रूप में स्थापित कर दिया। गहलोत दिल्ली के नजरिये से देश को देखने के आदी रहे हैं, सो उन्हें समझ में आ रहा था कि बीजेपी के चुनाव लड़ने की ताकत का कांग्रेस के परंपरागत तौर तरीकों से मुकाबला आसान नहीं होगा। बीजेपी में सेंट्रल टीम हर जगह फ्रंट कमान पर रहती है, जबकि कांग्रेस स्थानीय क्षत्रपों के भरोसे हमेशा चुनावी मैदान में उतरती रही है। सो, गहलोत ने बीजेपी के चुनाव लड़ने के तरीकों की तर्ज पर ही कांग्रेस की बिसात बिछाई, और प्रदेश के नेताओं को उनके काम तक सीमित रखकर सारे फैसले लेने से लेकर हर मोर्चा संभालने तक राहुल गांधी और खुद को ही केंद्र में रखा। गहलोत जानते थे कि गुजरात की जनता के दिलों में तो विपक्ष है, लेकिन बिखराव की वजह से कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में ज्यादा उभर नहीं पाई। सो, गहलोत ने बीजेपी को जातिगत राजनीति कठिनाई में फांसने के लिए अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी जैसे जातीय नेताओं को सबसे पहले साधते हुए विपक्ष को मजबूत किया। बीजेपी गुजरात में समाज पर मंदिरों की मुहर लगाकर लगातार चुनावों में कांग्रेस को हाशिए पर खड़ा करती रही है। तो, इस पैतरे की काट में गहलोत ने भी एक रणनीति के तहत 26 मंदिरों के दर्शन करवाकर राहुल गांधी के प्रति जनता के दिलों में जगह बनाई। अल्पेश, हार्दिक और जिग्नेश जैसे नेताओं से राहुल गांधी को मिलाने के वक्त से लेकर बातचीत के मुद्दों, और सीटों से लेकर सवालों के जवाब तक सब कुछ पर अपना ही कब्जा रखा। यही कारण था कि मोदी अपने ही गुजरात की जनता को जातिवाद के झांसे में ना आने का आगाह करते दिखे।

 

गुजरात के इस पूरे चुनाव में राहुल गांधी की कोशिशों को जरा गहरे से देखेंगे, तो हर कोशिश में गहलोत के चरित्र का अक्स ही समाने रहा। राहुल की नवसर्जन यात्रा की कसी हुई प्लानिंग, लोगों से  मिलने के मुद्दे और भाषण के विषय, मंदिरों में मत्था टेकने की कथा, पाटीदारों को पटाने की पटकथा और सियासी संवाद तक सारे गहलोत की झोली से ही जादू की तरह निकले। किसी के भी विरोध में कुछ भी न बोलने की रणनीति और बेहद सादगी के साथ अपनी बात कह देने के राहुल के गरिमामयी तेवर व गांधी और पटेल की परंपरा का वाहक होने का प्रदर्शन भी। हर तस्वीर में राहुल थे, मगर अंदाज गहलोत के थे। गुजरात में कांग्रेस को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की तस्वीर से बाहर निकालने की कवायद में भी गहलोत सफल रहे। गुजरात के होकर भी अहमद पटेल कहीं चुनावी तस्वीर में भी नहीं दिखे। पूरे चुनाव में किसी के भी मुंह से गोधरा का नाम तक नहीं निकला। यह पहला चुनाव था, जिसमें गुजरात में कांग्रेस चुनाव को चुनाव की तरह लड़ती दिखी।

 

गुजरात के प्रभारी होने के नाते गहलोत जानते थे कि पराक्रमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही गुजरात में सेंट्र टीम के मिखिया की भूमिका में रहेंगे। और उन्हें यह भी समझ थी कि जंग जितने बड़े आदमी से होती है, उसे लड़नेवाले को भी उतना ही बड़ा कद हासिल होता है। सो, गहलोत ने प्रधानमंत्री के सामने राहुल गांधी को बहुत मजबूती के साथ चुनौती देता हुआ खडा करके बेहतरीन ढंग से प्रतिष्ठित किया। गहलोत गुजरात में ही डेरा डाले रहे और ऐसी कसी हुई रणनीतिक बिसात बिछाई की बीजेपी के रणनीतिकारों को पल पल प्लान बदलने को मजबूर होना पड़ा। पूरे चुनाव के दौरान गुजरात में कांग्रेस कहीं भी, कोई गलती करती नहीं दिखी। बीजेपी को उसी के गुजरात की सियासी रणभूमि में राहुल गांधी हर पल जबरदस्त टक्कर देते दिखे। राहुल की सक्रियता ने गुजरात कांग्रेस में नई चेतना जगाई, तो देश भर के उदास कांग्रेसी भी उत्साह और जोश से लबरेज हो गए।

 

दरअसल, अशोक गहलोत शुरू से ही इस बात से बहुत वाकिफ थे कि गुजरात में कांग्रेस को जिता पाना भले ही कोई आसान खेल नहीं हो, लेकिन इस चुनाव को वे बहुत सहजता के साथ राहुल गांधी की राजनीतिक प्रतिष्ठा की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के गुजरात में राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठित करने का मतलब भी गहलोत जानते थे और इसके मायने भी जानते थे कि हार जीत से ज्यादा बड़ी बात यह है कि चुनाव के बाद राहुल गांधी को देश की राजनीति में जगह क्या मिलनी है। राहुल गांधी अब वास्तव में मजबूत नेता हैं और खुशी मनाइये कि गहलोत भी उसी गुजरात से अपनी पार्टी में चाणक्य के रूप में निखरे हैं, जहां से बीजेपी के चाणक्य के रूप में अमित शाह का व्यक्तित्व उभरा है। वैसे, गुजरात के इस चुनाव में यह भी साबित हो गया कि अपने भरोसेमंद लोगों की देश भर के हर प्रदेश में जितनी बड़ी फौज कांग्रेस के इस चाणक्य के पास है, उतनी किसी और के पास नहीं। इसी कारण, स्वभाव से सौम्य, व्यवहार से विनम्र और चरित्र से निष्ठावान होने के साथ साथ सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी गहलोत इंदिरा गांधी के साथ मंत्री रहे, राजीव गांधी के साथ भी मंत्री रहे और अब तीसरी पीढ़ी में राहुल गांधी के साथ हैं। वे भले ही दो बार मुख्यमंत्री, दो बार कांग्रेस महासचिव, तीन बार केंद्र में मंत्री, तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, चार बार विधायक और पांच बार सांसद रहने के अलावा भी बहुत कुछ रह लिये। लेकिन पार्टी में असली मुकाम तो अभी बाकी है। देखते रहिए।

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