Rahul Gandhi

मां-बेटा पार्टी और ये उम्मीदवार

यदि मीरा कुमार और गोपाल गांधी जैसे श्रेष्ठ उम्मीदवार उक्त पदों के लिए खोजे जा सकते हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए क्यों नहीं खोजे जा सकते हैं ? मुझे पूरा विश्वास है कि मीराजी और गोपालजी कांग्रेस पार्टी को मां-बेटे की तुलना में काफी अच्छी चला सकते हैं। 

कहीं अपने होने का अर्थ ही न खो दें राहुल गांधी !

राहुल गांधी शुरू से ही राजनीति को लेकर दुविधा में दिखते रहे हैं। वे सार्वजनिक रूप से यहां तक कह चुके हैं कि सत्ता तो जहर है। लेकिन फिर भी मनमोहन सिंह की पहली सरकार में ही मंत्री बन गए होते, तो देश चलाना सीख जाते और सत्ता का जहर पीना भी। कांग्रेस ने अगली बार फिर जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, तब भी उनको न बनाकर, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तो कोई कांग्रेस का क्या बिगाड़ लेता ?

राहुल गांधी पर अपने भाषणों में बहुत क्रूर हैं मोदी !

देखा जाए तो, मोदी को इस क्रूर अंदाज में लाने का श्रेय भी कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी को ही जाता है, जिन्होंने मोदी को ‘लाशों का सौदागर’ से लेकर ‘शहीदों के खून का दलाल’… और न जाने क्या क्या कहा। फिर वैसे देखा जाए, तो लोकतंत्र में अपनी ताकत को ज्यादा लंबे वक्त तक जमाए रखने के लिए कुछ हद तक क्रूर और अत्यंत आक्रामक होना भी आज मोदी की सबसे पहली जरूरत है।

शायद पार्टी ही कन्फ्यूज है राहुल के भविष्य पर

पहली बार नेता और मुख्यमंत्री बने केजरीवाल की मति पर पड़े भाटे तो समझ में आते हैं किन्तु राजीव गांधी जैसे दूरदर्शी के पुत्र होकर भी ऐसी बचकानी बातें करना अनेक बातों की तरफ़ स्पष्ट इशारा है।पार्टी में पहली पंक्ति के जिम्मेदारों कॊ इस गम्भीर्य कॊ समझने की नितांत आवश्यकता है कि क्या वाकई राहुल में अब भी अच्छे संगठक के गुण हैं..। कहने में कोई गुरेज नही कि नसीब और कर्म से इन्हें भविष्य में जो भी मिले,पर पार्टी कॊ अभी तो नुकसान सामने ही है..