व्यवस्था को बेनक़ाब करती वर्षा ऋतु

 निर्मल रानी
वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व ही मौसम विभाग द्वारा यह बार-बार बताया जा रहा था कि इस वर्ष मानसून जमकर बरसेगा। हमारे देश के किसानों के लिए खेती-बाड़ी के समय पर होने वाली बरसात निश्चित रूप से ईश्वर की सौगात या ख़ुदा की रहमत का रूप है। शहरी क्षेत्रों में भी गर्मी से त्राहि-त्राहि कर रहे लोग बेचैनी से बारिश का इंतज़ार करते हैं। परंतु जब सामान्य या उससे थोड़ी अधिक बारिश होती है उसी समय शहरी क्षेत्रों में बावजूद इसके कि तापमान के गिरने से जनता राहत ज़रूर महसूस करती है परंतु सडक़ों,गलियों व घरों में घुसने वाला अनियंत्रित बरसाती पानी उनकी सारी ख़ुशियों पर पानी फेर देता है। आख़िर क्या वजह है कि एक ओर तो हम 21वीं सदी के भारत की बात करते हैं और विश्व के विकसित देशों की पंक्ति में खड़े होने का दावा करते हैं, स्मार्ट सिटी में रहने और बुलेट ट्रेन पर यात्रा करने जैसे सुहाने सपने देखते रहते हैं वहीं दूसरी ओर हमारे घरों में सीवरेज का गंदा पानी घुस रहा होता है,पीने के पानी की जगह उसी पाईप लाईन के माध्यम से गंदा प्रदूषित व बदबूदार जल पीने व दूसरे इस्तेमाल के लिए आपूर्ति किया जाता है। क्यों आज देश के कई रेल ट्रैक व राष्ट्रीय राजमार्ग यहां तक कि मात्र दो माह पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित किए गए राजमार्ग स्विमिंग पूल जैसे दिखाई दे रहे हैं? देश के जाने-माने भवन निर्माताओं द्वारा बनाई गई गगनचुंबी इमारतों पर धंसने का ख़तरा क्यों मंडरा रहा है? और पचास-साठ लाख रुपये तक खर्च कर ख़रीदे गए फ़्लैट लोगों से खाली करवाने जैसी नौबत आिखर क्यों आन पड़ी है?
एनसीआर में बरसात ने इस वर्ष जो तांडव दिखाया है निश्चित रूप से इसने सरकार,प्रशासन तथा व्यवस्था को अपंग बनाकर रख दिया है। गाजि़याबाद,नोएडा,दिल्ली के आसपास की कई इमारतें बारिश की वजह से ढह गईं और कई पर गिरने का ख़तरा मंडरा रहा है। पानी की उचित निकासी न हो पाने की वजह से जनता को इस प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिन लोगों के फ़्लैट  ख़तरे में हैं वे अपना लाखों रुपया इसी बरसात के पानी में डूबा हुआ समझने को मजबूर हैं। शासन व प्रशासन के निकम्मेपन की इंतेहा तो यह है कि इन दिनों हरियाणा सहित कई दूसरे राज्यों में भी नालियों,सडक़ों व नालों का निर्माण कार्य जारी है। जबकि शासन को चाहिए कि इस प्रकार के निर्माण संबंधी कार्यों को गर्मी व सर्दी के मौसम में तेज़ी से पूरा करने की कोशिश करे अन्यथा बारिश के दिनों में नाले व सडक़ें खोदने व निर्माण करने में किस कद्र परेशानी होती है जनता से लेकर निर्माण कार्य में लगे लोग तक कितना परेशान होते हैं, सरकारी धन का कितना दुरुपयोग होता है यह सब बातें शासन के लोग भी बख़ूबी समझते हैं तथा जनता भी सब जानती है। अफ़सोस की बात तो यह है कि सरकार के अनियोजित कार्यों की वजह से जहां एक ओर जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर इन्हीं बेतरतीब कामों का श्रेय लेने की होड़ भी नेताओं में मची रहती है।
उदाहरण के तौर पर हरियाणा के कई शहरों में सरकार द्वारा जनता को जागरूक करने के उद्देश्य से जगह-जगह इस आशय के इश्तिहार लगवाए गए हैं कि जनता अपने घरों के आसपास पानी जमा न होने दे क्योंकि इससे डेंगु,चिकनगुनिया व मलेरिया जैसी बीमारियों के वाहक मच्छर पैदा होते हैं। अंबाला शहर में भी इसी आशय के सैकड़ों बोर्ड स्थानीय विधायक के चित्र के साथ सुशोभित हो रहे हैं। परंतु जनता से गड्ढे भरने व पानी जमा न होने देने की अपील करने वाली इसी सरकार द्वारा इसी अंबाला शहर के सिटी स्टेशन के निकट फाटक के समीप भूमिगत मार्ग के निर्माण हेतु जो गड्ढा खोदा गया था और सडक़ बिछाने का काम भी शुरु हो गया था वह राज्य सरकार व रेलवे विभाग के मध्य तालमेल न होने की वजह से रुक गया। परिणामस्वरूप राज्य सरकार द्वारा खोदा गया विशाल गड्ढा कई महीने तक तालाब के रूप में बना पड़ा रहा। जनता द्वारा प्रशासन से बार-बार गुहार लगाने के बाद गड्ढे की दोनों ओर की सडक़ों पर कंकर-पत्थर डाल दिया गया परंतु बीच में बनाय गया विशाल गड्ढा अभी भी जस का तस बरक़रार है। यह गड्ढा न केवल किसी हादसे को हर समय दावत देता रहता है बल्कि सरकार जिस डेंगू,मलेरिया व चिकनगुनिया से आम जनता को बचने के लिए करोड़ों रुपये का इश्तिहार लगवाती है वही सरकार स्वयं इन मच्छरों के पालन-पोषण के लिए विशाल गड्ढा उपलब्ध करवा रही है। यह विशाल गड्ढा आसपास के लोगों के लिए विशाल कूड़ेदान भी बन चुका है। सवाल यह है कि क्या डेंगू,मलेरिया व चिकनगुनिया जैसे जानलेवा मच्छर केवल जनता द्वारा खोदे गए गड्ढों में ही पलते व फलते हैं सरकार द्वारा उसकी लापरवाही से खोदे जाने वाले गड्ढों में नहीं?
इसके अलावा सरकार-प्रशासन व ठेकेदारों के मध्य बना नेटवर्क बड़े ही नियोजित तरीक़े से शहरों में सडक़ों व गलियों का निर्माण करते समय लगातार सडक़ों व गलियों को ऊंचा करता रहता है। गली व सडक़ की बढ़ती ऊंचाई का कारण केवल यही है कि  सरकार ठेकेदारों को उसकी मोटाई,लंबाई व चौड़ाई के अनुसार भुगतान करती है। परंतु बार-बार गलियों व सडक़ों के ऊंचे होने के परिणामस्वरूप नगरवासियों के घरों में पानी भर जाता है। सोचने का विषय है कि जो व्यक्ति अपने पूरे जीवन की कमाई जुटाकर अपना मकान तैयार करवाता हो और कुछ ही वर्षों बाद उसके नवनिर्मित घर में प्रशासन की भ्रष्ट नीति के चलते बरसाती व गंदा पानी घुस जाए इससे अधिक असहज स्थिति किसी भी व्यक्ति के लिए और क्या हो सकती है? और भ्रष्टाचार का भी इससे बड़ा उदाहरण और क्या है कि केवल भ्रष्ट अधिकारियों व नेताओं का पेट भरने के चक्कर में गलियों व सडक़ों को बार-बार ऊंचा किया जाता है? इस सिलसिले को भी यथाशीघ्र रुकना चाहिए अन्यथा डेंगू,चिकगुनिया से भी अधिक भयंकर बीमारी तब भी फैल सकती है जबकि लोगों के घरों में नाली व सीवरेज का ओवरफ्लो होने वाला पानी प्रवेश कर जाता है। और इन्हीं दिनों में प्राय: सरकारी जलापूर्ति के साथ गंदे प्रदूषित व बदबूदार पानी की आपूर्ति भी होती रहती है। ज़ाहिर है यह भी भयंकर महामारी को न्यौता देती है।
देश में भ्रष्टाचार,लीपापोती तथा झूठी लोकप्रियता अर्जित करने जैसी विषमताएं इतनी गहरी हो चुकी हैं कि आम आदमी असहाय बनकर देखते रहने के सिवा और कुछ भी नहीं कर सकता। सरकार या प्रशासन ऐसे सडक़ निर्माताओं के विरुद्ध कोई कार्रवाई भी कर सके? इस प्रकार के दृश्य व्यवस्था को तो बेनक़ाब करते ही हैं साथ ही इससे जनता के पैसों की पूरी तरह से बरबादी भी होती है। ऐसे हालात जनता की ख़ून-पसीने की कमाई के बंदरबांट का ही नतीजा हैं

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