राजमाता विजयाराजे सिंधिया : भारत की एक अनुकरणीय क्षत्राणी 

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जयन्ती विशेष : राजमाता विजयाराजे सिंधिया

(प्रहलाद भारती )

ग्वालियर के  जयविलास पैलेस को लोग दुनियाभर से देखने आते हैं।यह शाही महल दुनिया के सबसे महंगे और आकर्षक महलों में एक है लेकिन इस महल की महारानी राजमाता विजयाराजे सिंधिया को इसके कंगूरे,परकोटा,ऐतिहासिक झूमर,डायनिंग टेविल पर चलती खाने की ट्रेन ,घोड़े बग्गी,और शाही वैभव के दूसरे दस्तूर कतई प्रभावित नही करते थे।ऐसा लगता था कि राजमाता सिंधिया ने खुद को सांसारिक सुख सुविधाओं से काफी उपर उठा लिया था।

‌राजमाता सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की संस्थापक सदस्य थी उन्होंने मध्यप्रदेश में संघ औऱ बीजेपी के विस्तार के लिये अपने शाही प्रभाव और ताकत का खुलकर उपयोग किया।हमारे मौजूदा लोकतंत्र में उनके जैसे व्यक्तित्व बिरले ही है जिन्होंने सत्ता पद की अभिलाषा को कभी भी खुद की मौलिकता पर हावी नही होने दिया।आज राजमाता विजयाराजे सिंधिया की राजनीतिक विरासत भाजपा में उनके उत्तराधिकारियों द्वारा सहेजी हुई है।सवाल  यह है कि भारतीय राजनीति में राजमाता का वैशिष्ट्य क्या?क्यों केंद्र सरकार ने बीते साल उनकी जन्मशताब्दी बर्ष को सरकारी और पार्टी स्तर पर मनाने का निर्णय लिया था।इसका जबाब बीजेपी में अटल ,आडवाणी जोशी,ठाकरे,प्यारेलाल, युग के नेता बहुत ही प्रमाणिक तरीके से दे सकते है।इस पीढी के नेताओं ने विजयाराजे सिंधिया को जनसंघ,बीजेपी औऱ संघ के मामलों में अपना सब कुछ दांव पर लगाते हुए देखा है।इसलिये संभव है आज की पीढ़ी राजमाता को सिर्फ इतना भर जानती हो कि वे वसुन्धरा राजे ,स्व.माधवराव सिंधिया,यशोधरा राजे की मां  औऱ केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी है।लेकिन राजमाता के व्यक्तित्व का कैनवास  इससे भी बहुत बड़ा था।वे भारत मे जेन्डर केस स्टडी भी है।सच्चाई यह है कि  राजमाता सिंधिया को उनके लोकतांत्रिक अवदान के अनुपात में अधिमान्यता देने के मामले में हम पिछड़ गए हैं। मंचों पर राजमाता के चित्र पर  रस्मी माल्यार्पण या जन्मदिन पर स्मरण से आगे उनके विचार प्रवाह और कृतित्व की कर्णीयता को समाज में सुस्थापित करने की भी आवश्यकता है। उन्हें त्याग तपस्या की देवी की तरह पूजने के विचारशून्य उपक्रम से  आगे  सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में कृपणता निर्मित परिस्थितियों से निबटने में एक लोकतांत्रिक हथियार के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता अधिक है। 

‌क्या राजमाता सिंधिया सिर्फ त्याग की और कतिपय वात्सल्य की मूर्ति थी? जैसा उनके कुछ अनुयायियों द्वारा दावा किया जाता है।हकीकत यह है कि राजमाता को लेकर यह उनका सतही मूल्यांकन है त्याग तो उन्होंने किया यह तथ्य है। वह चाहती तो 1967 में ही मप्र की मुख्यमंत्री बन सकती थीं, ,1977,1989 में फिर उनके पास यही अवसर विनय की मुद्रा लिए खड़े थे।1996,1998,1999,में वह भी राष्ट्रपति भवन में मंत्री पद की शपथ ले सकती थी।वह खुद भैरोसिंह शेखावत की जगह उपराष्ट्रपति हो सकती थी।बीजेपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष तो जब चाहती तब बन सकती थी।लेकिन विजयाराजे सिंधिया ने इन सभी अवसरों दूसरों के लिये छोड़ दिया।यह उनके राजनीतिक त्याग की मिसाल ही है।वाकई आज की पीढ़ी में यह त्यागभाव असंभव है। इसलिये इस त्याग भाव को केवल पूजने से काम नही चलेगा आवश्यकता आज इस बात की है कि उनके इस त्याग भाव को समाज के सामान्य राजनीतिक जनजीवन में स्थापित कैसे किया जाए ?इसे सोशल ट्रांसफॉर्मेशन की केस स्टडी बनाकर कैसे आगे बढ़ाया जाए?क्योंकि इसी भावना के लोप ने आज की सियासत को गंदा कर दिया है। 

‌सवाल यह है कि राजमाता को क्या सिर्फ बीजेपी की एक दिग्गज नेत्री के रूप याद किया जाना चाहिये?असल में राजमाता सिंधिया जम्हूरियत मे लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना।लोकशाही और राजशाही के बीच अद्भुत समन्यव।शाही वैभव के बावजूद सत्ता से सदैव दूरी बनाने।पितृसत्ता को सफलतापूर्वक जमीदोज करने वाली शख्सियत के रूप में याद की जाना चाहिये।राजमाता सिर्फ दूसरे राजाओं की तरह अपनी रियासतों और सुख सविधाओं को बचाने के लिये परकोटे से बाहर नही आई थी उनका अपना सामाजिक राजनीतिक चिंतन था इसलिये वे राजनीति में नेहरू की पहल पर कांग्रेस में शामिल तो हुई लेकिन सत्ता की हनक के आगे जब राजमाता ने आम आदमी खासकर अपनी पुरानी रियासत में (छात्र आंदोलन) दमनभाव को देखा तो भारत की राजनीति के सबसे मजबूत मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा से भिड़ने में लेश मात्र संकोच नही किया। क्या आज के नेता यह साहस कर सकते है?भारत के संसदीय इतिहास में राजमाता प्रेरित ऑपरेशन डीपी  मिश्रा सियासत में नारी शक्ति की स्वतंत्र ताकत का ही प्रदर्शन था।सियासत में सयंम और शालीनता के गायब हो चुके अपरिहार्य तत्व की तालीम आज के सियासी लोग उनसे हासिल कर सकते है।डीपी मिश्रा की सर्वशक्तिमान सरकार को गिराने के बाबजूद उन्होंने अहंकार को अपने सियासी शिष्टाचार में कभी फटकने भी नही दिया।मृत्यु पर्यंत उनका सम्मान भारत के सभी राजनीतिक दलों में अनुकरणीय हद तक बना रहा।इंदिरा गांधी की सत्ता को भी उन्होंने खुलेआम चुनोती दी।लेकिन उनका राजनीतिक विरोध सदैव नीतिगत रहा।डीपी मिश्रा ने पचमढ़ी के अधिवेशन में उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने इसका बदला पूरे संसदीय तरीके से लिया।

असल मे राजमाता का मूल्यांकन सिर्फ राजनीतिक नजरिये से नही किया जा सकता है। वे शाही परकोटे में जनता की महारानी थी जिनकी ताकत रियासतों की रवायतों से नही उनके सतत सम्पर्क और नए भारत मे शाही लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से विश्वास हासिल करने के भरोसे में टिकी थी।यही कारण है कि वे भारत मे रियासतों के लोकतन्त्रीकरण की प्रतीक रही है।यही वजह है कि उनके परिवार का संसदीय दखल आज 70 साल बाद भी बरकरार है।  आज की पीढ़ी राजमाता को उनकी सामाजिकता जिसे आरएसएस के विभिन्न स्कूलों को दी गई मदद।उनकी राजनीतिक ताकत जिसे आज इस अर्थ में समझने की जरूरत है कि पद,प्रतिष्ठा और धन ही इस कार्य का अंतिम ध्येय नही है।उनका सांस्क्रतिक पक्ष जो खुलकर अपनी धार्मिक मान्यताओं और अस्मिता पर गर्व करना सिखाता है।उनका उदारमना व्यक्तित्व जो समाज के सबसे कमजोर और काबिल लोगों को अपनी प्रतिभा प्रकटीकरण का अवसर उपलब्ध कराता था।उमा भारती से लेकर मप्र की राजनीति में अनेक स्थापित चेहरे राजमाता की छत्रछाया में विकसित हुए।क्या इस शाही शख्सियत के इन पक्षो को प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता आज की राजनीति महसूस नही करती है?

उनके जन्म जयंती पर जितनी जबाबदेही सरकार की है इन मूल्यों को प्रचारित और आत्मसात करने की उतनी ही उन लोगों की  भी जो राजमाता  के आदर्शों पर चलने की बात करते हैं। वस्तुतः जिस भरोसे के रिश्ते को राजमाता ने खुद आगे आकर गढा था वह आज नजर नह आता है।इसी भरोसे के संकट से देश की राजनीति भी जूझ रही है।इसलिए राजमाता के व्यक्तित्व को सतही और सरकारी आवरण से बाहर निकालकर नई पीढ़ी को रूबरू कराने की आवश्यकता है।क्योंकि ये क्षत्राणी भारत के लोकजीवन की एक केस स्टडी भी है।

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