लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर आया फैसला यूं तो इस मामले का पटाक्षेप नहीं है. एक पक्ष के वकील के अनुसार तीनों जजों ने अपने फैसले में कहा कि विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा. उसका एक हिस्सा – जहां राम लला की प्रतिमा विराजमान है- हिंदुओं को मंदिर के लिए दिया जाएगा. दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दिया जाएगा और तीसरा हिस्सा मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाएगा. कोर्ट ने फिलहाल तीनों को संपूर्ण विवादित जमीन का संयुक्त मालिक बताया है.

तो जैसा कि दुसरे पक्ष ने कहा भी है कि और जैसा की पहले से लोग मान कर चले भी रहे थे कि खुद को पराजित महसूस करने वाला पक्ष आगे अपील भी करेगा ही. हालाकि इस फैसले में किसी के लिए भी विजित जैसा महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है. हो सकता है दोनों पक्ष पुनः अपील करने के बारे में सोचे. चुकि अभी के फैसले के अनुसार उसी जगह पर मंदिर और मस्जिद दोनों बनाए जाने की गुंजाइश है तो शायद ही किसी पक्ष के लिए यह फैसला अंतिम रूप से मान्य होगा.

मोटे तौर पर न्यायिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्राणाली में मूलभूत अंतर भी यही है कि जहां कोर्ट से हमेशा दो टुक फैसले सुनाने की अपेक्षा की जाती हैं वही सामान्यतया ‘लोकतंत्र’ सबको खुश करने की बात करता है. संसदीय व्यवस्था में अगर आपकी नीयत सही हो तो सबको साथ लेकर चलने में बुराई भी नहीं है. लेकिन अगर आपने स्वार्थवश किसी तूष्टिकरण का सहारा लिया तब मामला गंभीर हो जाता है. देखा जाय तो उच्च न्यायालय के इस फैसले से इतना तो साबित हो ही गया है कि हिंदू पक्ष का दावा सही था कि सम्बंधित भूमि पर रामलला का अधिकार है. लेकिन जब हम ‘हिंदू पक्ष’ कहते हैं तो मोटे तौर होना तो यह चाहिए था कि यह ‘भारतीय पक्ष’ होता. और मामला हिंदू बनाम मुस्लिम का नहीं बल्कि भारत की गंगा-जामुनी तहजीब बनाम आक्रामक शासकों द्वारा इसको नुकसान पहुचाने के बीच का मामला होता.

प्रसिद्ध लेखक अलबर्ट टायन्वी ने अपने एक चर्चित लेख में ढेर सारे उदाहरणों के द्वारा यह समझाने का प्रयास किया है कि गुलाम रहा कोई राष्ट्र आजादी के बाद सबसे पहला काम यही करता है कि वह बाहरी आक्रान्ताओं द्वारा बनाए किसी भी स्मारक को भंग करें. भले ही देश के सभी नागरिक उसी मज़हब को मानने वाले हों फिर भी राष्ट्र के नाम पर अपना ही उपासना स्थल तोड़े जाने में भी कोई बुराई नहीं है. इस सम्बन्ध में उन्होंने पोलेंड समेत कई देशों का उदाहरण दिया था जहां इसाई मज़हब को मानने के बावजूद लोगों ने आक्रामकों द्वारा बनाए चर्च को स्वयं तोड़ने में देरी नहीं की.

इसी बात के मद्देनज़र भारत की आजादी के बाद सबसे पहले किये जाने वाले कामों में से एक था सोमनाथ में आक्रान्ताओं द्वारा बार-बार लुट कर तबाह किये गए मंदिर के जीर्णोद्धार करने का काम. और उस समय यह किसी एक बनाम दुसरे मज़हब का मामला नहीं था. उसे देश के स्वाभिमान उसके सम्मान से ही जोड़ा गया था. ये तो बुरा हो ‘राजनीति’ का जिसने इसी तरह के एक दुसरे मसले को राजनीति का सबब बना दिया. कई चर्चित फैसले देने के इतिहास वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ पीठ का यह मामले भले ही ‘मंजिल’ नहीं है लेकिन इसे मील का पत्थर तो कहा ही जा सकता है.

लेकिन यह समय न्यायिक फैसले से इतर सोचने का है. दोनों पक्ष चाहे अपील करें. मामला चाहे फिर दशकों के लिए लटक जाय. फिर वर्षों बाद ऐसे ही किसी दिन चाहे कोई नया फैसला आये. तब की सरकार शाहबानो मामले की तरह फिर भी चाहे कोर्ट के ऊपर अपना कोई फैसले लेकर राजनीति करने लगे. इन सब उबाऊ, थकाऊ और उलझाऊ चीज़ों के बाद शायद कभी जाकर ‘ज़मीन’ का फैसला हो पाय. लेकिन असली सवाल तो दिलों के फैसले का है. निश्चित ही सवाल तो आस्था का है.

वास्तव में ‘राम’ इस देश के प्रतीक पुरुष हैं. रहीम, रसखान से लेकर इकबाल तक ने जिस मर्यादा पुरुषोत्तम को भारत का ही पर्याय बता, देश की विविधता भरे तहजीब का गुणगान किया हो अव्वल तो उनको किसी आक्रांता के बरक्स खड़ा कर देना ही मौलिक रूप से गलत है. वास्तव में यह फैसला एक अवसर का रूप ले सकता है अगर सभी पक्ष अभी से थोड़ी समझदारी का परिचय दे कर मामले को न्यायालय से बाहर सुलझा लेने की पहल करे. अब जब विवादित माने जाने वाले स्थल पर राम जन्मभूमि का होना साबित हो ही गया है तब जिद्द के कारण केवल वहां मस्जिद भी बना कर फिर से सदियों के लिए किसी विवाद का नींव रख देने का कोई मतलब नहीं है.

निश्चित ही हर मज़हब के लोगों को अपनी तरह से उपासना करने की आजादी देश का संविधान देता है. सभी बहुसंख्यकों को उनकी इस आज़ादी का सम्मान करना ही चाहिए. लेकिन मुस्लिम पक्षों को यह फैसला एक बार फिर से विचार करने का अवसर देता है कि जिस तरह राम-जन्मभूमि हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र आस्था का केन्द्र है वैसा तो अयोध्या उनके लिए नहीं है. बस यही सोचने की चीज़ है. इस अवसर पर मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि देश में शांति और सौहार्द बना रहे.

देश के समक्ष उत्पन्न अन्य समस्या, वैश्वीकरण के बाद युवाओं के समक्ष उत्पन्न अन्य चुनौतियां मंदिर और मस्जिद से ज्यादे महत्त्व रखता है. लेकिन चुकि यह मामला काफी महत्त्वपूर्ण हो ही गया है तो अब यही निवेदन किया जा सकता है कि सभी पक्ष इस बार बदली हुई परिस्थिति में सौजन्यता और सद्भाव दिखायें. इस तरह कोई हारेगा नहीं बल्कि देश जीतेगा. देश का संविधान, इसकी अनेकता में एकता की पहचान, राष्ट्र का गौरवमयी इतिहास, ईद की सेवइयां और होली की मिठास मिल बैठ कर खाने वाली संस्कृति की विजय होगी. क्या आप हाथ बढाने को तैयार हैं

13 Responses to “रामजन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद: ना तुम हारे ना हम जीते”

  1. sahab

    dileep ji ke jese tippadi aap kese swikar kar sakte he. kitna zehar ugla he zara si baat par. kya galat he agar pankaj ji kehte he ki videshi akramadkariyon ke dwara banvai gai imaraten todi jani chahiye to phele lal qila aur taj mahal totna chahiye na.aur yeh kam sarkar kare kyonki hamare rajnetaon ne hi babri masjid todi he na.aur ek mazhab par itni galat baat kehte hoe koi to sharm ani chahiye.

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    • शैलेन्‍द्र कुमार

      shailendra kumar

      अब आप ही बताये क्यों यही हिन्दू अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और बहादुरशाह जफ़र का विरोध नहीं करते लेकिन बाबर, महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी और औरंगजेब के नामों से ही भड़क जाते है
      अब आप ये मत कहियेगा की हिन्दुओ के बारे में आप कैसे बता सकते है क्योंकि जवाब आपको मालूम है और वामपंथियों को भी

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  2. संजय स्‍वदेश

    Sanjay Swadesh

    आखिर वर्षों इंतजार के बाद अयोध्या प्रकरण में अदालत को निर्णय आ गया। यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह इसलिए कि इसमें हर पक्ष को खुश करने की कोशिश है। देश में उत्पन्न माहौल में सधा हुआ निणर्य है। कुल मिलाकर स्थिति न तुम हारे, न हम जीते जैसी है। रामचंद्र भले भले ही रामायण और रामचरित मानस के पात्र हो। लेकिन कोर्ट ने इस आस्था को प्रमाणित कर दिया कि रामचंद्र की पावन जन्मभूमि अयोध्या ही थी।
    खैर, यदि कोई पक्ष इस निर्णय के खिलाफ अदालत में नहीं जाए तो फैसले को लगाू कराना अब बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। बेहतर होता कि सुन्न वक्फ बोर्ड या कोई अन्य संगठन अथवा कोई व्यक्ति विशेष इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की की शरण में जाने के बजाय, इस ऐतिहासिक अध्याय को यहीं विराम देकर नई पीढ़ी को शांति और अमन एक एक नया सौगात दे दे।

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    pankaj jha ke is aalekh men aisa kuchh bhi nahin jismen kisi bhi anya dharam ya samprday ke khilaf kuchh ho fir bhi kuchh log apni vyktigat nishtha se oupar uthkar desh or sakal samaaj hit men nahin soch pa rahe hain hy atyant durbhagy poorn hai .pankaj ka prayas stuty hai

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  4. पंकज झा

    पंकज झा.

    आज की सुबह अद्भुत है. फिजा में घुला नव-निर्माण का संकल्प भावुक कर रहा है. कुछ टुच्चों के बावजूद जीत केवल भारत की होनी है. क्या ही बेहतर हो कि वक्फ को दी गयी ज़मीन के बदले सरयू से उत्तर कही बड़े भूखंड पर हिंदू लोग मिल कर एक भव्य मस्जिद बना कर अपने भाइयों को भेट करते. मन हो रहा है झोली लेकर ‘अपनी मस्जिद’ के लिए समर्थन और संसाधन मांगने निकल पडूं.

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  5. अहतशाम त्यागी

    जजों द्वारा चोरी से मसजिद में जाकर राम की मूर्ति को रखे जाने को गैर हिन्दू धार्मिक हरकत नहीं माना। राम मंदिर को अवैध नहीं माना ? यह जजों की खुली हिन्दुत्ववादी पक्षधरता है।
    यह फेसला हिन्दुत्ववादी पक्षधरता की मिसाल है
    मंदिर की ओर से पहले याचिका १८८५ में महंत रघुवर दास के दुवारा मस्जिद के सामने मंदिर बनाने लिए की गई थी जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया था
    और रही बाहरी आक्रान्ताओं द्वारा बनाए किसी भी स्मारक को भंग करने का सवाल तो देशा तो १९४७ में आज़ाद हो चूका था
    और मस्जिद में रात को चोरी से घुसे १९९२ में बरी लेट आँख खुली!
    और हाँ ये लाल किला भी तो उन्ही का बना हुआ है
    फिर इस पे तिरंगा आपके हिसाब से नहीं फहराना चाहिए
    …………………………………….
    शर्म नाम की कोई चीज़ है या नहीं आपके अन्दर

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    • ateet

      Shri अहत्षम खान जी ,
      कभी तो नए युग में प्रवेश करो हमेशा अराव देश की भांति सोचते हो माना आप हिन्दू नहीं लेकिन एक इंडियन हो और इंडियन कानून की इज्जत करो

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    • Dileep Singh

      अहतशाम जी आपने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस्‍लाम वास्‍तव में शांति और अमन का नहीं बल्कि नफरत और हिंसा का धर्म है… जहॉं सब लोग प्रेम से बात करते हैं और चर्चा करते हैं वहीं आप नीच कट्टरवादी जेहादियों की भाषा बोलते हो…. अरे अगर शांति और अमन से इतनी नफरत है तो RDX और AK-47 का इंतजाम करना तो आप लोगों के लिए बेहद आसान है ही क्‍योंकि दुनिया भर में फैले आपके भाई इन्‍हीं गंदी और नीच चीजों से बेगुनाहों का खून बहाकर अल्‍लाह को खुश कर ही रहे हैं… आप बिना मतलब इस ब्‍लॉग पर कमीने और घटिया काफिरों के साथ वक्‍त बर्बाद कर रहे हैं…. जाकर तलवार उठाइए और कम से कम 1000 काफिरों का सर कलम कर के उनके खून से अपनी प्‍यास बुझाइए ताकि अल्‍लाह आपसे खुश हो जाए कि आपने ई
      श्‍वर (जो आपके हिसाब से अल्‍लाह का दुश्‍मन ही होगा आखिर हम सब काफिर उसे और अल्‍लाह को एक ही जो मानते हैं )को मानने वाले बहुत से कीड़ों के खून से खेलकर दुनिया को पाक किया…. और 62,000 हूरें आपको मिलेंगी वो तो अलग से बोनस होगा… तो फिर देर क्‍यों कर रहे हैं जितनी देर आप इस ब्‍लॉग पर अपना समय बर्बाद करते हैं उतनी देर में तो आप कम से कम 20 काफिरों का खून पीकर अपनी प्‍यास बुझा सकते थे….

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  6. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    समसामयिक और संतुलित आलेख के लिए साधुवाद . . अभी तत्काल तो सारा देश कमोवेश खुशनुमा माहोल में आ चूका है .इस फिजा को चिर स्थाई बनाने के लिए एक ही विकल्प है -अनेकता में एकता ,भारतीय संस्कृति की विशेषता ..लखनऊ खंडपीठ को नमन .ईश्वर से अनुरोध है की सभी को सद्बुद्धि दे की उच्चतम न्यायलय में वाद प्रस्तुती हेतु उपलब्ध तीन माह की अवधि का संकीर्ण आस्था के लिए दुरूपयोग न करे

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  7. Anamika

    आप की रचना 01 अक्टूबर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

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  8. अशोक बजाज

    ASHOK BAJAJ RAIPUR

    अयोध्या का फैसला :
    देर आयद दुरुस्त आयद

    Reply

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