रामायण और मीडिया ट्रायल

मीटिंग समाप्त होने के अगले कुछ दिनों में लंका में जो हुआ उससे राम और लक्ष्मण एक बड़ी प्रोब्लम में फंस गये। पत्रकारों और मानवाधिकारवादियों ने गुस्सैल लक्ष्मण को अपने सवालों में जकड़ लिया। आम जनता के बीच अपनी न्यूज सेंस टैक्निक की बदौलत यह बात फैला दी कि लक्ष्मण के पास ब्रह्मास्त्र था जबकि मेधनाद निहत्था था। बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान ढ़ूंढ़ने वाले राम इस आधुनिक समस्या का समाधान ढूंढ़ने में असफल दिखाई दिये।

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लंका में तो हंगामा मच गया था, जब पता चला कि समंदर के किनारे राम और उनकी सेना ने लंगर डाल दिया है। लंका के सभी छोटे बड़े बिजनेसमैन भी परेशान थे और हो भी क्यों न। रावण के बेवजह के कलेश से उनका धंधा जो मंदा हो गया था। उस पर ये नई फफूंद कि राम के छोटे भाई ने मेधनाद को सलटा दिया। बड़ा लोचा हो गया, राजभवन के मीटिंगहॉल में डिस्कशन चल रहा था। इस विपदा के पल में क्या किया जाये और क्या ना किया जाए। मजेदारी की बात ये कि डिस्कशन पैनल में कलयुग से अपनी पोस्ट का मिसयूज करने वाले दो बड़े पत्रकार भी अपनी टोली के साथ मौजूद थे। ये और इनकी टीम बड़े अव्वलदर्जे के शातिर थे, इन पत्रकारों ने तो वहां भी रावण से डील साइन कर ली की मेधनाद के वध का हिसाब चुकता करेंगे। बदले में जनपथ के सामने 5 हजार एकड़ वाली कोठी इन्हें बतौर नजराना देनी होगी। रावण भी मान गया, सोचा मामला सस्ते में निपट रहा है। तो बॉन्ड साइन हो गया कि जैसा ये दोनों कहेंगे वैसा रावण को पब्लिक के सामने कहना होगा। बॉन्ड के साइन होने के साथ ही मीटिंग समाप्त हो गई।
मीटिंग समाप्त होने के अगले कुछ दिनों में लंका में जो हुआ उससे राम और लक्ष्मण एक बड़ी प्रोब्लम में फंस गये। पत्रकारों और मानवाधिकारवादियों ने गुस्सैल लक्ष्मण को अपने सवालों में जकड़ लिया। आम जनता के बीच अपनी न्यूज सेंस टैक्निक की बदौलत यह बात फैला दी कि लक्ष्मण के पास ब्रह्मास्त्र था जबकि मेधनाद निहत्था था। बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान ढ़ूंढ़ने वाले राम इस आधुनिक समस्या का समाधान ढूंढ़ने में असफल दिखाई दिये। राम और लक्ष्मण आज की मीडिया ट्रायल और मानवाधिकारों के शिकंजे में फंसते गये। उनका बड़े से बड़ा योद्धा हनुमान, जाम्बवान, सुग्रीव, नल, नील, अंगद, केसरी आदी सब हाथ बांधे लंका तट पर और सीता माता अशोक वाटिका में इस मीडिया ट्रायल के खत्म होने का इंतजार कर रहे थे।
……………..तभी मेरा सपना टूटा और नींद खुल गई। मेरे दिमाग में सबसे पहले यही विचार आया कि अगर उस दौर में मीडियाकर्मी और मानवाधिकार वाले पहुंच जाते तो शायद राम—रावण का युद्ध इतना आसान नहीं होता। फिलहाल आंखें मसलता हुआ मैं सोच रहा हूं कि इस रोज रोज के रावण से डर नहीं लगता मगर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, संप्रदायवाद, जातिवाद और प्रांतवाद जैसे रावणों से कब मुक्ति मिलेगी।
दीपक शर्मा ‘आजाद’

 

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