डॉ. नीरज भारद्वाज
हमारे शास्त्रों, ग्रंथों में विद्वानों, आचार्यों आदि ने साहित्य की महिमा का वर्णन लिखते हुए कहा है कि वही साहित्य श्रेष्ठ है जो सांसारिक पापों और अज्ञानता को नष्ट करने की क्षमता रखता है।श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कन्ध केअध्याय 5 केश्लोक 11 में लिखा गया है कि तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि। नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत् शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः।। इसका अर्थ है कि वह साहित्य या रचना (वाग्विसर्ग) जिसमें जनता के पापों और दुखों का विनाश (जनताघविप्लव) करने की अद्भुत शक्ति हो, वास्तव में बहुत दिव्य और क्रांतिकारी है भले ही वह व्याकरण या छंद की दृष्टि से प्रत्येक श्लोक में त्रुटिपूर्ण या असंबद्ध (अबद्धवत्यपि) ही क्यों न हो क्योंकि ऐसे साहित्य में उस अनंत (परमेश्वर) के पवित्र नामों और उनके यश का गुणगान होता है। साधु, संत और भक्तजन ऐसे साहित्य को प्रेम से सुनते हैं (शृण्वन्ति), गाते हैं (गायन्ति) और दूसरों को सुनाते/स्मरण करते हैं।
विचार करें तो सांसारिक त्रुटियों और व्याकरण की कमी से मुक्त कोई भी साहित्य जिसमें भगवान के अनंत गुणों और यश का वर्णन है, वह समाज में उन्नति, प्रगति, भक्ति, भाव लाने और साधु पुरुषों के मन को पवित्र करने वाला सर्वोत्तम साहित्य होता है।संस्कृत भाषा में आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के बारे में लिखा गया है। इसी को आधार बनाकर अलग-अलग काल खंडों में कवियों, संतों, महात्माओं आदि ने अपने भाव के साथ अलग-अलग भाषा, छंद तथा शैली में भगवान श्रीराम का गुणगान गाया और लिखा है। यह सभी ग्रंथ आज भी प्रासंगिक है और अपना विशेष स्थान रखते हैं। इनमें लोक बोलियों और भाषाओं का विशेष महत्व है। यह लोक बोलियाँ नहीं होती तो जन सामान्य तक यह दिव्य ज्ञान कैसे पहुँच सकता था? हमारे संतों ने घर-घर, गाँव-गाँव में जाकर श्रीराम नाम की महिमा को गाया और जन-जन को सुनाया। हम यहाँ भारतीय भाषाओं में श्रीराम नाम की चर्चा कर रहे हैं।
लोकभाषाओं में सबसे प्रचलित और विश्व प्रसिद्धअवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्रीरामचरितमानस’का नाम लिया जाता है। तमिल भाषा में कम्बन् द्वारा रचित कम्ब रामायण (इरामावतारम) का विशेष स्थान है।कम्ब रामायणमें रावण का चरित्र बहुत जटिल और भव्य दिखाया गया है। वह एक प्रकांड विद्वान है, जो अपने कर्मों के कारण पतन की ओर जाता है।बंगाली में कृत्तिवास ओझा द्वारा रचित कृत्तिवास रामायण (श्रीराम पांचाली) भी बहुत लोकप्रिय है। इसमें लोकाचार और वात्सल्य रस की गहरी छाप देखने को मिलती है, यहाँ तक कि युद्ध के दृश्यों में भी करुणा झलकती है। हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ मानते हैं कि निराला द्वारा रचित राम की शक्ति पूजा कविता इसी ग्रंथ को आधार बनाकर लिखी गई है।तेलुगु भाषा में गोना बुद्धा रेड्डी द्वारा रचित रंगनाथ रामायणमजन प्रिय है। मलयालम में थुंचथु इझुथाचन द्वारा रचित अध्यात्म रामायणम किलिपाट्टु भी अपना विशेष स्थान रखती है। अध्यात्म रामायणम में राम को विष्णु का साक्षात पूर्ण अवतार मानकर पूर्णतः भक्ति भाव से प्रस्तुत किया गया है। ओड़िया में बलराम दास द्वारा रचित जगमोहन रामायण (दांडी रामायण) का विशेष स्थान है। मराठी में संत एकनाथ द्वारा रचित भावार्थ रामायण भी लोगों के बीच रची-बसी है।
कश्मीरी भाषा में प्रकाशराम कुरिगामी द्वारा रचित रामावतारचरित महत्वपूर्ण रचना है। असमिया में कवि माधव कंदली ने सप्तकाण्ड रामायण की रचना करी। विचार करें तोसभी कवियों ने कथा के भीतर स्थान और समय के अनुसार रीति-रिवाजों, खान-पान आदि को शामिल किया।इन सभी ग्रंथों की लोकप्रियता के चलते लोग राम-सीता को अपने परिवार का हिस्सा मानने लगे। अवध प्रांत की बात करें तो आज भी शादी से पहले घरों में रामचरितमानस का पाठ या सुंदरकांड का पाठ बड़े ही भाव के साथ किया जाता है। वाराणसी में तुलसी मानस मंदिर स्थान पर भारतीय भाषाओं में लिखी रामायण के लगभग सभी रूप हमें देखने को मिल जाते हैं। मेरा सौभाग्य रहा है कि मैंने उस स्थान का दिव्य दर्शन किया है।
भारतीय भाषाओं में लिखी गई इन राम कथाओं ने संस्कृत के श्लोकों से निकालकर आम बोलचाल की भाषा में ला खड़ा किया। इसी वजह से सदियों तक अनपढ़ होने के बावजूद सामान्य ग्रामीण भी रामायण की चौपाइयों और पदों को गाकर जीवन के नैतिक मूल्यों को जान सके।भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विभिन्न रामायण यह दर्शाती हैं कि भारत में कहानी कहने की परंपरा कितनी समृद्ध और लचीली रही है। संस्कृत में कहा गया है कि, एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्तिअर्थात विद्वानों ने एक ही सत्य को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा है। रूप भले ही अलग हों—चाहे वह अवधी की चौपाई हो, तमिल का पद्य हो। इन सबके केंद्र में मर्यादा, त्याग, प्रेम और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश है। विचार करें तो आज भी रामायण या रामकथाएं पूरे भारत को एक सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधे हुए हैं।
इन सभी रामायणों के अलावा एक रामायण एक श्लोक की भी है। इसमें एक श्लोक के भीतर भगवान श्रीराम के जन्म से लेकर उनके राजा बनने तक की पूरी कथा यात्रा बताया गया है। इसे’स्तोत्र साहित्य’ की परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनम्।
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्।।
इस श्लोक का भावार्थ है किप्रारंभ में श्री राम का तपोवन (वनवास) जाना।स्वर्ण मृग (मारीच) का वध करना।माता सीता (वैदेही) का हरण होना।पक्षीराज जटायु का मोक्ष/मरण।सुग्रीव से मित्रता और बातचीत।वानर राज बाली का वध।समुद्र पार करना (सेतु निर्माण)।हनुमान जी द्वारा लंका का दहन।इसके बाद रावण और कुम्भकर्ण का वध। यही संपूर्ण रामायण की कथा है।( अदिति फीचर्स )
डॉ. नीरज भारद्वाज