बाजार की आड़ में बलात्कार

-आवेश तिवारी

“बिग बॉस” और “राखी का इन्साफ” अब प्राइम टाइम में नजर नहीं आयेंगे ,सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इस निर्णय से निश्चित तौर पर बिग बॉस के निर्माताओं को नुकसान उठाना होगा, साथ ही उन खबरिया चैनलों को भी भारी घाटा होगा जो एडवर्टोरियल को खबर बनाकर लगातार परोस रहे थी, क्यूंकि मंत्रालय ने इन शोज से जुडी खबरों के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी है। शायद ये टीवी के इतिहास में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा सिगरेट, गुटखे और शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के बाद उठाया गया का सबसे साहसिक निर्णय है। मनोरंजन की भूख को  सेक्स, प्यार, धोखे, फरेब, क्रोध और लिप्सा के मसाले में लिपटा कर उसे  रियलिटी  शो कह कर जनता के सामने परोसना न सिर्फ वैचारिक व्याभिचार है बल्कि हिन्दुस्तानी टेलीविजन चैनलों की तंगहाली का भी जीता जागता  नमूना है। जिनके पास या तो कहानियों के नाम पर रोटी, कलपती, धोखा खाती  और बार बार बिस्तर बदलती महिलाएं हैं या फिर पैसे, प्रसिद्धि और ग्लैमर को ढूंढते कम नामचीन या फिर गुमनाम लोगों को कथित तौर  पर अवसर प्रदान करते  रियलिटीज शोज। शायद कुछ लोग नाम कमा भी लेते हों, पैसे भी बना लेते हों, मगर अफ़सोस हर बार समूह  हारता है। इन धारावहिकों और रियलिटीज  शोज के माध्यम से मनोरंजन के जिस माडल  का निर्माण हो रहा है उसका खामियाजा पूरा दर्शक वर्ग सामाजिक, मानसिक और चारित्रिक तौर पर भुगत रहा है। अपनी छोटी बड़ी खुशियों के लिए भी शोर्ट  कट अपनाने में यकीं करने वाली जनता भावनात्मक स्तर पर किये जाने वाली इस ठगी से अनभिज्ञ रहती है और खेल जारी रहता है।

मनोरंजन के नाम पर मूल्यों के साथ व्याभिचार करने के  इन मामलों में जिस एक बात पर चर्चा कभी नहीं होती है वो है खबरिया चैनलों के सरोकारों की। एक अनुमान के  मुताबिक़ न्यूज चैनल्स के कुल समय का लगभग ३० प्रतिशत हिस्सा, कथित मनोरंजन के इन कार्यक्रमों के प्रमोशन में बीतता है। जब नहीं तब ख़बरों के बीच में अदाएं बिखेरती एंकर कभी  सास,बहु  और बेटी तो कभी राखी सावंत को लेकर सर पर बैठ जाती है। बेहुदा तरीके से सेट पर होने  वाली लड़ाइयों से लेकर शादियाँ तक इन ख़बरों की विषय वस्तु बनी हुई हैं। हद तो तब हो जाती है जब महत्वपूर्ण ख़बरों के बीच में ब्रेकिंग न्यूज के रूप में स्क्रोल आता है” बिग बॉस में टाइम बम ” या फिर “अमिताभ को खतरा “!खबरियां चनलों के चरित्र का सबसे चौका देने वाला पहलु तब देखने को मिलता है जब वे उन्ही धारावाहिकों की नेगेटिव केम्पेनिंग करने लगते हैं ,जिनका वो प्रमोशन भी करते है। कहें तो जानबूझ कर धरावाहिक को विवादित करने की कोशिश की जाने लगती है। एकतरह से ये विवाद में रहकर आगे बढ़ने का  फार्मूला है। ये नेगेटिव केम्पेनिंग भी प्रमोशन का हिस्सा होती है,और चैनलों ने इसके एवज में निश्चित तौर पर भारी भरकम रकम वसूली होती है, लेकिन दर्शक  ये धोखा समझने में नाकाम रहता है। “राखी का इन्साफ” में राखी सावंत द्वारा एक मर्द को नामर्द कहे जाने के बाद उसके द्वारा कथित तौर पर की जाने वाली आत्महत्या हो या फिर “बिग बॉस में सारा और अली की कथित तौर पर पहली शादी, खबरिया चैनलों ने जानबूझ कर इससे जुड़े विवाद  को हवा दी।

अभी तीन दिन ही हुए जब दिल्ली में पांच मंजिला इमारत गिर पड़ी ,सभी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज की छड़ी लगी हुई थी जो समीचीन भी था, मगर उन्ही ख़बरों के बीच में बिग बॉस में पामेला एंडरसन के आने और सलमान खान के उनके साथ न रह पाने के बयान का  भी शर्मनाक तड़का लगा हुआ था। एक कमरे में लाश पड़ी हो तो आप दूसरे कमरे में सोहर कैसे गा सकते हैं। ये कुछ ऐसा ही था जिसे मुंबई हमलों के लाइव कवरेज के बीच लक्स का विज्ञापन ,ये बेशर्मी की पराकाष्ठा है। बेशर्मी ये भी है जब हिंदी फिल्मों  और देशी मार्का चैनलों की पसंदीदा अभिनेत्री राखी सावंत ,जिसके पास सिर्फ नंगा जिस्म, जश्न और जाहिलियत है इन्साफ की देवी बनकर न्याय करने लगती हैं। क्या ९० के दशक में किसी ने कल्पना की होगी कि लोगों की निजता बाजार की चीज बन जाएगी। आज बिग बॉस और राखी का इन्साफ  ही नहीं तमाम रियलिटीज शो  सिर्फ एक बिंदु पर काम कर रहे है वो है आदमी की  निजता को  ज्यादा से ज्यादा उघाड़ने की कोशिश। जो धारावाहिक  इनमे सबसे ज्यादा सफल होते हैं उनकी टी आर पी सबसे अधिक।

संभव है अगले कुछ दिनों में सुहागरात लाइव या बाथरूम लाइव जैसे भी कार्यक्रम भी आयें, हमें इनके लिए तैयार रहना चाहिए। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ ये परेशानी रही है कि वो वो इलेक्ट्रानिक माध्यमों को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट निति बनाने में नाकामयाब रहा है या फिर जानबूझ कर ऐसा करने से बचता रहा है। ये संभव है कि इस पलायन के पीछे बाजार से  जुडी जरूरतें हो, जो आर्थिक उदारीकरण की सफलता के लिए जरुरी हैं ,मगर ये नहीं होना चाहिए कि आर्थिक आधार उदार भारत चरित्र ,सामाजिक मूल्यों और संस्कृति के प्रति भी ईमानदार हो। समाज में जो चीजें सहजता से मौजूद हों उनका निस्संदेह स्वागत किया जाना चाहिए, मगर माध्यमों को वो भी पूरी तरहसे आर्थिक आधार पर संचालित किये जानेवाले माध्यमों को, मनोरंजन और खबरों के नाम पर समाज  माइंड वाश किये जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

2 thoughts on “बाजार की आड़ में बलात्कार

  1. बाजार की आड़ में बलात्कार – by – आवेश तिवारी

    सुना है कि “बिग बॉस” और “राखी का इन्साफ” टी.वी. पर अब भी पहले की तरह ही प्राइम टाइम में, उनके प्रोगाम के अनुसार, नजर आते रहेंगे.

    देखो हाई कोर्ट क्या निर्देश देता है.

    समाचारों में इतने सारे commercial breaks तो आ ही रहे हैं, हाँ “बिग बॉस” और “राखी का इन्साफ” का प्रसार समाचारों में काफी लम्बा अवश्य रहा है. प्रचार के लिए लम्बायी के अनुसार पैसे देने होते हैं.

    ————— ” Sunday हो या Monday रोज़ खाओ अंडे ” —————

    का विज्ञापन – यदि आस्था, साधना, संस्कार, प्रज्ञा, आदि TV channels पर प्रसारण हो, तो क्या दर्शक को नैतक रूप से ऐसे प्रसारण पर आपति करने का अधिकार होगा ? यह “बाजार की आड़ में बलात्कार” संभव है.

    आवेश तिवारी जी आप स्वयं भूल गए कि यह बाज़ार है.

    Money makes the mare go

    जय राम जी की.

    – अनिल सहगल –

  2. ऐसे तिवारीजी अभी युवा हैं.उनका आवेश में आना भी लाजमी है,पर मैं सोचता हूँ की ऐसे दृश्य,जिनका उल्लेख तिवारीजी ने अपने आलेख में किया है,दिखा कर किसका चरित्र हनन हो रहा है?तिवारीजी,बुरा मत मानियेगा मुझे तो भारत यानि इंडिया यानि हिंदुस्तान में कही भी कोई चरित्रवान दिखाई ही नहीं देता तो चरित्र हनन किसका होगा?हम ये सब दृश्य देखे या न देखे हमारे देश के चरित्रहीनों को क्या अंतर पड़ता है?हाँ कही इक्का दुक्का चरित्रवान कोई हो भी तो अवल तो वह ये सब देखेगा ही नहीं और अगर कभी देख भी लिया तो मैं नहीं समझता की उसपर ऐसे दृश्यों का कोई असर होगा?ऐसे ये सब लिखने से और फिर लोगों द्वारा उसके पढ़े जाने से कुछ समय तो बीत ही जाता है और कुछ दूसरे तरह का मनोरंजन भी हो जाता है यही क्या कम है?

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