रसगुल्ले पर रसीली चर्चा


कहते हैं कि खबरों का अपना संसार तो है ही; पर उनका स्वाद भी होता है। विश्वास न हो, तो इस मीठी खबर का स्वाद लें। पिछले दिनों कोलकाता में रसगुल्ले के आविष्कार के 150 साल पूरे होने पर ‘रसगुल्ला उत्सव’ मनाया गया। उस पर डाक टिकट और विशेष कवर भी जारी किया गया है। पता नहीं उस टिकट के पीछे रस लगा होगा या गोंद। क्योंकि बिना रस के रसगुल्ला बेकार है और बिना गोंद के टिकट।

वैसे ये रसगुल्ला मूल रूप से बंगाल का है या उड़ीसा का, इस पर पिछले दिनों खूब विवाद हुआ था। बात न्यायालय तक चली गयी। उड़ीसा वाले कहते थे कि एक बार लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ से नाराज हो गयीं। तब भगवान ने रसगुल्ला देकर ही उन्हें मनाया था। इसलिए जगन्नाथ यात्रा का अंतिम दिन ‘रसगुल्ला दिवस’ माना जाता है। उस दिन लोग रसगुल्ले खाते हैं और दूसरों को खिलाते भी हैं; पर बंगाल वाले इसे अपना आविष्कार बताते थे। अंततः निर्णय बंगाल के पक्ष में हुआ और उसे जी.एल.टैग मिल गया; पर उड़ीसा वालों ने आगे अपील कर दी है। देखिये, अब क्या होता है ?

शर्मा जी का मत है कि रसगुल्ले पर बहस जितने दिन चले, उतना ही अच्छा है। बस, शर्त ये हो कि कोर्ट में उपस्थित सभी लोगों को कार्यवाही शुरू होने से पहले भरपेट रसगुल्ले खिलाए जाएं। जब सारा माहौल खुशबू और स्वाद से तर होगा, तो बहस में कितना मजा आएगा ? कई लोग कहते हैं कि यदि मुंह में रसगुल्ला रखकर हिन्दी बोलें, तो वह बंगला हो जाती है। ये सुनकर उड़ीसा वालों का मुंह जल जाता है। उसकी जलन भी वे रसगुल्ला खाकर ही मिटाते हैं। क्या करें, ये चीज ही ऐसी है।

एक बार मैं कोलकाता में प्रसिद्ध के.सी.दास हलवाई की दुकान पर गया। उनका दावा है कि रसगुल्ले का आविष्कार उनके पूर्वजों ने ही किया था। वहां एक सज्जन पूरा रसगुल्ला एक बार में ही खाने लगे; पर वह उनके गले में अटक गया। यह देखकर एक कर्मचारी तुरंत पानी ले आया। उससे वह रसगुल्ला नीचे उतरा। दुकानदार ने कहा कि इसका स्पंज बहुत मुलायम होता है। अतः इसे धीरे-धीरे खाना चाहिए। मैंने रसगुल्ला बनाने की विधि तो पढ़ी थी; पर खाने की विधि आज ही पता लगी।

पर रसगुल्ले की बहस में लोग दूध और गाय को भूल जाते हैं। ये तो तय है कि रसगुल्ला केवल और केवल गाय के दूध से ही बनता है। और गाय भी विदेशी या जरसी नहीं, सौ प्रतिशत शुद्ध भारतीय गाय। इसके दूध से विशेष विधि से छेना बनाते हैं और फिर रसगुल्ला। इस प्रक्रिया में थोड़ी भी गड़बड़ हुई, तो रसगुल्ले की बजाय हंसगुल्ला बन जाता है।

क्या ही अच्छा हो यदि रसगुल्ले पर डाक टिकट जारी करने वाली सरकार उस गोमाता पर भी थोड़ी कृपा करे, जो सड़कों पर धक्के खा रही हैं। उसे डाक टिकट नहीं, पेटभर चारा और सिर छिपाने की जगह चाहिए। और केवल सरकार ही क्यों, ये कर्तव्य तो हम सबका है।

देखिये, रसगुल्ले के बहाने इतनी रसीली चर्चा हो गयी। अब मैं तो जा रहा हूं रसगुल्ला खाने। अपने बारे में आप खुद विचार करें।– विजय कुमार

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