लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

 

वेद का आदेश है-

वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिता:।।

‘अर्थात हम अपने राष्ट्र में जागरूक रहते हुए अग्रणी बनें। राष्ट्र का नेतृत्व करें।’

जो जागरूकों में भी जागरूक होता है, वही राष्ट्रनायक होता है, वही पुरोहित होता है। यज्ञ पर पुरोहित वही बन सकता है जो जागरूकों में भी जागरूक है, सचेत है, सजग है, सावधान है। पुरोहित यज्ञ का नायक है। राष्ट्र भी एक विशाल यज्ञ का नाम है। एक ऐसे यज्ञ का नाम है जो सभी प्राणियों के कल्याण का विधान करता है और जो कोई दुष्ट व्यक्ति इस पवित्र यज्ञ में व्यवधान डालता है-उसका शरसंधान करता है। राष्ट्र नायक वही हो सकता -है जो व्यक्ति राष्ट्रवासियों के इहलौकिक और पारलौकिक कल्याण की योजनाओं में सदा निमग्न रहता है। उसका चिंतन, मनन और निदिध्यासन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए और प्रत्येक प्राणी के कल्याण के लिए समर्पित होता है।

आचार्य स्वयमाचरण वाला होता है, दूसरों को आचरण सिखाता है और शास्त्रज्ञान का अभ्यास करना-कराना उसका स्वाभाविक महत्वपूर्ण कार्य होता है। ऐसे आचरणशील व्यक्ति के मुख से निकले शब्द स्वयं ही ‘शब्द प्रमाण’ बन जाते हैं। पर यह योग्यता किसी डिग्री से प्राप्त नही होती यह तभी मिलती है-जब कोई आचरणशील आचार्य अपने मत की उत्पत्ति करने में सफल हो जाता है। अत: किसी जाति, कुल, वंश या परिवार में जन्म लेकर किसी विशेष वेशभूषा को धारण करके आचार्य गुरू या साधु बनकर जो लोग यह मान लेते हैं कि उनको ‘शब्दप्रमाण’ की योग्यता मिल गयी है-वे निरे अज्ञानी हैं और संसार में केवल पाखण्डवाद को ही प्रसृत करते हैं उनके विषय में ऐसा मानना व जानना चाहिए।

इस समय स्वामी रामदेव भारत की वैदिक संस्कृति की रक्षार्थ विशेष कार्य कर रहे हैं। उनके सभी कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण कार्य है-भारत में और विश्व में आयुर्वेद की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना। बड़ी तेजी से सारा विश्व आयुर्वेद की ओर आ रहा है। भारत तो पहले से ही आयुर्वेद से अपनी चिकित्सा करता आया है परंतु एक ‘षडय़ंत्र’ के अंतर्गत आयुर्वेद को भारत से विदा करने की जिन लोगों ने तैयारी कर ली थी उन्हें बाबा रामदेव की आयुर्वेद क्रांति से निश्चय ही झटका लगा है।

बाबा रामदेव कहते हैं कि अब वह शीघ्र ही अगले पांच वर्ष में भारत में कार्यरत एलोपैथी की विदेशी कंपनियों को ‘मोक्ष’ दिला देंगे। यह ‘मोक्ष’ शब्द भी बाबा ने यूं ही नही बोल दिया है। मोक्ष का अभिप्राय है जहां मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है। कहने का तात्पर्य है कि विदेशी कंपनियों को बाबा मारने की बात नही कह रहे हैं मारने से तो उनका पुनर्जन्म होना संभव है-वह तो उन्हें सीधे मोक्ष दिलाना चाहते हैं अर्थात इस मरणशील संसार के किसी भी कोने में एलोपैथी ना रहे और सर्वत्र आयुर्वेद का डंका बजे-बाबा का यह जीवन व्रत बहुत ही महान है, बहुत ही ऊंचा और बहुत ही पवित्र है। उनका यह जीवनव्रत उन्हें भारत का पुरोहित घोषित करता है। अपने जीवन व्रत के प्रति समर्पित बाबा रामदेव वर्तमान में भारत के आचार्य हैं। क्योंकि वह स्वयमाचरण, दूसरों को आचरण सिखाने और शास्त्रज्ञान का अभ्यास करने-कराने की-आचार्य की तीनों विशेषताओं को पूरा करते हैं।

ज्ञान में यदि करूणा न हो तो ज्ञान गूंगा होता है और यदि उसमें पारदर्शिता न हो तो वह अंधा होता है-इसी प्रकार ज्ञान में यदि देश प्रेम ना हो तो वह विक्षिप्त होता है। जब बाबा रामदेव अपनी ओर से मृत सैनिकों के परिवारों के बच्चों के लिए आधुनिकतम सुविधाओं से युक्त विद्यालय देने की बात करते हैं और शहीदों के परिवारों के कल्याणार्थ अपनी ओर से सहायता राशि देने की घोषणा करते हैं-तब उनके ज्ञान की करूणा के हमें दर्शन होते हैं, साथ ही जब वह अपनी कमाई को खुल्लम खुल्ला देश के प्रधानमंत्री के सामने रखते हैं और उसे छिपाने का प्रयास न करके सारे देशवासियों का धन बताकर उनके कल्याण में लगाने का वचन देते हैं तो उनके धन की पारदर्शिता प्रकट होती है और जब वह पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा भारत के दो सैनिकों के सिर कलम करने की घटना पर पाकिस्तान के सौ सैनिकों के सिर काटने की बात कहते हैं तो उनकी उत्तुंग देशभक्ति का हमें पता चलता है। इस प्रकार राष्ट्र के इस ‘पुरोहित’ के ज्ञान में कोई न्यूनता नही है, वह पूर्ण है और पूर्णता में ही संसार को विलीन करने की क्षमता रखता है।

वर्तमान भारत में लोगों की बीमारियों का कारण एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली को माना जा सकता है। सर्वत्र मिलावटी खाद्य पदार्थ या पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों ने भी भारत के लोगों को बीमार किया है। इन कंपनियों के भारत में रहने से भारत राजनीतिक रूप से पुन: गुलाम हो जाएगा या नहीं इस पर बहस ना करके हम केवल एक बात कहना चाहते हैं कि इन कंपनियों ने भारत को आर्थिक रूप से और शारीरिक रूप से रोगी बनाकर तो वर्तमान में ही भारत को अपना गुलाम बना लिया है। एक पूरा षडय़ंत्र कार्य करता रहा है-इस गुलामी को स्थापित करने में। पूरा देश अपने स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बैंड बजाता रहा और ये विदेशी कंपनियां बैंड के सामने नाचते भारत के लोगों के सूने पड़े घरों में डकैती डालती रहीं। हमारे ‘जयचंद’ उन्हें रास्ता बताते रहे और हमारे विनाश की तैयारी होती रही।

बाबा रामदेव ने जागरूकों में जागरूक होकर भारत का आध्यात्मिक नेतृत्व संभाला और लग गये लोगों को जगाने। आज सारा राष्ट्र जाग चुका है। लोग अपने घरों में, कार्यालयों में या अन्य स्थानों पर कोल्ड ड्रिंक्स लेने में या चाय कॉफी लेने में संकोच करते हैं और कई तो स्पष्ट मना कर देते हैं। अब लोगों को प्रात:कालीन भ्रमण करते देखा जा सकता है, योग करते देखा जा सकता है, आयुर्वैदिक वैद्य के पास जाते देखा जा सकता है। ये सारे के सारे सफल क्रांति के लक्षण हैं और ये सब तभी संभव हुआ है जब एक जागरूक पुरोहित राष्ट्रवेदी के यज्ञ मंडप में स्वामी रामदेव के रूप में बैठा हुआ है।

 

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