लेखक परिचय

चन्दन कुमार

चन्दन कुमार

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक. युवा पत्रकार. पत्रकारिता की शुरुआत इसी साल (2009) से की.

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naxalपूंजीवाद और विकास के नाम पर आदिवासियों और समाज में हाशिए पर रह गए लोगों को उनकी ज़मीन और अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. यदि ये तबका कोशिश भी करे तो इनकी आवाज़ भी सांप के फन की तरह कुचल दिया जाता है. शायद इन्हें नहीं मालूम जब यहीं देश के सत्ताधीशों को निगलेंगे तो कोई बचाने वाला भी नहीं होगा. दरअसल, आज देश के चंद गिने-चुने लोगों के पास अथाह संपत्ति है और अधिकांश लोग ऐसे हैं जो अपनी न्यूनतम ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पाते हैं. जो लोग दूसरों के महल बनाते हैं उन्हें सिर छुपाने के लिए फूस की झोपड़ी भी मयस्सर नहीं, जो औरों के लिए क़ीमती कालीन बुनते हैं, वे सारा जीवन ग़रीबी और अंधकार में बिता देते हैं. आज हालात ऐसे हो गए हैं कि क़ानून का पालन करने वाले निराश और हताश हो गए हैं जबकि क़ानून तोड़ने वाले सरकार पर हावी हो चुके हैं. नक्सलवाद का यह विकृत रूप हर रोज़ लगों की जानें ले रहा है. हररोज़ कोई न कोई मांग सूनी हो रही है, बच्चे अनाथ हो रहे हैं. आख़िर इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा. सरकार तो कतई नहीं लेगी. बस चंद मुआवजा देकर अपने फर्ज़ पूरी समझती है. लेकिन, क्या वाक़ई यही समस्या का निदान है. लोगों के बीच तो ऐसी चर्चा चल रही है कि नक्सलियों से निपटने का कारगर तरीक़ा यही है तो हमें नहीं चाहिए, मुआवजा और हम दुआ (बद्दुआ) करते हैं कि नक्सली सरकार में बैठे आला नेताओं अधिकारियों के भी मार डाले, फिर हम चंदा जमा कर सरकार को मुआवजा देंगे. हताशा की चरम स्थिति लोगों पर इस क़दर हावी होने लगी है कि वे अब ऐसी दुआएं करने लगे हैं. उन्हें समझ में आने लगा है कि उनके (ग़रीबों-लाचारों) वोटों से बनी सरकार उनका कभी भला नहीं कर सकती है. यह काफी हद तक सही भी है, तभी तो लोग कहते नज़र आते हैं कि भारत के लोग वोटर नहीं होते और यहां चुनावी पर्व नहीं होते तो आम लोगों के लिए चुनाव जीतने के नाम पर जो कुछ भी जन-कल्याण का काम हो जाता है, वह भी नहीं होता. ज़रा नीति-नियंताओं की कारास्तानी देखिए जिस नक्सलवाद से देश जूझ रहे हैं, जिन परेशानियों ने लोगों को नक्सली बनने पर मजबूर किया, उस वजह पर कभी ध्यान नहीं देते. संपत्ति की विषमता संसाधनों का असमान वितरण. कोई करोड़ों रूपए की दौलत से अय्यासी की ज़िंदगी जी रहा है तो देश की 77 फ़ीसदी लोग हररोज़ महज 20 रूपए से भी कम पर अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. इन 77 फ़ीसदी में भी अधिकांश यदि सुबह की रोटी जुटा पाता है तो शाम के लिए उसे तरसना पड़ता है. यह सोचते-सोचते ही फिर सुबह हो जाती है कि उनके छोटे-छोटे बच्चे आज भी भूखे पेट रोते-बिलखते सो गए. इस तरह पिता का प्यार और मां की ममता हर रोज़ दम तोड़ती है. अपने लाडले को दो वक़्त की रोटी का फर्ज़ निभाने में. ऐसे में फाइव-स्टार और एसी की हवा खाने वाले इन ग़रीब मजलूमों की स्थिति में सुधार के कोई नीतियां बनाते हैं तो उसकी हक़ीक़त समझना कतई मुश्किल नहीं है. जब हवाई सफ़र में इकॉनमी क्लास में सफ़र करने वालों के लिए कैटल क्लास की संज्ञा दी जाती है तो इन ग़रीब और मजलूमों के लिए कैसी सोच और भावना होगी बताने की शायद ज़रूरत भी नहीं है.
हाल में, छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा ज़िला हो, या महाराष्ट्र का गढ़चिरौली इलाक़ा कत्लेआम का खेल यहां ख़ूब खेला गया. हम केवल इन्हीं इलाक़ों की बात क्यों करें, देखा जाए तो नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है, जहां नक्सलियों का तांडव सर चढ़ कर बोला रहा है. लोग इतने ख़ौफ़जदा हैं कि घर से निकलना भी उनके लिए जान गंवाने ले कम नहीं है. पुलिस प्रशासन पर नक्सलियों का क़हर इस क़दर आजकल टूट रहा है कि हर 10-15 दिन में कोई न कोई बड़ी वारदात सुनने को मिल ही जाती है, जिसमें पुलिस वाले थोक के भाव में मारे जा रहे हैं.

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