संदर्भः प्रेमचंद जयंती 31 जुलाई पर विशेष –

मुंशी प्रेमचंद की गाय

प्रमोद भार्गव

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी हैं ‘मुक्तिधन‘ इस कहानी का शीर्षक  गाय भी हो सकता था, क्योंकि कहानी गाय के इर्द-गिर्द घूमती है। आज कथित गो-रक्षा को लेकर बहुत हिंसक उत्पात देखने में आ रहे हैं। रक्षा को लेकर गाहे-बगाहे भीड़-तंत्र खड़ा हो रहा है, जो हत्या तक कर रहा है। देश  के भीतर विकसित हुई यह क्रूरता दलित और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का कारण बन रही है। कुछ लोग कह रहे हैं, भीड़ द्वारा हत्याओं का सिलसिला तब बंद होगा, जब गोमांस का सेवन और निर्यात बंद होगा। इन दुश्वारियों का हल और देश  को सहिष्णु लोकतंत्र बनाए रखने का निदान संविधान की भावना और कानून के राज में तलाशा  जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को  निर्देशित  किया है कि ‘भीड़ द्वारा की जा रही हत्या के विरुद्ध एक विशेष  केंद्रीय कानून लाए और देश में विधि सम्मत राज की स्थापना करे।

इस समय हमारे देश  में भ्रष्टाचार भगोड़ा, बालिकाओं से दुष्कर्म , तीन तलाक और अब भीड़ द्वारा हत्या आदि-इत्यादि सबका निदान संविधान की भावना और कानून की कठोरता में देखा जा रहा है। इन समस्याओं का संबंध और समाधान सांस्कृतिक समाजवाद और मनुष्यता से भी संभव है, इस विचार पर द्रष्टि नहीं डाली जा रही है। यह हमारी बौद्धिकता के क्षरण का प्रस्थान बिंदू है। किंतु प्रेमचंद और उनके बौद्धिक पात्रों में तब यह  द्रष्टि रतीय संविधान अस्तित्व में ही नहीं था, इसलिए उसकी भावना के अनुरूप कानून की पालना का तो सवाल ही नहीं उठता। आगे बढ़ने से पहले ‘मुक्तिधन‘ कहानी का सार जान लेते हैं।

यह कहानी लेन-देन यानी ब्याज का धंधा करने वाले दाऊदयाल और एक गाय-बछड़े के मालिक व दाऊदयाल के ऋणी रहमान से जुड़ी है। दाऊ एक तरह से डंडा-बैंक चलाने वाले साहूकार हैं, क्योंकि वे 25-30 रुपए सैंकड़ा की दर से ब्याज पर कर्ज देते हैं और तय दिनांक को नहीं चुकाने पर कारिंदों का भी इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद कचहरी में मुकदमा चलाने की घौंस भी उनका हथियार है। यह बात तो उनकी प्रवृत्ति की हुई जो उन्हें निश्ठुर ठहराती है। दूसरे पात्र हैं, रहमान, जो धर्म से मुसलमान हैं और पेशे  से कृषक  हैं। धन की जरूरत उन्हें अपनी प्रिय दुधारु गाय बेचने को विवश  कर देती है। सो रहमान गाय-बछड़े की पगहिया हाथ में पकड़े बाजार में खड़े हैं और खरीदार बोली लगा रहे हैं। लेकिन रहमान की अनुभवी आंखें ऐसे खरीददार की खोज में हैं, जो गाय को पाले और सेवा करे। इसी समय दाऊ मोहिनी-रूपा गऊ के निकट से गुजरते हैं और उनका मन ललचा जाता है। लोग 40 रुपए गाय का मूल्य लगा चुके हैं, लेकिन रहमान नहीं बेचता। दाऊ से मोलभाव के बाद 35 रुपए में सौदा तय हो जाता है। सौदे का लेन-देन हो जाने के बाद रहमान सस्ते में गाय का रहस्य उजागर करते हुए कहता है, ‘हजूर आप हिंदू हैं, इसे लेकर आप पालेंगे, इसकी सेवा करेंगे। ये सब कसाई हैं, इनके हाथ तो मैं 50 रुपए में भी कभी न बेचता। आप बड़े मौके से आ गए, नही तो ये सब जबरदस्ती गऊ छीन ले जाते। बड़ी बिपत में पड़ गया हूं सरकार, तब यह गाय बेचने निकला हूं। नही तो इस घर की लक्ष्मी को कभी नहीं बेचता। इसे अपने हाथों से पाला-पोसा है। कसाइयों के हाथ कैसे बेच देता ?‘ दाऊ का रहमान की बात सुनकर चकित होना स्वाभाविक था, क्योंकि उन्होंने गाय के सौदे में इतना घाटा उठाना तिलकधारी महात्माओं में भी नहीं देखा था।

खैर, कहानी आगे बढ़ती है और रहमान की बूढ़ी मां मरने से पहले हज यात्रा की इच्छा जताती है। मातृभक्ति से सराबोर, लाचार  मां की इच्छा को कैसे टाले, सौ 200 रुपए का कर्ज दाऊ से ही ले लेता है। हज से लौटते ही मां की मृत्यु हो जाती है। अब मृत आत्मा की शांति  के लिए जकात, फातिहे और कब्र बनवानी जरूरी थे, सो फिर सकुचता रहमान दाऊ की चैखट पर आ खड़ा हुआ। दाऊ कृपा करते हैं और 200 रुपए फिर दे देते हैं। इस तरह ब्याज समेत 700 रुपए का कर्ज रहमान पर चढ़ जाता है। इन सब झंझटों से मुक्त हुए रहमान की उम्मीद तब जागी, जब खेत में गन्ने की उम्दा फसल लहलहा गई। लेकिन कहावत है न कि जब आंख फूटनी होती है तो घर के गेंढ़े से ही फूट जाती है। सो यह कहावत भाग के मारे रहमान पर चरितार्थ हुई। खेत की रखवाली करते हुए जाड़े का अनुभव हुआ तो उसने तापने के लिए ईख के ही सूखे पत्तों को जला लिया। वक्त की मार पड़नी थी, सो पड़ी। हवा का झोंका आया और जलते पत्तों ने उड़कर खेत में आग लगा दी। सब किए किराए पर आग ने पानी फेर दिया। गांव वालों ने आग बुझाने की कोशिश भी की, लेकिन असफल रहे।

दाऊदयाल को अग्निकांड का पता चला तो लठैत भेजकर रहमान को तलब कर लिया। रहमान दैवी आफत सुनाता है और कौड़ी-कौड़ी चुकाने का भरोसा देता है। किंतु दाऊ दयालुता दर्शाते  हैं और सारा कर्ज माफ कर देते हैं। लेकिन कर्ज का बोझ लेकर मरना रहमान के लिए अनुचित है। तब दाऊ समझाते हैं, ‘तुमने उस वक्त पांच रुपए का नुकसान उठाकर गऊ मेरे हाथ बेची थी। वह शराफत मुझे याद है। उस अहसान का बदला चुकाना मेरी ताकत से बाहर है। जब तुम इतने गरीब और नादान होकर एक गऊ की जान के लिए पांच रुपए का नुकसान उठा सकते हो, तो मैं तुमसे सौगुनी रखकर अगर चार-पांच सौ रुपए माफ कर देता हूं तो कोई बड़ा काम नहीं कर रहा हूं। तुमने भले ही जानकर मेरे ऊपर कोई अहसान न किया हो, पर असल वह मेरे धर्म पर अहसान था। मैंने भी तुम्हें धर्म के काम के लिए ही रुपए दिए थे। बस हम तुम दोनों बराबर हो गए। तुम्हारे दोनों बछड़े मेरे यहां हैं, जी चाह लेते जाओ, तुम्हारी खेती में काम आएंगे।‘

रहमान दाऊ की बात सुनकर सोचता है,  मनुष्य उदार हो तो  फ़रिश्ता है और नीच हो तो शैतान। गोया रहमान बोला, ‘हजूर को इस नेकी का बदला खुदा देगा। मैं तो आज से अपने को आपका गुलाम ही समझूंगा।‘ दाऊ फिर नसीहत देते हैं, ‘गुलाम छुटकारा पाने के लिए जो रुपए देता है, उसे मुक्तिधन कहते हैं। तुम बहुत पहले मुक्तिधन अदा कर चुके। अब भूलकर भी यह शब्द को मुंह से न निकलना।‘ कहानी का इस संवाद के साथ अंत हो जाता है।

प्रेमचंद की यह कहानी आदर्शोन्मुख है, इसलिए इसे कल्पना की उड़ान कहा जाकर यथार्थ से परे कि संज्ञा दी जा सकती है। लेकिन जो समाज को पढ़ना जानते हैं, वे बाखूबी जानते हैं कि समाज परस्पर सहयोग, मैत्रीभाव और त्याग के बिना गतिषील रह ही नहीं सकता ? प्रेमचंद ऐसे बिरले कथाकार थे, जो समाज को पढ़ना जानते थे। इसीलिए उनका रचनाकर्म बौद्धिक जुगाली न होकर एक ऐसा मानवीय धर्म था, जो  रिश्ते  और आचरणों की सरंचना बुनता है। विडंबना है कि आज हमारी सोच तो आगे जा रही है, किंतु आचरण बिगड़ और पिछड़ रहा है। इसलिए संस्कार कुरूप होकर भीड़-हत्या और बच्चियों से  दुष्कर्म  के क्रूरतम रूपों में सामने आ रहे हैं। देश  की आजादी के इन 70 सालों में इन विद्रूपताओं को पोशित करने का काम उन राजनेताओं, व्यापारियों और नौकरशाहों ने भी किया है, जो कहने को हैं तो लोकसेवक हैं, किंतु लोकतंत्र के आवरण में उन्होंने, उन्हीं सामंती प्रावृत्तियों को ओढ़ लिया है, जो देश  को पराधीन करने का कारण बनी थीं। सामंतवाद का प्रत्यक्ष छद्म भले ही कमजोर हो गया हो, लेकिन बाजारवादी उपभोक्ता संस्कृति अंततः इसी समंती छद्म का नवीन संस्करण है। आर्थिक उदारवादी मूल्यों के औजारों ने सबसे खतरनाक काम मानवीय चेतना को दूशित करने का किया है। जबकि यह कहानी मानवीय चेतना के स्तर पर उनका गुणों को स्थापित करती है, जो मनुष्य  और उसकी मनुष्यता  को सुंदर, शील और उदार बनाते हैं।

कथित बहुपक्षीय राजनीति के खेबनहारों ने गाय को आज महज ‘गोमांस‘ के उत्पादन तक ठीक उसी तरह सीमित कर दिया है, जिस तरह उपभोक्तावादी विज्ञापन-संस्कृति ने स्त्री को भोग के लिए महज शरीर में रूपांतति कर दिया है। इसे किस कुरूप आक्रामकता के साथ भोगा जाए, इस हेतु गूगल और फेसबुक के सौदागरों ने नग्न फिल्मों को जंजाल में इंठरनेट पर परोस दिया है। नवजात बच्ची से लेकर वृद्धा से हो रहे  दुष्कर्म  इसी पोर्न संस्कृति की प्रष्ठभूमि  से उपज रहे हैं। चुनांचे, रहमान मुसलमान व इस्लाम धर्मावलांबी होने के पश्चात भी गाय का ऐसा स्वामी है, जो उसे लक्ष्मी मानता है और कसाइयों को ज्यादा कीमत मिलने के बावजूद नहीं बेचता है। इसीलिए उसकी अंतर्दृष्टि ‘दाम‘ नहीं ऐसा ग्राहक तलाशती हैं, जो गाय के उचित पालन-पोषण  का भाव रखता हो। रहमान की अनुभवी आंखों को चेहरे पढ़ने की समझ थी, इसलिए वह दाऊ का चेहरा पढ़ लेता है और अंततः कम मूल्य में उन्हीं को गाय बेचता है। आज तो इंसान इतना झूठा हो गया है कि कानून के दायरे में स्टांप पेपर पर किए अनुबंध को भी सर्वथा झुठला देता है और न्यायालय में दी जाने वाली चुनौती से घबराता भी नहीं है। गोया, कानून के राज पर ‘मुक्तिधन‘ कहानी में सनातनी संस्कार और धर्म के भय से जो ‘नैतिकता‘ निर्मित है, वह संविधान की भावना पर इक्कीस बैठती है।

प्रेमचंद किसी विचारधारा की संहिता से प्रेरित नहीं रहे। आयातीत पाश्चात्य विचारधाराओं ने भी उन्हें कदाचित आकर्षित  नहीं किया। उनके अपने संपूर्ण रचनाकाल में उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रेरणा का स्रोत स्वदेशी विचार रहा। ग्राम और किसान उनकी प्राथमिकता रहे। नगरीय सभ्यता से संबंध होने के बाद भी इसके मोहपाश  में वे कभी उलझे नहीं। आरंभ में दयानंद सरस्वती का उन पर प्रभाव रहा। इसमें दो मत नहीं कि हिंदू संस्कारों में गो-पूजा भी धर्म का एक हिस्सा है। गो-पूजा धर्म का भाग इसलिए भी है, क्योंकि गाय ही एक समय श त-प्रतिशत देश  की आबादी की आजीविका का प्रमुख साधन रही है। दूध देने के अलावा वह गाय ही है, जो खेती-किसानी के लिए सूघड़ बैलों को जन्मती है। गाय के महत्व को दयानंद सरस्वती ने समझा था, इसीलिए आर्य समाज के संस्थापक दयानंद ने गौ-रक्षा आंदोलन चलाया। जिसका विस्तार उत्तर-भारत में भी हुआ। दयानंद ने ‘गो-रक्षिणी‘ सभा का गठन किया और ‘गो-करुणानिधि‘ नाम से एक पर्चा भी निकाला। इसमें गाय के गुणों की प्रशंसा  के साथ गोकशी के विरुद्ध अनेक दलीलें दर्ज थीं। दरअसल दयानंद जैसे समाज-सुधारक भली-भांति जानते थे कि एक बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक समाज की अपनी जटिलताएं होती हैं। इसलिए गाय के सरंक्षण से जुड़ने के लिए दयानंद ने गो-रक्षिणी सभाओं का सदस्य बनने के लिए हर समुदाय और जाति को छूट दी थी। इससे प्रभावित होकर ही लाहौर से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘आफताब-ए-पंजाब‘ 6 सितंबर 1886 को और सियालकोट के समाचार-पत्र ‘वषीर-उल-मुल्क‘ 12 अक्टूबर 1886 को गोकशी रोकने की अपील की थी। शायद इसी आंदोलन से प्रभावित होकर प्रेमचंद ने ‘मुक्तिधन‘ कहानी लिखी है। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश ने के साथ परस्पर धर्म की रक्षा, सामुदायिक समरसता और आर्थिक विशमता की चैड़ी हुई खाई को भी पाटने का संदेश  दिया है।

जब गरीब और लाचार रहमान ऋणमाफी के रहस्य को समझ नहीं पाता तो दाऊ उसे मित्र के रूप में मददगार बनकर समझाते हैं, ‘तूने पांच रुपए घाटा उठाकर मुझे जो गाय बेची, उससे 800 रुपए का दूध मैं प्राप्त कर चुका हूं और नफा में दो बछड़े भी मेरे पास हैं। तुम अपने लाभ के लिए कसाईयों को गाय बेच देते तो गाय-बछड़े भी मारे जाते और मुझे जो इससे 800 रुपए का दूध मिला है, वह भी नहीं मिलता।‘ प्रेमचंद सामाजिक समरसता के लिए अर्थ के साथ धर्म के महत्व की भी समझ रखते थे, क्योंकि वह धर्म ही है, जो सभी धर्मावलंबियों के आचरण को अनुशासित रखते हुए त्याग की भावना को जगाए रखता है। इसलिए प्रेमचंद निसंकोच दाऊ से कहलाते हैं, ‘कसाईयों को गाय न बेचकर तुमने भले ही मुझ पर कोई अहसान न किया हो, पर असल में वह मेरे धर्म पर अहसान था और मैंने भी तुम्हें जो रुपए दिए थे, वे धर्म के लिए ही दिए थे। विपरीत धर्मावलांबियों के परस्पर एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करने का ऐसा अनूठा उदाहरण हिंदी कथा साहित्य में दुर्लभ है ? ब्याज तो ब्याज मूलधन का ब्याजी द्वारा यह परित्याग इस बात का भी संकेत है कि देश  में जो आर्थिक असमानता बढ़ रही हैं, उसे हम दूर, देश  के चंद लोगों के पास जो धन इकट्ठा हो गया है, उसके विकेन्द्रीकरण और समान वितरण से ही कर सकते हैं। अन्यथा संविधान के मूलभूत सिद्धांत में भले ही, न्याय, समता और अपरिग्रह की भावना अंतनिर्हित हो, उसे हम यथार्थ में जमीन पर उतार नहीं पाएंगे ? शायद इसीलिए विचारधराओं के नमूनों को नकारने वाले प्रेमचंद कहते थे, ‘असली बात विचारधारा नहीं हैं, बल्कि जन-जागरण है। अगर जनता जग जाएगी तो वह व्यवस्था के अलमबरदारों द्वारा पोशित निहित स्वार्थों का सामना कर सकेगी। वरना, उसके स्वतंत्र अस्तित्व को इन्हीं निहित स्वार्थों की भेंट चढ़ जाना होगा। प्रेमचंद का यह कहना आज सौ टका सच है, गो-धन जा तो उन कत्लखानों में रहा है, जिन्हें चलाने के लायसेंस सरकारों ने दिए हुए हैं, लेकिन बेमौत मारे वे जा रहे हैं, जो जाने-अनजाने में इन कत्लखानों को पशुधन अपनी आजीविका के लिए बेच रहे हैं। यथा, गोकशी वाकई रोकनी है तो इन कत्लखानों की तालाबंदी क्यों नहीं कर दी जाती ?

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