मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना : क्या होते हैं सांप्रदायिक दंगे ?

क्या होते हैं साम्प्रदायिक दंगे ?

वास्तव में दंगे किसी सम्प्रदाय विशेष की साम्प्रदायिक सोच के विरुद्ध भड़की हुई हिंसा होती है। जिसे कोई एक वर्ग जब सहन करने से इंकार कर देता है तो क्रोध बेलगाम होकर बाहर आ जाता है ।ऐसा ही हम आज भी देखते हैं। मेरठ जैसे जिन शहरों में रह-रहकर साम्प्रदायिक दंगे भड़कते हैं उनके पीछे के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि हिन्दुओं की बहन बेटियों को मुस्लिमों के लड़के अपनी गलियों से जब निकलना कठिन कर देते हैं और उनके विरुद्ध अभद्र व अशोभनीय व्यवहार करने तक उतर आते हैं तब किसी ना किसी हिन्दू युवक का खून खौल उठता है।
तब हम देखते हैं कि वह प्रतिशोध का भाव साम्प्रदायिक दंगे का रूप ले लेता है। कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के लोग इन साम्प्रदायिक दंगों को कुछ इस प्रकार व्याख्यायित और परिभाषित करते हैं कि जैसे दंगों में दोनों सम्प्रदायों में से हिन्दुओं का ही अधिक दोष था। इनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण सच सामने नहीं आ पाता , अन्यथा यदि सच को स्वीकार करने का साहस इनके भीतर हो तो स्पष्टत: प्रावधान किया जाए कि कोई भी सम्प्रदाय और विशेष रूप से मुस्लिम सम्प्रदाय हिंदूओं की बहन बेटियों के साथ किसी भी प्रकार का अशोभनीय व्यवहार नहीं करेगा और यदि ऐसा करता पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्यवाही होगी।

‘पीठ पर दाग’ का अभिप्राय

हम अपने हिन्दू समाज में आज भी एक मुहावरा प्रचलित होते हुए देखते हैं कि ‘मेरी पीठ पर दाग लगा हुआ है’। इसको हमारे हिन्दू समाज के लोग तब प्रयोग करते हैं जब कोई अपमानजनक घटना उनके साथ घटित हो गई होती है। उस अपमानजनक घटना का प्रतिशोध जब तक वह नहीं ले लेता है, तब तक उसे चैन नहीं आता है । वास्तव में यह मुहावरा अलाउद्दीन खिलजी के समय से प्रचलित है । अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार यह परम्परा स्थापित की थी कि यदि कोई हिन्दू शासक उसकी अधीनता स्वीकार कर लेता था तो उसके घोड़े की पीठ पर शाही दाग लगा दिया जाता था। जिससे कि यह पता चल जाए कि इस घोड़े पर बैठने वाला राजा अलाउद्दीन खिलजी का गुलाम है।
इस दाग को हमारे राजा और वीर योद्धा कभी भी सहज रूप में स्वीकार नहीं करते थे । वह इस दाग को मिटाने के लिए संकल्पित हो उठते थे । बाद में अन्य मुस्लिम शासकों के समय के लिए भारतीयों ने इसे एक मुहावरे के रूप में स्थापित कर लिया । यह मुहावरा वास्तव में हिन्दुओं का एक विकल्पविहीन संकल्प होता था। उस संकल्प की पूर्ति के लिए वह जीवन खपा देते थे। कहने का अभिप्राय है कि जिस हिन्दू समाज में पीठ पर लगे दाग को धोने की परम्परा बड़ी गहराई से पैठ जमाये बैठी हो ,उसमें मुस्लिमों के द्वारा किये गए किसी भी अपमानजनक व्यवहार को वे कैसे सहन कर सकते थे ? अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक अपमानजनक कार्यवाही से प्रतिरोध का लावा फूटता था, वही प्रतिरोध विद्रोह या साम्प्रदायिक दंगे का रूप ले लेता था। उनके इस भाव और भावना को इतिहास में सही ढंग से निरूपित नहीं किया है।
भारत में साम्प्रदायिक दंगे क्यों होते थे ? यदि इस पर निष्पक्षता से चिन्तन किया जाए और उस चिन्तन को बहुत ईमानदारी से इतिहास में स्थान दिया जाए तो भारत के बारे में यह तथ्य स्पष्ट हो जाएगा कि यहाँ पर जब से मुसलमान आए तब से साम्प्रदायिक दंगे आरम्भ हुए और यदि वे आज भी होते हैं तो उनके पीछे मुस्लिमों का हिन्दू समाज की बहन बेटियों के प्रति अपनाया जाने वाला दुर्व्यवहार मुख्य कारण होता है।

देश का भारी दुर्भाग्य

वास्तव में देश का दुर्भाग्य यह है कि जिस व्यभिचारी और हिंदू बहन बेटियों को अपमानित करने वाले अकबर को इस देश का महान शासक बताया जाता है, उसी का अनुसरण करने वाले आज के अकबरों को भी महानता प्राप्ति का चस्का लगा दिया गया है कि हिन्दू बहन बेटियों को उठाओ और अकबर की भांति महान कहलाओ।
अकबर के विषय में हमें यह भी पता चलता है कि अकबर द्वारा राजकुमार जयमल की हत्या के पश्चात जब उसकी वीरांगना पत्नी अपनी अस्मिता की रक्षार्थ घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही थी और जब उस सुन्दर वीरांगना पर व्यभिचारी अकबर की कुदृष्टि पड़ी तो अकबर ने रास्ते में ही पकड़ लिया।
शमशान घाट जा रहे उसके सगे सम्बन्धियों को वहीं से कारागार में सड़ने के लिए भेज दिया और राजकुमारी को अपने हरम में ठूंस दिया।

जिनके हरम में हजारों हिंदू ललनाएं थीं सड़ी,
सम्मान की रक्षार्थ जिनसे वीरांगनायें थी लड़ीं।
उन मुगलों के शासन को कैसे कहें आदर्श हम ?
देश धर्म की रक्षार्थ जिनसे हमारी सेनाएं थी भिड़ीं।।

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है-
*“अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थीं। शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था। वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी। अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी। कई बार सुन्दर लड़कियों को ले जाने के लिए लोगों में झगड़ा भी हो जाता था। एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”।
इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छीनने से बचाने के लिए इसकी कीमत देनी पड़ती थी , जिसे जजिया कहते थे।
वास्तव में जजिया कर भी उस समय हिन्दुओं के भीतर अपमान का भाव पैदा करने वाली शासन की एक ऐसी क्रूर नीति थी जिसे हिन्दू समाज ने कभी अपनाया नहीं। इस जजिया कर के प्रति भी हिन्दू सदा विद्रोही रहा। ऐसे अवसर भी आते रहे होंगे जब मुस्लिम अधिकारी हिन्दुओं से जजिया कर वसूलने के नाम पर अत्याचार करते होंगे और हिंदू उनका विरोध करते होंगे। तब ऐसी घटनाओं को लेकर भी कई बार साम्प्रदायिक दंगे भड़कते रहे होंगे।

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