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राष्ट्र की प्रगति में राष्ट्रीय भाषाओं की भूमिका

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· डॉ. अमरनाथ

पिछले कुछ वर्षों से देश भर की अधिकाँश राज्य सरकारें अपने-अपने प्रान्तों की प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा के माध्यम से मुक्त कर अंग्रेजी माध्यम में बदलने की होड़ मचा रखी हैं. सबसे पहले उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 2017 में ही अपने प्रदेश के पाँच हजार प्राथमिक विद्यालयों से हिन्दी को बाहर किया और माध्यम भाषा के रूप में अंग्रेजी लागू लिया. आंध्र प्रदेश की वाईएसआर सरकार ने तो अपने प्रदेश के सभी प्राथमिक विद्यालयों से बच्चों की मातृभाषा तेलुगू हटाकर उन्हें अंग्रेजी माध्यम में बदलने का आदेश निर्गत कर दिया. कुछ लोग इसके खिलाफ कोर्ट में गए और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. सबसे हास्यास्पद निर्णय राजस्थान की कांग्रेस सरकार का है. वहाँ के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत ने पूरे प्रदेश में जिस गाँव की भी आबादी पाँच हजार से अधिक है वहाँ महात्मा गाँधी के नाम पर “महात्मा गाँधी अंग्रेजी मीडियम स्कूल” खोला है, उन्हीं महात्मा गाँधी के नाम पर जिन्होंने ‘यंग इंडिया’ में लिखा है, “अगर मेरे हाथों में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही हमारे लड़के और लड़कियों की विदेशी माध्यम के जरिये दी जाने वाली शिक्षा बंद कर दूँ और सारे शिक्षकों और प्रोफेसरों से यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूँ या उन्हें बरखास्त कर दूँ. मैं पाठ्यपुस्तकों की तैयारी का इंतजार नहीं करूँगा. वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी.”

अपनी “भारत जोड़ो यात्रा” के दौरान राजस्थान से गुजरते हुए राहुल गाँधी ने बयान दिया कि, “हम चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के गरीब से गरीब किसान का बेटा एक दिन अमेरिका के युवाओं से कंपटीशन करे और वहाँ जाकर उसी की भाषा में उसे हराए.” उनके अनुसार देश के सारे गरीब किसानों के बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई जरूरी है क्योंकि उन्हें अमेरिका में जाकर वहाँ के युवाओं को उन्हीं की भाषा में हराना है. जिस देश के 80 करोड़ लोग मोदी सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुफ्त के राशन पर जिन्दा रहने को विवश हैं, उस देश की जनता को ऐसे सपने दिखाना बताता है कि ये राजनीतिज्ञ या तो जमीन से पूरी तरह कटे हुए हैं या इस देश की जनता को बेवकूफ बनाने में बिना किसी संकोच के किसी हद तक जा सकते हैं.

चकित करने वाली बात तो यह है कि अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने वाली, कविगुरु रवीन्द्रनाथ और ईश्वरचंद विद्यासागर की विरासत को वहन करने का दावा करने वाली प. बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलने शुरू कर दिए हैं. यानी, इस मुद्दे पर देश के सभी राजनीतिक दल लगभग एकमत हैं. इसके पीछे सभी का एक ही तर्क है कि अभिभावकों की यही माँग है. उनका कहना एक हद तक सही भी है. अभिभावक अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं और उन्हें विश्वास है कि अंग्रेजी माध्यम से ही उनका बच्चा लायक बन सकता है. फिर वे अंग्रेजी के पीछे क्यों न भागें ? प्रश्न यह है कि ऐसी कौन सी परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण अभिभावकों को अपनी संतानों का भविष्य सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में ही दिखायी देता है?

इस देश में अराजपत्रित कर्मचारियों के चयन के लिए कर्मचारी चयन आयोग (स्टाफ सलेक्शन कमीशन) सबसे बड़ा संगठन है. कुछ वर्षों में धीरे- धीरे इस संगठन की परीक्षाओं से हिन्दी को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. मैंने उसकी वेबसाइट पर जाकर देखा, अध्ययन किया तो सकते में आ गया. कंबाइंड ग्रेजुएट लेबल की परीक्षा जो तीन सोपानों में आयोजित होती है, उसके प्रत्येक सोपान में क्रमश: इंग्लिश कंप्रीहेंशन, इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड कंप्रीहेंशन तथा डेस्क्रिप्टिव पेपर इन इंग्लिश ऑर हिन्दी है. प्रश्न यह है कि जब आरंभिक दो सोपानों में इंग्लिश लैंग्वेज एण्ड कंप्रीहेंशन अनिवार्य है तो तीसरे सोपान में भला हिन्दी का विकल्प कोई क्यों और कैसे चुन सकता है? जाहिर है यहाँ हिन्दी का उल्लेख केवल नाम के लिए है. इसी तरह की व्यवस्था अधिकाँश परीक्षाओं की कर दी गयी हैं.

राजपत्रित अधिकारियों के चयन के लिए संघ लोक सेवा आयोग तथा विभिन्न राज्यों के लोक सेवा आयोग हैं. इन आयोगों में धीरे-धीरे ऐसे परिवर्तन किये जा रहे हैं जिससे भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले प्रतियोगी दौड़ से बाहर होते जाएँ. संघ लोक सेवा आयोग की 2009 की परीक्षा में जहाँ हिन्दी माध्यम के 25.4 प्रतिशत परीक्षार्थी सफल हुए थे वहाँ 2019 में यह संख्या घटकर मात्र 3 प्रतिशत रह गयी. पहले जहाँ टॉप टेन सफल अभ्यर्थियों में तीन-चार हिन्दी माध्यम वाले अवश्य रहते थे वहाँ 2019 में चयनित कुल 829 अभ्यर्थियों में हिन्दी माध्यम वाले चयनित पहले अभ्यर्थी का स्थान 317वाँ था.

प्रश्न यह है कि देश के लोक सेवकों को कितनी अंग्रेजी चाहिए ? उन्हें इस देश के लोक से संपर्क करने के लिए भारतीय भाषाएं सीखनी जरूरी है या अंग्रेजी ? उन्हें जनता के सामने अंग्रेजी झाड़कर उनपर रोब जमाना है या उन्हें समझाना- बुझाना ? उनके साक्षात्कार अंग्रेजी माध्यम से क्यों लिए जाते हैं ? क्या उन्हें इंग्लैंड में सेवा देनी है ? इस देश के सबसे बड़े पद तो राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और गृहमंत्री के है. इन पदों पर बैठे लोगों का काम तो हिन्दी और गुजराती बोलने से चल जाता है. ऐसे लोक सेवकों को लोक सेवा का अधिकार क्यों मिलना चाहिए जो लोक की भाषा में बोल पाने में भी अक्षम हों ?

न्याय के क्षेत्र की दशा यह है कि आज हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट से लेकर 25 में से 21 हाई कोर्टों में हिन्दी सहित किसी भी भारतीय भाषा का प्रयोग नहीं होता है. मुवक्किल को पता ही नहीं होता कि वकील और जज उसके केस के बारे में क्या सवाल- जवाब कर रहे हैं. उसे अपने बारे में मिले फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है और उसके लिए भी उसे पैसे देने पड़ते हैं.

प्रश्न यह है कि जब अफसर से लेकर चपरासी तक की सभी नौकरियाँ अंग्रेजी के बलपर ही मिलेंगी तो कोई अपने बच्चे को भारतीय भाषाएं पढ़ाने की भूल कैसे कर सकता है ? निस्संदेह हिन्दी और मलयालम पढ़ने से नौकरी मिलने लगे तो लोग हिन्दी और मलयालम पढ़ाएंगे.

वास्तव में व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु वह सोचता अपनी भाषा में ही है. हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में सोचने के लिए अनूदित करते हैं और लिखने के लिए फिर उन्हें दूसरे की भाषा में ट्रांसलेट करना पड़ता है. इस तरह हमारे बच्चों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है. इसीलिए मौलिक चिन्तन नहीं हो पाता. मौलिक चिन्तन सिर्फ अपनी भाषा में ही हो सकता है. पराई भाषा में हम सिर्फ नकलची पैदा कर सकते हैं. अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा सिर्फ नकलची पैदा कर रही है. जब अंग्रेज नहीं आए थे और हम अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते थे तब हमने दुनिया को बुद्ध और महावीर दिए, वेद और उपनिषद दिए, दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र दिए, चरक जैसे शरीर विज्ञानी और शूश्रुत जैसे शल्य-चिकित्सक दिए, पाणिनि जैसा वैयाकरण और आर्य भट्ट जैसे खगोलविज्ञानी दिए, पतंजलि जैसा योगाचार्य और कौटिल्य जैसा अर्थशास्त्री दिए. हमारे देश में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय थे जहाँ दुनिया भर के विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे. इस देश को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था जिसके आकर्षण में ही दुनिया भर के लुटेरे यहाँ आते रहे. प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा ने कहा है कि दुनिया के किसी भी देश की संस्कृति से मुकाबला करने के लिए अपने यहाँ के सिर्फ तीन नाम ले लेना ही काफी है- तानसेन, तुलसीदास और ताजमहल.

हमारे देश में लंबे समय तक हमारे देश की किसी भाषा को यथोचित सम्मान नहीं मिला. तुर्क पठान मुगल आदि जितनी जातियाँ बाहर से आईं उनके शासन की भाषा फारसी थी और इस देश में भी उन्होंने फारसी को ही शासन की भाषा बनाया. पूरे छ: सौ वर्ष तक भारत में शासन की भाषा फारसी थी और उसके बाद अंग्रेजी हो गयी. जबसे हमारे देश में फारसी और अंग्रेजी में शासन होने लगा तबसे हमारे देश का विकास अवरुद्ध सा हो गया.

वास्तव में किसी भी राष्ट्र की प्रगति वहाँ के मौलिक चिन्तन, सृजन और वहाँ के महान अनुसंधान कार्य पर निर्भर करती है और कोई भी महान अनुसंधान कार्य अपनी भाषाओं में ही संभव होता है. मुगल काल के दौरान फारसी भले ही शासन की भाषा रही हो, फारसी में एक भी मौलिक और महान कृति के सृजन की सूचना नहीं है. इसी दौर में तुलसी का ‘मानस’ अवधी में ही रचा गया और सूर का ‘सागर’ ब्रजी में, तानसेन ने अपनी तान हिन्दुस्तानी में ही छेड़ा और खुसरो ने हिन्दवी में. फारसी में भी रचा होगा उन लोगों ने जिनकी मातृ भाषा फारसी रही होगी. अंग्रेजों की गुलामी के दौर में भी हमारे देश के विश्वकवि रवीन्द्रनाथ को ‘गीतांजलि’ बांग्ला में लिखनी पड़ी और गाँधी को ‘हिन्द स्वराज’ गुजराती में. यहाँ रहने वाले अंग्रेजों को भी यहाँ के बारे में लिखने के लिए अपनी मातृ-भाषा का ही सहारा लेना पड़ा चाहे वे संस्कृत के विद्वान सर विलियम जोन्स हों या हिन्दुस्तानी के जॉन गिलक्रिस्ट अथवा जार्ज ग्रियर्सन.

जबतक हमारी शिक्षा, हमारी अपनी भाषाओं के माध्यम से नहीं होंगी तबतक गाँवों की दबी हुई प्रतिभाओं को मुख्य धारा में आने का अवसर नहीं मिलेगा. आजादी के बाद इस विषय को लेकर राधाकृष्णन आयोग, मुदालियर आयोग, कोठारी आयोग आदि अनेक आयोग बने और उनके सुझाव भी आये. सबने एक स्वर से यही संस्तुति की कि बच्चों की बुनियादी शिक्षा सिर्फ मातृ-भाषाओं में ही दी जानी चाहिए. दुनिया के सभी विकसित देशों में वहाँ की मातृ-भाषाओं में ही शिक्षा दी जाती है. मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि अपनी मातृ-भाषा में बच्चे खेल- खेल में ही सीखते हैं और बड़ी तेजी से सीखते हैं. उनकी कल्पनाशीलता का खुलकर विकास मातृ-भाषाओं में ही हो सकता है.

हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक “द इंग्लिश मीडियम मिथ” में संक्रान्त सानु ने प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आधार पर दुनिया के सबसे अमीर और सबसे गरीब, बीस -बीस देशों की सूची दी है. बीस सबसे अमीर देशों में हैं क्रमश: स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, जापान, यूनाइटेड स्टेट्स, स्वीडेन, जर्मनी, आस्ट्रिया, नीदरलैंड, फिनलैंड, बेल्जियम, फ्रांस, यू.के. आस्ट्रेलिया, इटली, कनाडा, इजराइल, स्पेन, ग्रीस, पुर्तगाल और साउथ कोरिया. इन देशों की जनभाषा ही सरकारी कामकाज की भी भाषा है और शिक्षा के माध्यम की भी. इसी तरह दुनिया के सबसे गरीब देश हैं क्रमश: काँगो, इथिओपिया, बरुंडी, सियेरा लिओन, मलावी, नाइजर, चाड, मोजाम्बीक, नेपाल, माली, बरकिना फासो, रवान्डा, मेडागास्कर, कंबोडिया, तंजानिया, नाइजीरिया, अंगोला, लाओस, टोगो और उगांडा. इन बीस देशों में से सिर्फ एक देश नेपाल है जहाँ जनभाषा, शिक्षा के माध्यम की भाषा और सरकारी कामकाज की भाषा एक ही है नेपाली. बाकी उन्नीस देशों में राजकाज की भाषा और शिक्षा के माध्यम की भाषा भारत की तरह जनता की भाषा से भिन्न कोई न कोई विदेशी भाषा है. ( द्रष्टव्य, द इंग्लिश मीडियम मिथ, पृष्ठ-12-13) इस उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है कि अंग्रेजी माध्यम हमारे देश के विकास में कितनी बड़ी बाधा है..

   जिस जापान की तकनीक और कर्ज के बल पर हमारे यहाँ बुलेट ट्रेन की नींव पड़ी है, उस जापान की कुल आबादी सिर्फ 12 करोड़ है. वह छोटे- छोटे द्वीपों का समूह है. वहाँ का तीन चौथाई से अधिक भाग पहाड़ है और सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्से में ही खेती हो सकती है. फिर भी वहाँ सिर्फ भौतिकी में एक दर्जन से अधिक नोबेल पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिक हैं. ऐसा इसलिए है कि वहाँ 99 प्रतिशत जनता अपनी भाषा ‘जापानी’ में ही शिक्षा ग्रहण करती है. इसी तरह इजराइल की कुल आबादी मात्र 83 लाख है और वहाँ 11 नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक हैं क्योंकि वहाँ भी उनकी अपनी भाषा ‘हिब्रू’ में शिक्षा दी जाती है. चीन भी उसी तरह का बहुभाषी विशाल देश है जिस तरह का भारत. किन्तु उसने भी अपनी एक भाषा चीनी ( मंदारिन) को प्रतिष्ठित किया और उसे वहाँ पढ़ाई का माध्यम बनाया. चीनी लिपि तो दुनिया की सबसे कठिन लिपियों में से है. वह चित्र-लिपि से विकसित हुई है. आज चीन जिस ऊँचाई पर पहुँचा है उसका सबसे प्रमुख कारण यही है कि उसने अपने देश में शिक्षा का माध्यम अपनी चीनी भाषा को बनाया.  इसी तरह अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, रूस आदि दुनिया के सभी विकसित देशों में वहाँ की अपनी भाषाओं क्रमश: अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी आदि में ही शिक्षा दी जाती है. इसीलिए वहाँ मौलिक चिन्तन संभव हो पाता है.

   भाषा के सवाल को लेकर हमें किसी भी मुगालते में नहीं रहना चाहिए. हमारे देश में अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा नहीं है वह सत्ताधारी वर्ग के हाथ में एक ऐसा हथियार है जिसके बलपर वे सत्ता पर काबिज हैं. ये ‘काले अंग्रेज’ ही आज के हमारे मालिक हैं और इनका उद्देश्य हमारे देश की प्रगति नहीं, मुनाफा कमाना और देश को लूटकर अपनी निजी संपत्ति का साम्राज्य खड़ा करना है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इन मालिकों का अपना कोई भी देश नहीं होता. जहाँ ये ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, वहीं अपना बसेरा बना लेते हैं.  इनकी राष्ट्र-भक्ति सिर्फ एक दिखावा और हमें भ्रमित करने का उपकरण मात्र है. विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, मेहुल चौकसी जैसे लोग हमें लूटकर विदेश में मौज कर रहे हैं और हमें ठेंगा दिखा रहे हैं. स्विस बैंकों में जमा हमारे देश की अकूत संपत्ति की सुरक्षा हर राजनीतिक दल कर रहे है. 

    गुलाम आदमी ही सोचता है कि मालिक की भाषा जानेंगे तो फायदे में रहेंगे. हमें इस सचाई को समझना होगा कि अपनी भाषा के माध्यम से ही किसी देश में मौलिक चिन्तन, अनुसंधान और नए- नए आविष्कार संभव हैं. इस तथ्य को बहुत पहले हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले भारतेन्दु ने परख लिया था और कहा था, “निज भाषा उन्न्ति अहै सब उन्नति को मूल.”

हमें यह भी समझना होगा कि अपनी भाषा की प्रतिष्ठा की लड़ाई व्यवस्था- परिवर्तन की लड़ाई का ही हिस्सा है. हम इस लड़ाई में अपनी सीमित भूमिका निभाने को भी तैयार है?

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