लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

संघी कार्यकर्ता और भक्त इन दिनों मुझसे नाराज हैं। जब मौका मिलता है अनाप-शनाप प्रतिक्रिया देते हैं। उनकी विषयान्तर करने वाली प्रतिक्रियाएं इस बात का सकेत है कि वे संघ के इतिहास और विचारधारा के बारे में सही बातें नहीं जानते हैं। उनकी इसी अवस्था ने मुझे गंभीरता के साथ संघ के बारे में तथ्यपूर्ण लेखन के लिए मजबूर किया है।

एक पाठक ने ईमेल के जरिए जानना चाहा है कि मैं मुसोलिनी-हिटलर के साथ आरएसएस की तुलना क्यों कर रहा हूँ? बंधु, सच यह है कि हेडगेवार के साथी बी.एस .मुंजे ने मुसोलिनी से मुलाकात की थी। संघ की हिन्दू शब्दावली में इसे आशीर्वाद लेना कहते हैं। इस संदर्भ में मुंजे की ऐतिहासिक डायरी को कोई भी पाठक नेहरू म्यूजियम लाइब्रेरी नई दिल्ली में जाकर फिल्म के रूप में देख सकता है।

आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार के जीवनी लेखक एस.आर.रामास्वामी ने लिखा है बी.एस.मुंजे ने ही जवानी के दिनों में हेडगेवार को अपने घर में रखा था। बाद में मेडीकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता भेजा था। मुंजे ने 1931 के फरवरी-मार्च महीने में यूरोप की यात्रा की, इस दौरान इटली में वे काफी दिनों तक रहे। ये सारे तथ्य उनकी डायरी में दर्ज हैं।

मुंजे की डायरियों में लिखे विवरण से पता चलता है कि वे 15 से 24 मार्च 1931 तक रोम में रहे। 19 मार्च को वे अन्य स्थलों के अलावा मिलिट्री कॉलेज, सेन्ट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ फिजिकल एजुकेशन तथा सर्वोपरि मुसोलिनी के हमलावर दस्तों के संगठन बेलिल्ला और अवांगार्द संगठनों में भी गए। उल्लेखनीय है मुसोलिनी के फासिस्ट कारनामों को अंजाम देने में इन संगठनों की सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका थी। मुंजे ने इन संगठनों का जैसा विवरण और ब्यौरा पेश किया है आरएसएस का सांगठनिक ढ़ाचा तकरीबन वैसा ही बनाया गया।

19 मार्च 1931 को दोपहर 3 बजे इटली सरकार के केन्द्रीय दफ्तर पलाजो वेनेजिया में मुसोलिनी की मुंजे से मुलाकात हुई। मुंजे ने इस मुलाकात के बारे में लिखा है ‘जैसे ही मैंने दरवाजे पर दस्तक दी, वे उठ खड़े हुए और मेरे स्वागत के लिए आगे आए। मैंने यह कहते हुए कि मैं ड़ा.मुंजे हूँ, उनसे हाथ मिलाया। वे मेरे बारे में सब कुछ जानते थे और लगता था कि स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष को बहुत निकट से देख रहे थे। गांधी के लिए उनमें काफी सम्मान का भाव दिखायी दिया। वे अपनी मेज के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए और लगभग आधा घंटे तक मुझसे बातें करते रहे। उन्होंने मुझसे गांधी और उनके आन्दोलन के बारे में पूछा और यह सीधा सवाल किया कि क्या गोलमेज सम्मेलन भारत और इंग्लैण्ड के बीच शांति शांति कायम करेगा। मैंने कहा, यदि अंग्रेज ईमानदारी से हमें अपने साम्राज्य के अन्य हिस्सों की तरह समानता का दर्जा देता हैं तो हमें साम्राज्य के प्रति शांतिपूर्ण और विश्वासपात्र बने रहने में कोई आपत्ति नहीं है अन्यथा संघर्ष और तेज होगा,जारी रहेगा। भारत यदि उसके प्रति मित्रवत् और शांतिपूर्ण रहता है तो इससे ब्रिटेन को लाभ होगा और यूरोपीय राष्ट्रों में वह अपनी प्रमुखता बनाए रख सकेगा। लेकिन भारत में तब तक ऐसा नहीं होगा जब तक उसे अन्य डोमीनियंस के साथ बराबरी की शर्त पर डोमीनियन स्टेट्स नहीं मिलता। सिगमोर मुसोलिनी मेरी इस टिप्पणी से प्रभावित दिखे। तब उन्होंने मुझसे पूछा कि आपने विश्वविद्यालय देखा? मैंने कहा मेरी लड़कों के सैनिक प्रशिक्षण के बारे में दिलचस्पी है और मैंने इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा जर्मनी के सैनिक स्कूलों को देखा है, मैं इसी उद्देश्य से इटली आया हूँ तथा आभारी हूँ कि विदेश विभाग और युद्ध विभाग ने इन स्कूलों में मेरे दौरे का अच्छा प्रबंध किया। आज सुबह और दोपहर को ही मैंने बलिल्ला और फासिस्ट संगठनों को देखा है और उन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया। इटली को अपने विकास और समृद्धि के लिए उनकी जरूरत है। मैंने उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं देखा जबकि अखबारों में उनके बारे में बहुत कुछ ऐसा पढ़ता रहा हूँ जिसे मित्रतापूर्ण आलोचना नहीं कहा जा सकता।’’

मुसोलिनी ने जब फासिस्ट संगठनों के बारे में मुंजे की राय जानने की कोशिश की तो मुंजे ने शान के साथ कहाः ‘‘महामहिम, मैं काफी प्रभावित हूँ, प्रत्येक महत्वाकांक्षी और विकासमान राज्य को ऐसे संगठनों की जरूरत है।भारत को उसके सैनिक पुनर्जागरण के लिए इनकी सबसे अधिक जरूरत है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन में भारतीयों को सैनिक पेशे से अलग कर दिया गया है। भारत इपनी रक्षा के लिए खुद को तैयार करने की इच्छा रखता है। मैं उसके लिए काम कर रहा हूँ। मैंने खुद अपना संगठन इन्हीं उद्देश्यों के लिए बनाया है। इंग्लैण्ड या भारत, जहाँ भी जरूरत पड़ेगी आपके बल्लिला और अन्य फासिस्ट संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक मंच से आवाज उठाने में मुझे कोई हिचक नहीं होगी। मैं इनके अच्छे भाग्य और पूर्ण सफलता की कामना करता हूँ।’’

बी.एस.मुंजे ने जिस बेबाकी के साथ फासिज्म और उसके संगठनों की प्रशंसा की है उससे मुसोलिनी और फासीवादी संगठनों के साथ आरएसएस के अन्तस्संबंधों पर पड़ा पर्दा उठ जाता है।

भारत लौट आने के बाद मुंजे ने पुणे से प्रकाशित ‘मराठा’ नामक अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘वास्तव में नेताओं को जर्मनी, बलिल्ला और इटली के फासिस्ट संगठनों का अनुकरण करना चाहिए। मुझे लगता है कि भारत के लिए वे सर्वथा उपयुक्त हैं। यहाँ की खास परिस्थिति ने अनुरूप उन्हें अपनाना चाहिए। मैं इन आंदोलनों से भारी प्रभावित हुआ हूँ और अपनी आँखों से पूरे विस्तार के साथ मैंने उनके कामों को देखा है।’’

आरएसएस के संस्थापकों में से एक बी.एस मुंजे की डायरी के उपर्युक्त अंश आरएसएस के कई मिथों और झूठ को नष्ट करते हैं। मसलन् इससे यह झूठ नष्ट होता है कि संघ का मुसोलिनी और फासीवादी संगठनों के साथ कोई संबंध नहीं है। दूसरा यह झूठ खंडित होता है कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है। तीसरा यह झूठ नष्ट होता है कि संघ की राजनीति में दिलचस्पी नहीं है, वह अ-राजनीतिक संगठन है। चौथा यह झूठ खंडित होता है कि संघ में सिर्फ हिन्दू संस्कृति की शिक्षा दी जाती है।

सच यह है कि संघ का समूचा ढ़ांचा फासीवादी संगठनों के अनुकरण पर तैयार किया गया है। उसका हिन्दू संस्कृति से कोई संबंध नहीं है।

16 Responses to “आरएसएस का हिंदुत्‍व से नहीं, फासीवाद से संबंध”

  1. ateet

    Chaturvedi tum ko achi se chamchagiri kr rahe ho aur apne namak ka karj utar rahe ho lekin kabhi aapne aap se janane ki kosis jarur karna ki kya ye sahi hai baki “tum”samjhdaar ho , aapko “tum” shabd use kh raha hu kyonki aap ki aukat respect dene wali nahi h

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  2. सिद्धार्थ

    फासीवाद का मतलब ही राष्ट्र वाद होता है लेख सही है लेकिन वामपंथी लोग रास्ट्रवाद को छूट का रोग समझ कर दूरी बना कर रखते हैं

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  3. vimlesh

    जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

    परिचय ही काफी है लेख पड़ने की जरूरत नहीं है चाचा नेहरू के परम प्रिय भतीजे श्री जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी नेहरू के पोते तोल रहे है माफ़ करना परपोते (युवराज जी को ) को पोस रहे है जिससे की वे निष्कंटक हो कर देश को बेच सके .जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी बेचारे नमक का हक़ अदा कर रहे है .

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      मैं तो यहाँ आपकी टिपण्णी पढ़ने आता हूँ.
      यह “चतुर” अधिक है, “वेदी” कम.

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  4. kailash kalla

    आपका परिचय ही आपकी मानसिकता का प्रमाण है.आप की जो प्रेरणा के स्रोत हैं और जिनके लिए आप जैसे अधूरे लोग प्रेरणा हैं वास्तव में उनकी निष्ठां सदैव इस देश से बहार ही रही है.आप किसकी कृपा से प्रोफ़ेसर बने है और क्या करने के लिए बने हैं कुछ तथ्य अपने परिचय में भी जोड़ना.मैं ऐसा नहीं कहूँगा की आप संघ को नहीं जानते हो बल्कि अच्छी तरह से जानते हो इसीलिए तो अपनी कुंठा प्रकट कर रहे हो.रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और महान क्रन्तिकारी सुभाष बॉस के बारे में भी आपकी जमात ने कैसा अनर्गल प्रलाप किया था और उसका क्या परिणाम आया था वो भी आप जानते हैं इसलिए संघ जे बारे में भी लिखते रहो परिणाम आप भी जानते हो. सारा समाज जनता है कि राष्ट्र भक्तों का उपहास और राष्ट्रद्रोहीयों की चरणवंदना आपका इतिहास रहा है.

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  5. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    *****भारत, भारतीयता से घबराने वालों के लिए******

    सन 1750 के बाद तक भी यूरोपीय देश लुटेरे थे और भुखमरी का शिकार थे. सैंकड़ों नहीं हज़ारों पृष्ठों के प्रमाण है जिनसे पता चलता है कि भारत को अंधाधुँध लूटने के बाद ब्रिटेन आदि देश समृद बने. आज भी ये लोग साफ़-सुथरे शहरों और विशाल भवनों के स्वामी इमानदारी से नहीं लूट के कारण हैं. ऐसे अमानवीय व्यवहार और व्यापार की जड़ें इनकी बर्बर अपसंस्कृति की ही उपज है.
    सवाल यह उठता है कि ऐसे लोग संसार के परदे पर केवल भारत में ही क्यों हैं जो अपने देश कि प्रशंसा से गौरवान्वित अनुभव नहीं करते, अपनी संस्कृति की प्रशंसा से वे रोमांचित नहीं होते, आनंदित नहीं होते. पश्चिमी देशों की आलोचना से उन्हें कष्ट होता है, पश्चिम की प्रशंसा उन्हें भाति है,स्वाभाविक लगती है, पर भारत कि आलोचना इन्हें परेशान नहीं करती, ऐसा क्यों?
    इसका एक ही अर्थ है कि मैकाले कि जीत हुई है, उसकी योजना सफल हो गई है. भारत को लूटनें के रास्ते में गौरव से भरे भारतीय ही तो बाधा थे. झूठे इतिहास के हथियार से भारतीयों को इतना बौना बनादिया कि अब वे अपने देश और संस्कृति की आलोचना, अपमान से ज़रा भी विचलित नहीं होते.

    करतार जी , समझदार को इशारा ही काफी होता है, आप तो विचारशील और विद्वान् हैं, बहुतकुछ थोड़े में ही समझ जायेंगे. सन 1835 की दो फ़रवरी को ‘टी बी मैकाले’ ने ब्रिटेन की संसद में कहा कि—————–
    ” मैंने दूर-दूर तक भारत की यात्राएं की हैं पर मुझे एक भी चोर या भिखारी नहीं मिला. ये लोग इतने चरित्रवान हैं, इतने अमीर हैं, इतने बुद्धिमान हैं कि मुझे नहीं लगता की हम कभी इन्हें जीत पाएंगे, जबतक कि हम इनकी रीड की हड्डी नहीं तोड़ देते जोकि इनकी संस्कृति और सभ्यता है. इसलिए मेरा सुझाव है कि हम इनकी शिक्षा को बदल डालें. तब ये अपनी संस्कृति ,गौरव को भूलकर हमें श्रेष्ठ मानने लगेंगे और वह बन जायेंगे जो हम इन्हें बनाना चाहते हैं, एक सही अर्थो में पराजित राष्ट्र ” महामहिम राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम आज़ाद द्वारा यह कथन उधृत किया गया था.
    अब आप ही बताएं कि भारत का सच क्या है और हम जानते क्या हैं ? दुनियां के किसी भी देश का कोई भी नागरीक बतलाएं जो अपने देश की आलोचना का एक भी शब्द सहन करे, अपने देश कि प्रशंसा पर हमारी तरह कष्ट अनुभव करे. दूसरे देश की आलोचना पर दुखी होनेवाला व्यक्ति भी भारत के इलावा और कहाँ मिलना है. जापान में मिलता पर उन्होने अंग्रेजों से आज़ादी पाते ही कॉन्वेंट स्कूलों को यह कहकर बंद करदिया कि इनमें देशद्रोह की शिक्षा दिजाती है. वहाँ नेहरु जी जैसे समझदार होते तो जापानी भी अपने देश, संस्कृति की आलोचना करते -सुनते होते.

    एक सूत्र का प्रयोग करके हम जान सकते हैं कि हम मैकाले की योजना का शिकार बनकर अपने देश और संस्कृति के दुश्मन बने हैं या नहीं.

    ‘ अपने देश, संस्कृति, महापुरुषों, श्रधा केन्द्रों की प्रशंसा सुनकर हमारे रोंगटे खड़े होते हैं या नहीं, हम आनंदित होते हैं या नहीं ?
    अपने देश, धर्म, संस्कृति, बलिदानियों, पुराण-पुरुषों की आलोचना से हमारा रक्त खौलने लगताहै, हम आवेश– क्रोध से भर उठते हैं या नहीं? यदि नहीं तो इस कटु सच्चाई को जानलें, मानलें कि हम देश द्रोही बन चुके हैं, चाहे अनजाने में ही सही. हम मैकाले की कुटिलता का शिकार बनकर , भारत को समाप्त करनें का हथियार बन चुके हैं. अब ऐसा ही रहना है या सच को जानकर मैकाले के कुटिल चुंगल से निकलना है ? इसका फैसला स्वयं करलें.

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    यही तो अंतर है सकारात्मक और नकारात्मक सोच का. पश्चिमी जगत सृष्टि में द्वन्द-संघर्ष, प्रतियोगिता देखता है, शत्रुता देखता है. भारतीय सोच इसके विपरीत प्रकृति में पूरकता, सहयोग, सामजस्य देखती है. घृणा और संघर्ष का कारन पश्चिमी विचारधाराएं हैं न की भारतीय सोच.
    सच की सच्ची चाहत है तो गहराई से अध्ययन करना ही पड़ेगा, उथली जानकारी के दम पर तो भटकते ही रह जायेंगे, कभी किनारे नहीं लगेंगे.
    पश्चिम की वामपंथी, दक्षिण पंथी विचारधाराएँ अनास्तिक और अमानवीय हैं. मनुष्य को पशुता की और लेजनेवाली हैं. पर आप इसे नहीं मानेंगे. अतः अछा तो यही होगा कि कुछ साहित्य का अध्ययन कर लें. भारत और भारतीय संस्कृति को बहुत थोड़े में समझना हो तो दीनदयाल जी का ‘एकात्म मानव वाद’ बिना पूर्वाग्रह के ध्यान से पढ़ लें. बढ़ा समाधान मिलेगा,सुख मिलेगा, अनेकों अनसुलझे प्रश्न हल होजाएंगे.
    विश्ववास करिए कि भारतीय संस्कृति कि गहराइयों में उतरने लगेंगे तो सारे संसार के दर्शन फीके लेगने लगेंगे. हाद्दिक शुभ कामनाएं !

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  7. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    हैरान करनेवाला और विडम्बनापूर्ण है कि ‘राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ’ जैसे देशभक्त, सांस्कृतिक संगठन पर अनाप- शनाप आरोप, निरंतर मीडिया आक्रमण चलते ही रहते हैं. ज़रा स्मरण करके बतलाइये तो सही कि संघ ने अपनी स्थापना से आजतक ८५ साल में कितने हत्याकांड किये हैं, कितने और कौन-कौनसे देशद्रोह के काम किये हैं, कब छुआ-छूत का (वर्ण व्यवस्था के साथ घालमेल न करें), अस्पृश्यता का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन किया है?
    धन्य हैं ये लेखक जो पूर्वाग्रहों से भरे हैं और सफ़ेद को काला साबित करने में ही अपनी लेखनी को धन्य मान रहे हैं, स्वयं को बुद्धिमान समझ रहे हैं. अरे महानुभावो बताओ तो कि संघ की कटु आलोचना करने वालों में से कितनों के खिलाफ फतवा जारी हुआ, कितनों कि ह्त्या हुई, कितनों को देश छोड़ कर भागना पडा ? कला के नाम पर १०० करोड़ के अराध्य देवों के नग्न चित्र बनाने वाले की बात करने कि समझदारी तो शायद आप नहीं करेंगे?
    बुरा ना मानें, अगर आपकी बुधि पर पूर्वाग्रह का पर्दा नहीं पडा हुआ, यदि आप सचमुच अपनी बुधी का इस्तेमाल करते हैं, आप इमानदार सोच रखते हैं तो क्यों नहीं देखते कि —————
    -भारत को दो टुकड़ों मैं बांटने वाली, देश को तोड़ने के लिए १० लाख से अधिक की ह्त्या की जिम्मेवार कौनसी ताकतें हैं? क्या वे ही सांप्रदायिक ताकतें आज भी देश में हिंसा नहीं फैला रहीं,हमारे हज़ारों नागरिकों और सैनिकों कि ह्त्या नहीं कर रहीं? आप में साहस है, आपकी कलम मैं ताकत है, आप इमानदार हैं तो उनके खिलाफ लिख कर दिखाओ. पर फतवा जारी होने से डर लगता है न? अतः ऐसे लेखकों का सारा पौरुष , सारा कलमी जौहर संघ के खिलाफ
    प्रकट होता है, क्योकि वहाँ कोई ख़तरा नहीं है. इससे देश के दुश्मनों को ताकत मिले तो मिले ,इनकी बला से. वाहवाही तो मिलती है न. अडिगा को मिला बुकर पुरस्कार (व्हाइट टाइगर पर) इसका जीता- जागता प्रमाण है. भारत, भारतीय संस्कृति, भारत-भक्त संगठनों को गाली दो, उन्हें जैसे- तैसे बदनाम करो और देश के दुश्मनों से शाबाशी पाओ, सम्मान और पुरस्कार पाओ. अनेकों लेखक भेड़ चाल में, अनेकों बिक कर और कई केवल अनजाने में इसी राह पर चल रहे हैं.
    भाई मेरे अगर संघ फ़ासी संगठन होता तो खिलाफत करने वाले जादू कि तरह गायब होते, उनका अस्तित्व ढूंढे न मिलता, इतना समझते हो या नहीं.
    कमाल करते हैं ये आलोचक .कोई किसी से मिलगया तो क्या इसका मतलब यह होगया कि वह उसी विचार का निश्चित रूप से हो गया. ख़ास सन्दर्भ में, खास अवसर पर की तारीफ़ सर्व कालिक हो गई, सम्पूर्ण संगठन या व्यक्ति के व्यक्तित्व कि परिचायक हो गई ?
    यूँ तो कहते हैं कि सोनिया जी के पिता इटली के फासिस्टों के संपर्क में थे.तो क्या आपने सोनिया जी को फासिस्ट करार देने का साहस किया ? राजीवगांधी का संपर्क लिट्टे से बना था तो ? भारत के कई केन्द्रीय मंत्री देश के दुश्मन देशों कि भी यात्रा करते और उनसे मिलते-जुलते हैं तो क्या वे सब उनके साथी होगये.
    देश कि आज़ादी की संभावनाएं तलाशते हुए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तोजो से मिले थे और उसके समर्थक व प्रशंसक भी बने. तोक्या वे देशभक्तनहीं रहे ? सन्दर्भ से काटकर किसी एक अंश के मनमाने अर्थ लगाना तो सही नहीं है.
    अतः संघ के बारे में कुछ कहने-लिखने से पहले उसके बारे में गहराई और विस्तार से जानना इमानदारी का, नैतिकता का तकाजा है,अगर ये (नैतिकता और इमानदारी) लिखने वाले के पास हो तो .
    कृपया संघ साहित्य का आंशिक,अधूरा नहीं सांगोपांग अध्यन करें. तभी संघ पर लेखनी उठाने काऔचित्य है. संग को समझने,पूर्वाग्रहों को तोड़ने में सहायक होनेवाली कुछ सामग्री मिली है, कृपया पढ़ लें और सोचें कि इतने उत्तम काम करने कि प्रेरणा संघ के कार्यकर्ता/संगठन को कैसे मिलती है.
    सप्रेम,शुभकामनाओं सहित आपका अपना,

    RSS
    Liberation of Dadra and Nagar Haveli and Goa
    Main article: Liberation of Dadra and Nagar Haveli
    After the Independence of India, many organizations including the RSS aspired to liberate Dadra and Nagar Haveli from Portuguese occupation. In early 1954, volunteers Raja Wakankar and Nana Kajrekar of the RSS visited the area round about Dadra and Nagar Haveli and Daman several times to study the topography and also to get acquainted with the local workers who were agitating for the liberation. In April 1954, the RSS formed a coalition with the National Movement Liberation Organization (NMLO), the and Azad Gomantak Dal (AGD) for the liberation of Dadra and Nagar Haveli[35]. On the night of 21 July, United front of Goans, a group, working independently of the coalition, captured the Portuguese police station at Dadra and declared Dadra as free. Subsequently on 28 July, volunteer teams of the RSS and AGD captured the territories of Naroli and Phiparia and ultimately the capital of Silvassa. The Portuguese forces which escaped and moved towards Nagar Haveli, were assaulted at Khandvel and were forced to retreat till they surrendered to the Indian border police at Udava on 11 August 1954. A native administration was setup with Appasaheb Karmalkar of NMLO as the Administrator of Dadra and Nagar Haveli on 11 August 1954[36].
    The liberation of Dadra and Nagar Haveli gave a boost to the freedom movement against the Portuguese in Goa[36]. In 1955, RSS leaders demanded the end of Portuguese rule in Goa and its integration into India. When Prime Minister of India, Jawaharlal Nehru refused to obtain it by armed intervention, RSS leader Jagannath Rao Joshi led the satyagraha agitation straight into Goa itself. He was imprisoned with his followers by the Portuguese police. The peaceful protests continued but met with severe repressions. On 15 August 1955, the Portuguese police opened fire on the satyagrahis, killing thirty or so people[37].
    Role during the 1962 China-Indian War
    The RSS which had been keeping low profile after the lifting of the ban, earned recognition based on its volunteer work during the China-Indian War in 1962[38]. RSS was invited by Prime Minister Jawaharlal Nehru to take part in the Indian Republic day parade of 1963[39]. It along with several other civilian organizations took part in the parade[40]. This event helped the RSS increase its popularity and its patriotic image.[41][42][43]
    Later in 1965 and 1971 Indo-Pak wars too, the RSS volunteers offered their services to maintain law and order of the country and were apparently the first to donate blood.[44]
    Movement for the restoration of democracy
    In 1975, the Indian Government under the Prime Minister Mrs. Indira Gandhi, proclaimed emergency rule in India, thereby suspending the fundamental rights and curtailing the rights of the press.[45] This extreme step was taken after the Supreme Court of India, cancelled her election to the Indian Parliament on charges of malpractices in the election[45]. The democratic institutions were kept under suspended animation and prominent opposition leaders including Gandhian Jayaprakash Narayan, were arrested and thousands of people were detained without any charges being framed against them.[46] RSS, which was seen close to opposition leaders, and with its large organizational base was seen to have potential of organizing protests against the Government, was also banned.[47] Police clamped down on the organization and thousands of its workers were imprisoned.[17]
    The RSS defied the ban and thousands participated in Satyagraha (peaceful protests) against the ban and against the curtailment of fundamental rights. Later, when there was no letup, the volunteers of the RSS formed underground movements for the restoration of democracy. Literature that was censored in the media was clandestinely published and distributed on a large scale and funds were collected for the movement. Networks were established between leaders of different political parties in the jail and outside for the coordination of the movement[48]. ‘The Economist’, London, described the movement as “the only non-left revolutionary force in the world”. It said that the movement was “dominated by tens of thousands of RSS cadres, though more and more young recruits are coming”. Talking about its objectives it said “its platform at the moment has only one plank: to bring democracy back to India”[49]. The Emergency was lifted in 1977 and as a consequence the ban on the RSS too was lifted.
    Participation in land reforms
    It has been noted that the RSS volunteers participated in the Bhoodan movement organized by Gandhian leader Vinobha Bhave. Vinobha Bhave had met the RSS leader M. S. Golwalkar in Meerut in November 1951. Golwalkar had been inspired by the movement that encouraged land reforms through voluntary means. He pledged the support of the RSS for this movement[50]. Consequently, many RSS volunteers led by Nanaji Deshmukh participated in the movement.[6]. But Golwalkar has also been critical of the Bhoodan movement, on other occasions for being reactionary and for working “merely with a view to counteracting Communism”. He believed that the movement should inculcate a right and positive faith in the masses that can make them rise above the base appeal of Communism[51].
    Social reform
    The RSS has advocated the training of Dalits and other backward classes as temple high priests (a position traditionally reserved for Caste Brahmins and denied to lower castes). They argue that the social divisiveness of the Caste system is responsible for the lack of adherence to Hindu values and traditions and reaching out to the lower castes in this manner will be a remedy to the problem[65]. The RSS has also condemned ‘upper’ caste Hindus for preventing Dalits from worshipping at temples, saying that “even God will desert the temple in which Dalits cannot enter”[66]
    Christophe Jaffrelot finds that “there is insuficient data available to carry out a statistical analysis of social origins of the early RSS leaders” but goes on to conclude, based on some known profiles that most of the RSS founders and its leading organisers, with exceptions were Maharashtrian Brahmins from middle or lower class[67] and argues that the pervasiveness of the Brahminical ethic in the organisation was probably the main reason why it failed to attract support from the low castes. He argues that the “RSS resorted to instrumentalist techniques of ethno-religious mobilisation – in which its Brahminism was diluted – to overcome this handicap.”[68] However Anderson and Damle 1987, find that members of all castes have been welcomed into the organisation and are treated as equals[6].
    During M. K. Gandhi’s visit to RSS Camp accompanied by Mahadev Desai and Mirabehn at Wardha in 1934, he was surprised by the discipline and the absence of untouchability in RSS and commented “When i visited the RSS Camp. I was very much surprised by your discipline and absence of untouchablity “. He personally inquired to Swayamsevaks and found that they were living and eating together in the camp without bothering to know their castes.[69]
    Dr Bhimrao Ambedkar while visiting the RSS camp at Pune in 1939 observed that Swayamsevaks were moving in absolute equality and brotherhood without even caring to know the cast of others.[70] In his address to the Swayamsevaks, he said that ” This is the first time that I am visiting the camp of Sangh volunters. I am happy to find absolute equality between Savarniyas (Upper cast) and Harijans (Lower cast) without any one being aware of such difference existing.” When he asked Dr Hedgewar whether there were any untouchables in the camp, he replied that there are neither “touchables” nor “untouchables” but only Hindus[71].
    Relief and rehabilitation
    Main article: Seva Bharati
    Natural calamities
    RSS has participated in many relief activities during natural calamities. For instance, in the 2001 Gujarat earthquake, Indian newsmagazine Outlook’s reporter Saba Naqvi Bhaumik reported that:
    “Literally within minutes RSS volunteers were at the scenes of distress. Across Gujarat, the (RSS) cadres were the saviors. Even as the state machinery went comatose in the first two days after the quake, the cadre-based machinery of the Sangh fanned out throughout the state. Approximately 35,000 RSS members in uniform were pressed into service.”
    – Saba Naqvi Bhaumik, Outlook, Feb 12, 2001
    “This is an old tradition in the RSS. To be the first at any disaster strike: floods, cyclone, drought and now quake. In Kutch, too, the RSS was the first to reach the affected areas. At Anjar, a town in ruins, the RSS was present much before the Army took the lead in finding survivors and fishing out the dead.”
    – K. Srinivas, District collector of Ahmedabad
    India-Today, reported in its Feb. 12, 2001 issue that
    “It is conceded by even their worst detractors that the RSS has been in the forefront of the non- official rescue and relief (operations). This has led to an upsurge of goodwill for the Sangh”
    – India Today
    The RSS assisted in relief efforts quite extensively during the 2001 Gujarat earthquake. They helped rebuild villages.[72] They “earned kudos” from many varied agencies and sources for their actions.[73]
    This is a long and continuous tradition with the RSS. The RSS was instrumental in relief efforts after the 1971 Orissa Cyclone and the 1977 Andhra Pradesh Cyclone.[73]
    An RSS-affiliated NGO, Seva Bharati, has adopted 57 children (38 Muslims and 19 Hindus) from militancy affected areas of Jammu and Kashmir to provide them education at least up to Higher Secondary level[74][75]. They have also taken care of many victims of the Kargil War of 1999.[76]
    Seva Bharati conducted relief operations in the aftermath of the 2004 Indian Ocean earthquake. Activities included building shelters for the victims, providing food, clothes and medical necessities.[77]. The RSS assisted relief efforts during the 2004 Sumatra-Andaman earthquake and the subsequent tsunami.[78].
    In 2006, RSS participated in relief efforts to provide basic necessities such as food, milk and potable water to the people of Surat, Gujarat who were affected by massive floods in the region[79].
    The RSS volunteers carried out massive relief and rehabilitation work after the floods ravaged North Karnataka and some districts of the state of Andhra Pradesh.[80]
    Protection of Sikhs during the 1984 anti-Sikh riots
    Sikh intellectual and author of ‘A History of the Sikhs’, Khushwant Singh, credits members of the RSS with helping and protecting Sikhs who were being targeted by members of the Congress(I) political party during the 1984 Anti-Sikh Riots.[81] Singh who otherwise has been critical of the RSS and believes that it is a ” communal organization and dangerous to the country’s secular fabric”
    “RSS has played an honorable role in maintaining Hindu-Sikh unity before and after the murder of Indira Gandhi in Delhi and in other places”
    “It was the Congress (I) leaders who instigated mobs in 1984 and got more than 3000 people killed. I must give due credit to RSS and the BJP for showing courage and protecting helpless Sikhs during those difficult days. No less a person than Atal Bihari Vajpayee himself intervened at a couple of places to help poor taxi drivers.
    – ”[81]
    Discrimination against RSS volunteers
    Many cases have been reported in post-independence India where RSS volunteers have been discriminated against by the government due to their allegiance to the RSS and its ideology.[82] In a court case of a teacher who was dismissed from service due to his past links with the RSS, the Supreme Court labeled the government’s action as “McCarthyism” and a “violation of fundamental rights”.[83][84][85][86][87][88]
    A municipal school teacher, Ramshanker Raghuvanshi, was dismissed by the Congress government of Madhya Pradesh in 1974, which stated that he had taken “part in the RSS” activities and hence was “not a fit person to be entertained in Government service”. The Supreme Court dismissed the arguments of the government and said that the government had not adhered to the provisions of the Indian Constitution. The Supreme Court bench consisting of Justice Syed Murtuza Fazalali and Justice O. Chinnappa Reddy observed that “India is not a police state” and pleaded that the “promise of fundamental rights enshrined in the Indian Constitution not become a forgotten chapter of history”. Delivering the landmark judgment, the Court observed that “seeking a police report on person’s political faith”, in the first place, “amounted to the violation of fundamental rights”. The Supreme Court ruled in favor of the municipal teacher and ordered his reinstatement.[83][84][85][86][87][88]
    Similar observations were made by the High courts of different provinces of India in different cases of political persecution of RSS volunteers.[82] One case involved Ranganathacharya Agnihotri, who was selected for the post of Munsiff but was not absorbed into service as he had been a volunteer of the RSS in his past. When Agnihotri approached the High Court of Mysore, he was reinstated. The Court observed:
    “Prima facie the RSS is a non-political cultural organization without any hatred or ill will towards non-Hindus and that many eminent and respected persons in the country have not hesitated to preside over the functions or appreciate the work of its volunteers. In a country like ours which has accepted the democratic way of life (as ensured by the Constitution), it would not be within reason to accept the proposition that mere membership of such peaceful or non-violent association and participation in activities thereof, will render a person (in whose character and antecedents there are no other defects) unsuitable to be appointed to the post of a Munsiff.”
    – High Court of Mysore, The State of Karnataka Vs Ranganathacharya Agnihotri, writ No. 588/1966
    The RSS also has been banned in India thrice, during periods in which the government of the time claimed that they were a threat to the state: in 1948 after Mahatma Gandhi’s assassination, during the Emergency (1975–77), and after the 1992 Babri Masjid demolition. The bans were subsequently lifted, in 1949 after the RSS was absolved of charges in the Gandhi murder case, in 1977 as a result of the Emergency being revoked, and in 1993 when no evidence of any unlawful activities was found against it by the tribunal constituted under the Unlawful Activities (Prevention) Act.[89]
    Reception
    Field Marshal Cariappa in his speech to RSS volunteers said “RSS is my heart’s work. My dear young men, don’t be disturbed by uncharitable comments of interested persons. Look ahead! Go ahead! The country is standing in need of your services” [90]
    Dr Zakir Hussain the former President of India once told to Milad Mehfil in Monghyar on November 20, 1949 “The allegations against RSS of violence and hatred against Muslims are wholly false. Muslims should learn the lesson of mutual love, cooperation and organization from RSS.[91][92]
    Noted Gandhian leader and the leader of Sarvoday movement, Jayaprakash Narayan, who earlier was a vocal opponent of RSS had the following to say about it in 1977 “RSS is a revolutionary organization. No other organization in the country comes anywhere near it. It alone has the capacity to transform society, end casteism and wipe the tears from the eyes of the poor.” He further added “I have great expectations from this revolutionary organization which has taken up the challenge of creating a new India”
    August 27, 2006
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    RSS joins relief operation in flood-hit Surat
    (VSK, Gujarat)
    More than 600 swayamsevaks of Surat and surrounding areas are engaged round the clock to rescue the flood-effected people of Surat, Gujarat. The flood has claimed the lives of hundreds of people, thousands of cattle and damaged property worth crores. It has also adversely affected the whole business of the city.

    According to Shri Lalit Bansal, Vibhag Karyavah in Surat, more than 80,000 packets of food, 4,500 milk pouches and 1,11,000 pouches of drinking water have been provided to the flood affected people by August 9. In Surat, the RSS has set up four relief centres for collecting and distributing relief material under the supervision of senior Sangh activists Shri Nandkishore at Jainnagar, Shri Rajeshbhai Shah at Miranagar-Udhana, Shri Rajkumar Sharma at Bathar Road and Shri Ajaybhai Desai at Station Road.

    By August 9, relief had been provided to more than 5,225 people. Besides, arrangements have also been made for lodging and boarding at Shishu Mandir-Udhana, Vrindavan Hall and Uma Bhavan. Relief material has also been transported from Ahmedabad by trucks, which contained 4,500 kg Sukhadi, 5,500 kg namkin, 6,000 packets of biscuits, 2,000 kg puri, 1, 11000 pouches of drinking water, 9,000 packets of candles, 600 packets of match boxes and 160 bundle of ropes. In Ahmedabad collecting and packaging of relief material is being carried out at 55 centres and swayamsevaks of the entire city are engaged in the collection and preparations of the relief material. Local people too responded generously to help the flood-affected people.

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  8. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    वास्तवमे आपको प्रश्न हो, तो,कोइ संघके कार्यालय में जाकर आप यह और भी जो चाहे वैसे सारे प्रश्न पूछिए।
    संघ एक विकसनशील उत्क्रांतिशील संस्था है।(१) प्रारंभकी मराठी प्रार्थना, हिंदी हुयी, और अंतमें आज संस्कृत हो गयी है।–> यह क्या दिखाता है। (२) एक संस्थासे प्रेरित आज कई संस्थाएं सारे विश्वमें कार्य कर रही है। –> यह क्या दिखाता है। (३) कहां १९२५? –जब संघ प्रारंभ हुआ था- १० से १२ वर्षके स्वयंसेवक थे। १९२९ -३० में कुल ९९ स्वयंसेवक थे। आप उन किशोर वयके स्वयंसेवकोंसे क्या अपेक्षा करते हैं? (४) एक कथित विधानके अनुसार, मुसोलिनी की १४ प्रेमिकाएं थी, तब डॉ. हेडगेवार को कितनी थी?
    ए क गोपालन, ना. ग. गोरे, जयप्रकाशजी इत्यादिके भी संघके प्रति विचारोंको पढिए, कोई अच्छे जानकार कार्यकर्ता या प्रचारक से सच्चाईको जाननेकी इच्छासे जो पूछना हो, पूछिए।
    सत्यको जानना ही होता है। व्यवहार आपही बदल जाता है।कई लोग बदले हैं। ना भी बदलो तो कोई बात नहीं। पर सच्चाई तो जानिए।

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  9. जवाहर चौधरी

    जवाहर चौधरी

    किसी संगठन का इतिहास जो रहा हो पर उसका वर्तमान देखा जाना चाहिए .
    हिन्दुओ को ताकत बनाने का सपना देखने दिखने से कुछ नहीं होगा .
    अब तक चारो वर्णों में एकता हुई क्या ? क्या यह बताने की जरुरत है की हिन्दू अगर कट्टर होगा तो विभाजित होगा और उदार होगा तो मजबूत होगा . उदारता बढ़ने की जरुरत है या कट्टरता . कट्टरता के कारन ही लाखो लोग धर्मान्तरण कर गए है. ऐसे बनेगी ताकत , जैसा की कहा गया है संगठन बनाने वालो ने सपना देखा था ? निम्न जातियो के लिए कोई सार्थक पहल हुई क्या ? आज हर दूसरे दिन खबर छपती है की
    दलितों को मार दिया, जला दिया या नंगा करके गाँव में घुमाया ! कोई हिन्दू संगठन
    इसमें कुछ नहीं बोलता है ! क्या ठेकेदारी का दावा करने वालो की यह जिम्मदारी नहीं
    है कि हस्तक्षेप करे ?
    इतिहास से लोग असंतुष्ट होंगे पर वर्तमान भी अच्छा नहीं है .
    नहीं सीखने वाले न तो इतिहास से सीखते है न अनुभव से .
    जगदीश्वर जी अपना चिंतन इस ओर मोड़े तो ज्यादा अच्छा होगा .

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  10. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    dr.munje ka sangh me kya role tha???vese ab bat nikal hi gayi he to ye bhi suna subhash chandra bosh to hitalar se bhi mile the or prtayksh sahyata tak li thi unase,to???mene kitani bar likha he jab “fasivad” namak sabd peda hi nahi huva tha tab se sangh khada he,1925 me sangh ka janm huva or ap bate kar rahe he 1931 ki,kise bevkuf bana rahe he??पिछले डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन में भारतीयों को सैनिक पेशे से अलग कर दिया गया है। भारत इपनी रक्षा के लिए खुद को तैयार करने की इच्छा रखता है। मैं उसके लिए काम कर रहा हूँ,esame koe chij galat najar ati he apako??vampanthiyo ko najar a sakati he jo subhash babu ko gali dete firate the,apani rastr ko bachane shatru ke shatru se bhi madad lena hi budhimata he,par ye kon se sangathan ki bat ap kar rahe he????saty bat to ye he apako kuchh bhi pata nahi he sangh ke bare me,apane vampanthi chashme ko utariye or dekhiye apake vampanth ki kya gajb durdusha hue he???becharo ko puchhane vala tak nahi he koe.

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  11. Dr. Purushottam Meena

    आदरणीय चतुरर्वेदी जी, आरएसएस के असली चरित्र को उजागर करने के लिये इतनी पुख्ता एवं तथ्यात्मक जानकारी प्रकाशित करने के लिये आपका एवं प्रवक्ता डॉट कॉम दोनों का आभार। वास्तव में इस देश की युवा पीढी को आरएसएस एवं देश के (इतिहास पुरुष बन बैठे) ढोंगी लोगों के बारे में सच्चाई का पता चलना चाहिये। जिससे कि नयी पीढी अपने एवं देश के भविष्य के निर्माण का निर्णय लेने में सक्षम हो सके। आपने आरएसएस का फासीवादी संगठनों एवं मुसोलिन से सम्पर्क प्रमाणित करके एक पुण्य का कार्य किया है, बेशक आप पुण्य में विश्वास करते हों या नहीं।

    मैं तो चाहता हँू कि आपके इस प्रकार के महत्वपूर्ण आलेख प्रेसपालिका (पाक्षिक) के माध्यम से प्रकाशित करके आम लोगों तक सच्चाई को पहुँचाऊूँ। इस बारे में आपकी सहमति अपेक्षित है। आपको इस बारे में मेल के माध्यम से आग्रह भी किया गया है। एक बार पुनः साधुवाद और धन्यवाद। शुभकामनाओं सहित।
    -आपका-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका

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  12. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    kya gajab karte ho bhai jagdeeshwar ji .aapne jo kuchh likha wah nagn saty hai .kintu bhai mere is tarah se itihash ki samiksha karoge toun udarwadiyon hinduoon ko thaes pahunchegi jo is kale ateet ki kali parchhiyon tatha fasiwad ke bare men abc jane vina sangham sharnam gachhami ho gaye aur mandir banane ka nara lagakar ek do bar kendra men aurcuchh prdesho men punjeepatiyon ki chakri kare hue gale men kesari dupatta dalkar bhrat babaoon ke sath tamam hindu kom ko thag eahe hain.aapne rss ka asli chehra ujagar to kar diya kintuthe great maratha empir ke nam par apne hidesh ke anek hissoon par balaat kabja karene bale peshwaon ko bhool gaye .peshwaon ke uttradhikariyon nehi rss ko janm diya tha .rss ka hidu hiton se koi lena dena nahin.we satta ki rajneet vote bank ki rajneet kar rahe hai..jo nasamajh hain wahi unke jhanse men aata hai.iske alawa muslim leeg tatha pakistan ki kali kartuton ne sidhe sade dharmnirpeksh hinduon ko bhi samprdayikta ki aag men kudne par mazboor kiya hai.jabtak duniya men dusre dharmik kattartawadi kuhram machate rahenge tab tak rss ko fasiwad ka khad pani milta rahega.samajik sadbhav tatha desh ke hit men yahi hai ki sabhi dharmon ke kattarpanthiyon par laggaM LAGAI JAYE.

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  13. bhagat singh

    isme kaya shak hain.bilkul sahi likha he aapne.ab intjar kariye hitlari virogh ka.

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