लेखक परिचय

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

जन्म 18 जून 1968 में वाराणसी के भटपुरवां कलां गांव में हुआ। 1970 से लखनऊ में ही निवास कर रहे हैं। शिक्षा- स्नातक लखनऊ विश्‍वविद्यालय से एवं एमए कानपुर विश्‍वविद्यालय से उत्तीर्ण। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण पर लेख प्रकाशित। मातृवन्दना, माडल टाइम्स, राहत टाइम्स, सहारा परिवार की मासिक पत्रिका 'अपना परिवार', एवं हिन्दुस्थान समाचार आदि। प्रकाशित पुस्तक- ''करवट'' : एक ग्रामीण परिवेष के बालक की डाक्टर बनने की कहानी है जिसमें उसको मदद करने वाले हाथों की मदद न कर पाने का पश्‍चाताप और समाजोत्थान पर आधारित है।

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मनोज श्रीवास्तव ‘‘मौन’’

हमारे देश के संवत्सर प्रारम्भ के सम्बन्ध में भारत के विभिन्न क्षेत्रों की परम्परा में कुछ अन्तर है। भारत के कुछ भागों में माह कृष्ण पक्ष की अगली प्रतिपदा से प्रारम्भ होते हैं और शुक्ल पक्ष के साथ समाप्त होते हैं। ऐसे माह को पूर्णिमान्त कहते हैं ऐसे माह को अमावस्यान्त कहते हैं। जहॉं यह परम्परा प्रचलित है वहॉ चैत्र माह का विभाजन नहीं होता है। अर्थात चैत्र माह वर्ष के प्रारम्भ में आता है। इन दोनों परम्पराओं के अन्तर के कारण माह के प्रारम्भ होने के लिखे जाने में 15 दिनों का अन्तर पाया जाता है किन्तु शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष सदैव वे ही रहते हैं। सम्वत्सर आदि काल से चला आ रहा है, परन्तु इसमें केवल गणना समय पर भिन्न-भिन्न कालों से पारम्भ की गयी है। उदाहरणतः यदि हम सम्पूर्ण कलियुग के सम्वत्सर गिनें तो इस समय 5110 चल रहा है। इसके लिए जरूरी है कि हम भारतीय काल गणना को समझें कि कैसे यह होगा।

आज भारत में ही पाश्चात्य काल गणना ने घुसपैठ कर ली हो, पर अभी भी समाज की विविध गतिविधियों जैसे पर्व त्योहार, विवाह, धार्मिक अनुष्ठान आदि काल से ही काल गणना के अनुसार ही संचालित होते हैं। इस काल गणना में त्रुटि जैसी सूक्ष्मतम इकाई से लेकर कल्प जैसी वृहदतम इकाई की खोज हमारे मनीषियों ने की थी। यह पद्धति अन्य काल गणना पद्धतियों की तरह मात्र सूर्य पर या चन्द्र पर आधारित नहीं है बल्कि इसमें दोनेां का सामन्जस्य है। साथ ही ग्रह नक्षत्रों राशियों आदि का भी ध्यान रखा जाता है।

समय की सूक्ष्मतम तथा वृहत्तम इकाई प्राचीन भारतीय महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने आज से चौदह सौ वर्ष पूर्व लिखे अपने ग्रन्थ में समय की इकाईयों की विशद विवेचना किया है। ये इकाईयां इस प्रकार है-

225 त्रुटि – एक प्रतिविपल

60 प्रतिविपल – एक विपल (0.4 सेकेण्ड )

60 विपल – एक पल (24 सेकेण्ड )

60 पल – एक घटी (24 मिनट )

2.5 घटी – एक होरा (एक घन्टा )

5.0घटी या 2 होरा – एक लग्न (दो घन्टे )

60 घट या 24 होरा या लग्न – एक दिन (एक दिन )

इस सारणी से स्पष्ट है कि एक विपल आज के 0.4 सेकेण्ड के बराबर है तथा त्रुटि का मान सेकेण्ड का 33,750 वॉं भाग है। इसी तरह लग्न का आधा भाग जो होरा कहलाता है 1 घन्टे के बराबर है। इसी होरा से अंग्रजी का हावर(hour) बना है । इस प्रकार एक दिन में 24 होरा होते हैं।

सृष्टि का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (1) के दिन हुआ था। इस प्रकार एक दिन में 24 होरा से अंग्रजी का हावर(hour) बना। पहले होरा का स्वामी सूर्य था। इसलिए सृष्टि के प्रारम्भ का दिन रविवार माना गया। उसके बाद के प्रथम होरा का स्वामी चन्द्रमा था इसलिए रविवार के बाद सोमवार आया। इसी तरह सातों वारों के नामसात ग्रह पर पड़े। पूरी दुनिया में सप्ताह के सात वारों के नाम प्रचलित हुए।

भारतीय आचार्यों ने समय की सबसे बड़ी इकाई कल्प को माना । एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते है। एक हजार महायुगों का एक कल्प माना गया । इसका हिसाब इस प्रकार है-

एक कल्प – 1000 चतुर्युग या 14 मनवन्तर

एक मनवन्तर – 71 चतुर्युगी

एक चुतुर्युगी – 420000 वर्ष

प्रत्येक चतुर्युगी के सन्धि काल में कुछ सन्धि वर्ष होते हैं जो किसी युग के में नहीं जोड़े जाते हैं। इन्हें जोड़ने पर 14 मन्वन्तरों के कुल वर्ष 1000 महायुगो के बराबर हो जाते हैं। इस तरह श्वेताराह कल्प चल रहा है। इस कल्प का वर्तमान में सातवॉं मन्वन्तर है जिसका नाम वैवस्वत है। वैवस्व मन्पन्तर के 71 महायुगों में से 27 बीत चुके हैं। 28वीं चतुर्युगी के भी सतयुग, त्रेता तथा द्वापर बीत कर कलयुग का 510 वॉं वर्ष इस समय चल रहा है।

संवत्सर में सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों का पूर्ण तालमेल- भारतीय संवत का वर्ष चन्द्रमा पर आधारित होने के बावजूद भी सूर्य पर आधारित रहता है। ज्योतिष के पगाचीन ग्रन्थ सूर्य के सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15घटी 31 पल,31 विपल तथा 24 प्रतिपल का समय लेती है। यही सौर वर्ष का काल मान है। यहॉं यह याद रखा जाना चाहिए कि सूर्य सिद्धान्त ग्रन्थ उस समय का हैजब यूरोप में साल के 360 दिन माने जाते थे।

चन्द्रमा में पूर्णतः आधारित में कोई भी त्योहार निश्चित एक ऋृतु में नहीं आता है। आपने अनुभव किया होगा कि मुसलमानों के हिजरी में पड़ने वाला रमजान का महीना जिसमें इस्लाम के अनुयायी रोजा रखते हैं कभी तो भरपूर सर्दी में आता है, उसके कु छ समय बाद सर्दियों के प्रारम्भ काल में, इसकी मुख्य बजह है कि हमारे संवत्सर में चन्द्रमा तथा सूर्य से सम्बन्ध महीनो में गहरा तालमेल रखा जाता है।

आकाश में 27 नक्षत्र हैं। इनके 108 पाद होते हैं। विभिन्न अवसरों पर नौ-नौ पाद मिलकर बारह राशियों की आकृति बनाते है। इन राशियों के नाम – मेष, वृष, मिथुन , कर्क, सिंह,कन्या,तुला, वृश्चिक,धनु,मकर,कुम्भ,और मीन है। सूर्य जिस समय जिस राशि पर होता है वही काल खण्ड सौर मास कहलाता है। वर्ष भर में सूर्य प्रत्येक राशि में एक माह तक रहता है, अतः सौर वर्ष के बारह महीनों के नाम उपरोक्त राशियों के अनुसार होते है । जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है वह दिन उस राशि का संक्रान्ति का दिन माना जाता है। जैसे मकर संक्रान्ति को सूर्य मकर राशि मकर राशि में प्रवेश करता है । यह संक्रान्ति हर वर्ष 14 जनवरी को पड़ती है। चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर जितने समय में लगा लेता है वह समय साधरणतः एक चन्द्र मास होता है। चन्द्रमा की गति के अनुसार तय किए गए महीनों की अवधि नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार कम या अधिक भी होती है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा में चन्द्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्णता को प्राप्त करता है उस नक्षत्र में चन्द्रमा, चित्रा,विशाखा, ज्येष्ठ,आषाढ़,श्रावण,भाद्रपद,अश्विनी,कृतिका,मृगशिरा, पुष्य, मघा,और फाल्गुनी नक्षत्रों में पूर्णता को प्राप्त होता है। इस लिए चन्द्र वर्ष के महीनों के नाम – चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद,अश्विन,कार्तिक, मार्गशीष, पौष, माघ और फागुन रखे गये हैं। यही महीने भारतीय हिन्दी मास के रूप में प्रचलित महीने हैं।

चन्द्रमास बिल्कुल निश्चित समय में नहीं व्यतीत होता है इसकी वजह यही है कि चन्द्रमा पर सूर्य, ग्रहों व अन्य खगोलीय पिण्डों का जबर्दस्त असर होता है । इसलिए इसके माह कभी एक दिन बड़े हो जाते हैं। चूकि चन्द्रमा के 12 महीनों के वर्ष की अवधि सौर वर्ष से 11 दिन,3 घटी तथा 84 पल छोटी होती है इस लिए इसमें सामन्जस्य बैठाने के लिए 32 महीने,16दिन, 4घटी के बाद एक चन्द्र मास की वृद्धि मानी जाती है। इसी प्रकार 140 से 190 वर्षों में एक ही चन्द्रमास में दो संक्रान्तियॉं होती हैं। उसी महीने को कम हुआ माना जाता है।

5 Responses to “संवत्सर की विविध भारतीय परम्पराए”

  1. नन्दकिशोर आर्य

    लेख जानकारी से परिपूर्ण है धन्यवाद मेरे विचार से एक त्रुटि रह गई है कलियुग के चार लाख बत्तीस हजार वर्ष होते हैं इससे दुगुने द्वापर के तिगुने त्रेता के व चौगुने सतयुग के तो चतुर्युगी चार लाख बीस हजार कैसे हुई जरा स्पष्ट करें जी

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  2. विनायक शर्मा

    Vinayak Sharma, Editor Amar Jwala weekly, Himachal

    एक ज्ञानवर्धक लेख के लिए साधुवाद….!

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  3. Sanjay

    बेजोड़ लेख .मैं निजी तौर पर प्रार्थना
    करता हूँ की इतने महत्वपूर्ण विषय पर पूरी लेखमाला लिखें.

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