संन्यासी लेखक

 

गंगानन्द झा

वह शाम खास थी। राजशेखर अपने शिक्षक और गुरु रामकृष्ण महाराज के साथ हमारे घर पर आया था। वे रामकृष्ण मिशन के संन्यासी हैं और रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, देवघर में वे राजशेखर के प्रिंसिपल रह चुके थे। राजशेखर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में एडवोकेट हैं.। पर अपने विद्यालय के महाराजजी से सम्बन्ध बना हुआ है, अभी भी दोनो के बीच निरन्तर संवाद चला करता है।। मेरे लिए व्यक्तिगत स्तर पर एक और परिचय था उनका। उनके पिता बिहार विश्वविद्यालय में मेरे सहकर्मी रह चुके थे। उनसे मिली जानकारी से मैं जानता था कि वे बचपन से ही मेधावी छात्र थे और रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, देवघर में प्रतियोगिता परीक्षा से उनका चयन हआ था। उसके बाद दिल्ली के सेंट स्टिफेन्स कॉलेज से शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था। रामकृष्ण रामकृष्ण परमहंस को समर्पित होकर स्वामी समर्पणानन्द हो गए थे। कामेश्वर बाबू ने मुझसे कहा था, रामकृष्ण नाम रखना जैसे भविष्य का सूचक था।
वे आए तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर के खोखाबाबूर प्रत्यावर्तन की याद आई। मेरे लिए यह उत्तेजनामय अनुभव था। उनका आगमन एक बहुस्तरीय व्यक्तित्व के साथ रुबरु होना था। संन्यासी के आवरण में विद्वान लेखक समर्पण से साक्षात्कार हुआ था हमारा। इसके पहले राजशेखर ने उनकी Param. Tiya- a parrot’s journey home , Junglezen Sheru, Carving a sky and Living Hinduism नाम की पुस्तकों से मुझे परिचित किया था। इन पुस्तकों के प्रति मेरा आग्रह राजशेखर के उत्साह तथा कामेश्वर बाबू के प्रति मेरे भावनात्मक लगाव से प्रेरित हुआ था। धर्म एवम् अध्यात्म के क्षेत्रों में मेरी सीमाओं के कारण हितापदेश और पंचतंत्र की शैली में लिखी गई ये पुस्तकें मुझे बोधगम्य लगीं। स्वामी समर्पणानन्द ने इस भौतिक जीवन की चर्चा की है,. परलोक का प्रसंग नहीं छेड़ते। जीवन को ऊर्जा की वर्र्णमाला और भाषा में समझना आकर्षक है। असंगठित ऊर्जा के संगठित ऊर्जा में बदलने की अवधारणा युक्तिसंगत है। शायद जीवन के भौतिकवादी मान्यता से निर्मित होने के कारण मेरी चेतना सीमाबद्ध हो गई है। अध्यात्म को मैंने परिवेशीय विवेक(ecological conscience) के रुप में समझा है। यह समझ जीव के शरीर और उसके परिवेश के बीच ऊर्जा का निरन्तर प्रवाह स्वीकार करती है। ऊर्जा के सँवरने और बिखरने की निरन्तरता से जीवन चक्र के संचालन की व्याख्या करती है। मृत्यु के बाद के जीवन के प्रति मेरी चेतना में कोई सवाल नहीं है। इसलिए मुझे भरोसा नहीं था कि समर्पण की कृतियाँ मेरे पल्ले पड़ेंगी। पर जब पढ़ना शुरु किया तो पढ़ता ही गया। ये किताबें .ये नहीं कहती कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। ये हमें आइना दिखाती हैं, हम जिन तजुर्बों से दो चार होते रहते हैं, उन्हें ये किताबें सुलझाती हैं। टिया अपने आपको घरछाड़ा करता है, और नाना किस्म की परेशानियों से समृद्ध होता हुआ घर वापसी का सफर पूरा करता है। घरछाड़ा होने की प्रवणता हम सबमें है, यह प्रवणता हमें परेशानियों में डालती है। उन परेशानियों से जीवन का समीकरण हमें मुक्त करता है। हमारा अनुभव संसार विस्तृत होता जाता है। यह प्रवणता मनुष्य को अपना आसमान तराशने के काबिल बनाती है। इन पुस्तकों को पढ़ने से यह स्थापित हो गया कि हर व्यक्ति अनोखा होता है, उसके अन्दर की यह खासियत उसका सार होती है और यह सार ही उसकी उपलब्धि का सूत्र है। इस सार की पहचान कर ली जाए तो वह व्यक्ति परिवेश के कलंकित करनेवाले प्रभाव से अपने को सुरक्षित रख सकता है। इन किताबों की भाषा अभिनव है, स्थान,सार्वभौम अस्तित्व, सार्वभौम स्वीकृति और स्वतन्त्रता की अवधारणाएँ आकर्षक हैं। आत्मा और परमात्मा का विवेचन नहीं हुआ है इन किताबों में ।

मेरे लिहाज से दिलचस्प और बोधगम्य शैली में लिखी गई पुस्तकों को मैं सहजता से पढ़ पाया था। और फिर मैंने उन पुस्तकों के बारे में अपनी समझ पर टिप्पणियाँ लिखीं और वेब पत्रिकाओं में वे प्रकाशित हुईं। राजशेखर ने मुझे बतलाया था कि महाराजजी को मेरी टिप्पणियाँ पसन्द आई थीं और उन्होंने अपने ब्लॉग पर शेयर भी किया था। फिर बाद में उससे मालूम हुआ कि स्वामीजी चण्डीगढ़ आ रहे हैं और उस समय मेरे निवास पर भी आने की इच्छा उन्होंने व्यक्त की है। मैं मिश्रित भावनाओं के गिरफ्त में था। पौराणिक ग्रन्थों के शुकदेव और व्यास का प्रसंग याद आया।
मेरी समझ में आध्यात्मिकता परिवेशीय विवेक को सम्पुष्ट करती है। आध्यात्मिकता अपने शरीर में तथा परिवेश में लौकिक ऊर्जा की उपस्थिति से अवगत करती रहती है। हम समस्त ब्रह्माण्ड से और सुदूर अतीत से भविष्य तक खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया करते हैं. जैसा रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं और गीतों में बताया जाता है। । आध्यात्मिकता की मेरी धारणा धार्मिकता से स्वतंत्र है। इसलिए मुझे भय हो रहा था कि मेरी टिप्पणियाँ कहीं उनको नास्तिक की ईशनिन्दा न लगी हो
ये पुस्तकें उपमन्यु चटर्जी और एपीजे अबुल कलाम जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा प्रशंसित होने के साथ विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं की अनुशंसित पाठ्य हैं।
पहली बार हमारे घर पर किसी संन्यासी का आगमन हुआ था। पर परिवेश बिलकुल सहज रहा, करीब एक घंटे तक हमारी गोष्ठी जमी रही। उन्होंने बस एक कप चाय पी। उनके जाने के बाद मैंने महसूस किया कि लेखक पाठक के बीच सेतुबन्ध दृढ़ हुआ है।

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