सरकार का ऐलान..आदिवासियों के घर अब नहीं आएगा कोई ‘सुक्खी लाला’

मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर विशेष

–मनोज कुमार

उत्सव का अर्थ होता है अपनों के साथ अपनी खुशियां बांटना. उत्सव का अर्थ होता है दूसरों की जिंदगी को रोशन कर देना. उत्सव का अर्थ यह भी होता है हाशिये पर खड़े लोगों को गले लगाना और उनकी चिंता को अपनी चिंता बनाना. उत्सव का यह खुशनुमा चेहरा शायद आप पहली बार देख रहे होंगे. एक नवम्बर को मध्यप्रदेश अपना 64वां स्थापना दिवस सेलिब्रेट करे और इस दिन को गोंडी जनजाति की संस्कृति और साहित्य के नाम कर दे लेकिन जिनसे मध्यप्रदेश की पहचान है, उन आदिवासी परिवारों की चिंता की शुरूआत स्वाधीनता दिवस पर ही शुरू हो गई थी. बीते 15 अगस्त का दिन उन हजारों-हजार आदिवासी परिवारों के लिए सचमुच आजादी का दिन था जब सरकार ने ऐलान कर दिया था कि अब कोई सुक्खी लाला आदिवासियों की गाढ़ी कमाई खाने नहीं आ पाएगा. आदिवासियों के कल्याण के लिए बनी योजनाओं में उनके समग्र विकास की कल्पना की गई थी और कई बार नगद राशि भी उन्हें मुहय्या कराया गया था लेकिन उनके हाथों में नगदी आने के बजाय बाज की तरह झपट्टे मारने वाले ‘सुक्खी लाला’ अपना जाल बिछाये बैठे हैं जो उनके उनका हक छीन कर ले जाते हैं- ‘सुक्खी लाला’ के पंजे की कैद में गरीब और निर्धन आदिवासी अपने जन्म से लेकर आने वाली पीढ़ी तक कैद हैं- यह पहली बार हुआ कि जब आदिवासियों के लिए बनी योजनाओं को उन तक हकीकत में पहुंचाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने फैसला किया है कि साहूकारी प्रथा को खत्म किया जाएगा- जिन्हें साहूकारी करना है वे कानून की जद में आकर विधिसम्मत काम करें लेकिन बेनामी धंधा कर गरीब आदिवासियों को लुटने से बाज आएं- सरकार के इस फैसले से आदिवासियों के जीवन में एक नई सुबह ने दस्तक दी है. इस बात को जेहन में रखा जाना चाहिए कि सालों साल से अरबों की योजनाएं और आदिवासियों के जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के हजारों दावे के बाद भी उनकी जिंदगी मिट्टी मिट्टी होती जा रही थी. इस बात में कोई संदेह की गुंजाईश नहीं कि सरकारों ने पूरी शिद्दत और ईमानदारी से आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए अथक प्रयास किए लेकिन धरातल पर आकर सारे प्रयास औंधेमुंह गिर गए. आदिवासियों के लिए बनी यह योजनाएं उन्हें खुशहाल जीवन जीने की तो है लेकिन उसके पीछे छिपे घनघोर अंधेरे को पहचाने की कोई कोशिश नहीं हुई.  बेनामी साहूकारी शिकंजे से आदिवासियों को मुक्त कराने की दिशा में कठोर फैसला करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य बन गया तो एक कदम और आगे बढक़र आदिवासी समाज की हितों की चिंता करते हुए मध्यप्रदेश स्थापना दिवस की थीम गोंड जनजाति पर केन्द्रित करने का ऐलान किया. यह पहली पहली बार हो रहा था जब मध्यप्रदेश की स्थापना दिवस पर उनको स्मरण में रखा गया. उन सब लोगों को साथ लेकर चलना है जिन्हें हम पीछे छोड़ आए थे. भरोसा उन लोगों को मिलने लगा है जो अपने कबीले और समुदायों में सिमट गए थे. उन लोगों के लिए यह नया उजास है जहां उन्हें शासकीय आयोजनों में प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि सहभागिता के लिए साथ लेकर चलने की कोशिश हो रही है. उन आदिवासी समाज के लिए कुछ करने का जज्बा शिद्दत के साथ महसूस किया जा रहा है जो अब तक केवल छायाचित्रों में कैद थे. एक नवम्बर, 1956 का वह दिन जब मध्यप्रदेश ने आकार लिया था. हालांकि इस प्रदेश का गठन सुनियोजित नहीं था. जहां से जो भू-भाग रिक्त रह गया, उन्हें जोडक़र मध्यप्रदेश का निर्माण कर दिया गया था. एक बेडौल प्रदेश होने के बाद भी हिन्दुस्तान का दिल कहा गया क्योंकि इसकी बसाहट हर कोने से दिल ही बनता था. चुनौतियां मध्यप्रदेश के हिस्से से आरंभ से रही हैं लेकिन सत्तासीन शिल्पकारों ने अपनी सूझबूझ, लगन, विवेकशीलता और सरोकार के चलते एक विकसित प्रदेश के रूप में स्थापित कर दिया. मुख्यमंत्री के रूप में शिल्पकार की भूमिका में प्रदेश को हर बार नया रूप मिला. मध्यप्रदेश की पहचान एक विशाल आदिवासी प्रदेश के रूप में रही है.  मध्यप्रदेश की धडक़न इन्हीं आदिवासी समुदाय में धडक़ती है. यह और बात है कि दो दशक पहले मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य बन गया और आदिवासी समुदाय का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ चला गया लेकिन आदिवासी समाज की संख्या के लिहाज से मध्यप्रदेश कमतर नहीं हुआ. मध्यप्रदेश मेेंं निवास करने वाली प्रमुख जनजाति में गोंड एक बड़ी जनजाति है. गोंड जनजाति का स्वर्णिम इतिहास रहा है. गोंड राजा-रजवाड़े रहे हैं और देश के स्वाधीनता संग्राम में प्राणों की आहूति देने वालों में भी वे प्रथम पंक्ति में गिने जाते हैं. गोंड जनजाति का इतिहास इस बात की गवाही है कि हमारा वैभव, हमारी पहचान उनके स्मरण, उन्हें साथ लेकर चलने से ही है.

मध्यप्रदेश की स्थापना दिवस के मुबारक मौके पर गोंड जनजाति के बारे में उपलब्ध तथ्य और उनकी गौरव-गाथा से नयी पीढ़ी को अवगत कराना जरूरी लगता है. गोंड राजाओं ने देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने में अपने प्राणों की आहूति दी तो गोंड रानी भी पीछे नहीं थी. इतिहास के पन्नों पर रानी दुर्गावती और अवंति बाई का त्याग स्वर्णाक्षरों में अंकित है. गोंड जनजाति की उपशाखा परधान जनजाति के कलाकारों द्वारा गोंड कथाओं, गीतों एवं कहानियों का चित्रण किया जाता है जो परम्परागत रूप से परधान समुदायों के द्वारा गोंड देवी देवताओं को जगाने और खुश करने हेतु सदियों से गायी जाती चली आ रही हैं। प्राय: परधान लोग गोंड समुदायों के यहाँ कथागायन करने हेतु जाया करते थे। जो उनकी जीविका का साधन था। जब परधानों के कथागायन की परंपरा कम हो गयी तब परधान कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम ने इस गोंड कथागायन की परंपरा को चित्रकला के माध्यम से साकार करना प्रारंभ किया। जनगढ़ की मृत्यु के बाद गोंड परधान जनजाति के युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने चित्रकला को पूरी दुनिया में स्थापित कर दिया था.

संभवत: यह दुनिया में एकमात्र जनजातीय समाज है जिनका पूरा कुनबा चित्रकारी में जुटा हुआ है. गोंड परधान चित्रकला के विषय में बड़ादेव (सृजन करने वाली शक्ति), दुल्हा दुल्ही देव (शादी विवाह सूत्र में बाँधने वाला देव), पंडा पंडिन (रोग दोष का निवारण करने वाला देव), बूड़ादेव (बूढाल पेन) कुलदेवता या पुरखा, जिसमे उनके माता पिता को भी सम्मिलित किया जाता है, नारायण देव (सूर्य) और भीवासू गोंडों के मुख्य देवता हैं। इनके अतिरिक्त ग्रामों में ग्राम देवता के रूप में खेरमाई (ग्राम की माता), ठाकुर देव, खीला मुठ्वा, नारसेन (ग्राम की सीमा पर पहरा देने वाला देव), ग्राम के लोगों की सुरक्षा, फसलों की सुरक्षा, पशुओं की सुरक्षा, शिकार, बीमारियों और वर्षा आदि के भिन्न भिन्न देवी देवता हैं। इन देवताओं को बकरे और मुर्गे आदि की बलि देकर प्रसन्न किया जाता है. गोंडों का भूत प्रेत और जादू टोने में अत्यधिक विश्वास है और इनके जीवन में जादू टोने की भरमार है। किंतु बाहरी जगत के संपर्क के प्रभावस्वरूप इधर इसमें कुछ कमी हुई है। मध्यप्रदेश का 64वां स्थापना दिवस एक आयोजन की औपचारिकता नहीं रह गई है बल्कि यह आयोजन अर्थपूर्ण बन गया है. यह नजीर है उन लोगों के लिए जिनके पास हर उत्सव के लिए महंगे सेलिब्रेटी ही एकमात्र विकल्प हुआ करते थे. दृष्टि और दिशा के अभाव से उबरते हुए एक नई सुबह की ओर मध्यप्रदेश चल पड़ा है अपनों को साथ लिए, अपनों से बात करते हुए.  

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